राजस्थान की लोकपरंपराओं से बॉलीवुड की चमक-दमक तक, पति की दीर्घायु की कामना वाले व्रत ने बदला अपना सामाजिक स्वरूप गोपेन्द्र नाथ भट्ट राजस्थान की संस्कृति में व्रत और त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पारिवारिक संबंधों, लोकविश्वासों और सामाजिक परंपराओं के जीवंत प्रतीक रहे हैं।
यहां महिलाएं सदियों से अपने परिवार की सुख-समृद्धि, पति की दीर्घायु और संतान के कल्याण के लिए अनेक व्रत करती आई हैं।
श्रावणी तीज, गणगौर, हरतालिका तीज, वट सावित्री, निर्जला एकादशी और करवा चौथ जैसे व्रतों की परंपरा में आस्था के साथ भावनाओं का गहरा रिश्ता जुड़ा है।
लेकिन पिछले वर्षों से करवा चौथ को जिस व्यापक लोकप्रियता, आकर्षक रूप और सामाजिक प्रदर्शन का स्वरूप मिला है, उसमें हिंदी फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
*राजस्थान में पहले से रही है व्रतों की समृद्ध परंपरा* राजस्थान में गणगौर और तीज जैसे त्योहारों का सांस्कृतिक महत्व अत्यंत व्यापक है।
गणगौर में सुहाग, दांपत्य सुख और पार्वती की आराधना का भाव जुड़ा है, जबकि तीज के अवसर पर महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीतों, झूलों और सामूहिक उत्सवों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखती हैं।
वट सावित्री और अन्य व्रत भी पति तथा परिवार के मंगल की कामना से जुड़े रहे हैं। इन परंपराओं की जड़ें लोकजीवन में गहरी हैं।
इनके लिए कभी किसी फिल्म के प्रचार या आधुनिक फैशन की आवश्यकता नहीं रही। गांवों और कस्बों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही रीति-रिवाजों ने इन्हें जीवित रखा है।
यही राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक निरंतरता की विशेषता है।
*बॉलीवुड ने करवा चौथ को दिया नया ग्लैमर* करवा चौथ की परंपरा उत्तर भारत के कई समुदायों में लंबे समय से प्रचलित रही है। हालांकि, हिंदी फिल्मों ने इसे व्यापक शहरी लोकप्रियता दिलाने और एक आकर्षक दृश्यात्मक उत्सव के रूप में प्रस्तुत करने में अहम भूमिका निभाई।
विशेषकर 1990 के दशक के बाद फिल्मों में करवा चौथ के दृश्यों ने इस व्रत को प्रेम, रोमांस, दांपत्य संबंधों और पारिवारिक एकजुटता के प्रतीक के रूप में स्थापित करने में योगदान दिया।
फिल्मों में सजी-धजी महिलाएं, हाथों में मेहंदी, लाल जोड़े, छलनी से चांद देखना, पति के हाथों पानी पीकर व्रत खोलना और परिवार के साथ चांद निकलने की प्रतीक्षा करना आदि ये दृश्य लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गए।
*दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे*, *कभी खुशी कभी गम* और *बागबान* जैसी फिल्मों ने इस पर्व को दर्शकों की कल्पना में एक खास स्थान दिया।
टेलीविजन धारावाहिकों और सोशल मीडिया ने भी इस छवि को आगे बढ़ाया।इसका परिणाम यह हुआ कि जिन परिवारों में करवा चौथ पहले सीमित रूप में मनाया जाता था, वहां भी इसे नए उत्साह और आधुनिक सजावट के साथ मनाने की प्रवृत्ति बढ़ी।
हालांकि, इसकी लोकप्रियता का पूरा श्रेय फिल्मों को देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा उनसे बहुत पुरानी है।
*आस्था के साथ दिखावे की चुनौती* करवा चौथ की बढ़ती लोकप्रियता ने भारतीय बाजार को भी नया अवसर दिया है। कपड़ों, आभूषणों, मेहंदी, सौंदर्य प्रसाधनों और विशेष आयोजनों तक इसकी चमक दिखाई देती है।
होटल और बाजारों में विशेष आयोजन होते हैं तथा सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने का चलन बढ़ा है। इससे उत्सव का सामाजिक और व्यावसायिक स्वरूप भी विस्तृत हुआ है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या व्रत का महत्व उसकी सजावट और प्रदर्शन से तय होना चाहिए? किसी महिला के लिए व्रत रखना या न रखना उसका व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए।
दांपत्य संबंधों की मजबूती केवल उपवास से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, विश्वास, समानता और जिम्मेदारी से आती है। परंपरा तभी सार्थक है, जब वह स्वेच्छा और संवेदना के साथ निभाई जाए।
राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत हमें सिखाती है कि परंपराएं समय के साथ नए रूप ग्रहण करती हैं। करवा चौथ इसका एक उदाहरण है आस्था ने इसे जन्म दिया, लोकजीवन ने इसे संभाला और फिल्मों ने इसकी लोकप्रियता को नया विस्तार दिया। जरूरी यही है कि उत्सव की चमक के बीच उसके मूल भाव, पारस्परिक प्रेम और सांस्कृतिक आत्मीयता और भारत की सनातन संस्कृति को विस्मृत न होने दिया जाए।
