राजस्थान में दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई शुरू हो चुकी है, लेकिन मानसून जाते-जाते एक बार फिर प्रदेश के कई हिस्सों में सक्रिय होता दिखाई दे रहा है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने पश्चिमी राजस्थान सहित प्रदेश के कुछ हिस्सों से मानसून की वापसी की घोषणा की थी और राजधानी जयपुर सहित राज्य के कई हिस्सों में इस सोमवार को भी मूसलाधार वर्षा हुई।
मानसून के बाद के दिनों में बारिश के दौर ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मानसून की यह विदाई खरीफ फसलों के लिए वरदान साबित होगी या नुकसान का कारण बनेगी।
दरअसल, खरीफ की अधिकांश फसलें अब पकने और कटाई की ओर बढ़ रही हैं। ऐसे समय में बारिश का प्रभाव फसल की स्थिति, क्षेत्र और फसल की परिपक्वता पर निर्भर करेगा।
सितंबर के मध्य और अन्त में हुई बारिश ने मूंग, ग्वार, सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलों के लिए कई इलाकों में नमी की कमी को दूर करने में मदद की है।
कृषि क्षेत्र से जुड़े आकलनों में इस बारिश को कुछ फसलों के लिए संजीवनी बताया गया है लेकिन यही बारिश यदि लगातार या तेज होती रहती है तो तस्वीर बदल सकती है।
पक चुकी मूंग, मोठ, ग्वार और बाजरा जैसी फसलों में खेत में पानी भरने से दाने की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। तैयार फसल के गिरने, दाने में नमी बढ़ने तथा कटाई और मड़ाई में देरी का खतरा रहता है।
मूंगफली और सोयाबीन में भी अत्यधिक नमी रोग तथा फसल को खेत से निकालने में कठिनाई बढ़ा सकती है। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में फसल अभी पूरी तरह पकने की अवस्था में नहीं पहुंची है, वहां हल्की से मध्यम बारिश लाभकारी हो सकती है।
मिट्टी में उपलब्ध नमी फसल की अंतिम बढ़वार और दाना भरने की प्रक्रिया को सहारा दे सकती है। विशेष रूप से वर्षा आधारित खेती वाले पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में समय पर मिली नमी किसानों के लिए महत्वपूर्ण है।
इस वर्ष मानसून का देशव्यापी प्रदर्शन भी असमान रहा है। सितंबर के मध्य तक देश में मौसमी बारिश सामान्य से लगभग 15 प्रतिशत कम बताई गई थी।
ऐसे में राजस्थान के जिन क्षेत्रों में वर्षा की कमी रही, वहां अंतिम दौर की बारिश ने कुछ हद तक राहत की बात है।अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल बारिश की मात्रा नहीं, उसका समय और तीव्रता है।
यदि बारिश छिटपुट और नियंत्रित रहती है तो यह खरीफ की शेष अवधि के लिए उपयोगी नमी उपलब्ध करा सकती है। लेकिन तेज बारिश, आंधी और जलभराव फसल कटाई के समय किसानों की मुश्किल बढ़ा सकते हैं।
ऐसे में किसानों के लिए खेतों की निकासी व्यवस्था दुरुस्त रखना, पक चुकी फसल की कटाई में अनावश्यक देरी नहीं करना और कटाई के बाद उपज को सुरक्षित तथा सूखे स्थान पर रखना जरूरी होगा।
मौसम विभाग के स्थानीय पूर्वानुमानों पर लगातार नजर रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
जिन इलाकों में खरीफ फसलें पकने के अंतिम चरण में थीं और नमी की कमी थी, वहां यह हल्की बारिश संजीवनी साबित हो सकती है, जिससे पैदावार में थोड़ा सुधार हो सकता है।नुकसान की आशंका: जो फसलें कटाई के करीब हैं या खेतों में कटकर पड़ी हैं, उनमें नमी बढ़ने से दाने काले पड़ने, सड़ने और कीटों के लगने का खतरा बढ़ गया है।दलहन और तिलहन पर असर: पश्चिमी राजस्थान (जैसे जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर) में पहले ही सूखे और कम बारिश के कारण मूंग और मोठ का उत्पादन प्रभावित हुआ था, और इस अचानक बदलाव से गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है कुल मिलाकर, मानसून की विदाई के बीच राजस्थान में लौटी बारिश को एकतरफा तौर पर नुकसान या फायदा कहना उचित नहीं होगा।
अधपकी खरीफ के लिए यह राहत, जबकि कटाई के मुहाने पर खड़ी फसल के लिए यही बारिश जोखिम बन सकती है। अब सितंबर के अंतिम दिनों का मौसम ही तय करेगा कि मानसून की यह विदाई किसानों के लिए राहत की खबर बनती है या अतिरिक्त चुनौती की।
हालाँकि यह वर्षा आने वाले गर्मी में रेगिस्तानी प्रधान राजस्थान में पेयजल की कमी को पूरा करने के लिहाज से अवश्य लाभकारी साबित होगी।