उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में मंगलवार को आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को जीवन की आध्यात्मिकता, मैत्री भाव और मानवीय संबंधों का महत्व समझाया।
उन्होंने कहा कि हमें परमात्मा के शासन में जीवन जीने का सौभाग्य मिला है। अब हमारे भीतर स्वयं परमात्मा बनने की जिज्ञासा और प्यास जागृत होनी चाहिए।
जीवन में चाहत सांसारिक पदार्थों को प्राप्त करने की नहीं, बल्कि परमात्मा को पाने की होनी चाहिए।
पदार्थों की लालसा व्यक्ति को संसार में उलझाती है, जबकि परमात्मा की प्राप्ति की प्यास जीवन को भवसागर से पार लगाने का मार्ग प्रशस्त करती है।साध्वीश्री ने कहा कि परमात्मा ने हम पर अनंत उपकार किए हैं।
उन्होंने संसार को देखने और समझने का सही दृष्टिकोण प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री भाव रखने का संदेश दिया है।
प्रमोद, माध्यस्थ, कारुण्य और मैत्री ये चार भावनाएं आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती हैं। इनमें मैत्री भावना सर्वाेच्च है।
हमें प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम और सद्भाव रखना चाहिए। किसी की निंदा करने वाले व्यक्ति के प्रति भी द्वेष या वैमनस्य का भाव नहीं रखना चाहिए।साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने कहा कि जीवन में जब भी अवसर मिले, दीवार बनाने के बजाय पुल बनाने का प्रयास करें।
समाज में जाति, वर्ग, विचार और अहंकार के भेदभाव की दीवारें खड़ी करने के बजाय प्रेम, स्नेह और सद्भावना के पुल बनाएं। व्यक्ति का स्वभाव ऐसा होना चाहिए, जिससे वह दूसरों के जीवन में खुशियां और सकारात्मकता जोड़ सकें।
धर्मसभा में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने मधुर गीत की प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिमय बनाया।