दशहरा भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और नैतिक मूल्यों का ऐसा महापर्व है, जो युगों से मानवता को सत्य की विजय और असत्य के विनाश का संदेश देता आ रहा है। भगवान श्रीराम की रावण पर विजय केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि मानवीय जीवन में सद्गुणों की स्थापना और दुर्गुणों पर विजय का शाश्वत प्रतीक है। किंतु आज प्रश्न यह है कि प्रत्येक वर्ष रावण के पुतले जलाने के बाद भी समाज में अहंकार, भ्रष्टाचार, हिंसा, अन्याय और संवेदनहीनता क्यों बढ़ती दिखाई देती है?
क्या हमने दशहरे को उत्सव तक सीमित कर दिया है और उसके वास्तविक संदेश को जीवन से दूर कर दिया है?
रावण असाधारण विद्वता, शक्ति और सामर्थ्य का स्वामी था, किंतु उसका अहंकार उसके समस्त गुणों पर भारी पड़ गया। यही उसके पतन का कारण बना। आज भी जब कोई व्यक्ति सत्ता, संपत्ति, पद अथवा ज्ञान के मद में मानवीय मर्यादाओं को भूल जाता है, तब रावण की प्रवृत्ति नए रूप में जन्म लेती है। इस दृष्टि से रावण केवल इतिहास और धर्मग्रंथों का पात्र नहीं, बल्कि प्रत्येक युग के लिए आत्ममंथन का विषय है।
इसके विपरीत भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, करुणा और न्याय का आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों का परित्याग नहीं किया। उनकी विजय हमें सिखाती है कि शक्ति का वास्तविक मूल्य दूसरों को दबाने में नहीं, बल्कि निर्बलों की रक्षा करने और न्याय की स्थापना करने में है। यही आदर्श किसी भी सभ्य राष्ट्र की नैतिक आधारशिला होते हैं।
आज भारत विश्व में अपनी सांस्कृतिक विरासत, वैज्ञानिक उपलब्धियों, आर्थिक प्रगति और लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण विशिष्ट पहचान बना रहा है। लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक महानता केवल उसकी भौतिक समृद्धि से निर्धारित नहीं होती। उसकी असली शक्ति नागरिकों के चरित्र, सामाजिक सद्भाव, संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान और सार्वजनिक जीवन की ईमानदारी में निहित होती है। यदि विकास के साथ नैतिकता, अधिकारों के साथ कर्तव्य और समृद्धि के साथ संवेदनशीलता का विस्तार नहीं होता, तो प्रगति अधूरी रह जाती है।
भ्रष्टाचार, महिलाओं के प्रति हिंसा, सामाजिक भेदभाव, पर्यावरण की उपेक्षा, झूठ और अवसरवादिता जैसी चुनौतियाँ हमें याद दिलाती हैं कि बुराई का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन उसका मूल कारण अक्सर मानवीय स्वार्थ और नैतिक दुर्बलता ही होता है। इन समस्याओं का समाधान केवल कानूनों, भाषणों अथवा अभियानों से संभव नहीं; इसके लिए नागरिक चेतना, संस्थागत जवाबदेही और व्यक्तिगत आचरण में परिवर्तन आवश्यक है।
दशहरा हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है। क्या हम अपने व्यवहार में ईमानदार हैं? क्या हम दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं? क्या हम अन्याय देखकर उसके विरुद्ध आवाज उठाते हैं? क्या हम अपने लाभ के लिए सत्य और नैतिकता से समझौता कर लेते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर ही हमारे उत्सव की वास्तविक सार्थकता तय करता है।
आज आवश्यकता है कि हम रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से अपने दस दुर्गुणों—अहंकार, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, छल, हिंसा, अन्याय, स्वार्थ, असहिष्णुता और संवेदनहीनता—से जोड़कर देखें। जब तक ये दुर्गुण हमारे विचारों और व्यवहार में जीवित रहेंगे, तब तक बाहरी उत्सव आंतरिक परिवर्तन का विकल्प नहीं बन सकते।
राष्ट्रीय जीवन में दशहरे का संदेश और भी प्रासंगिक है। परिवारों में संस्कार, विद्यालयों में चरित्र निर्माण, प्रशासन में पारदर्शिता, राजनीति में जनसेवा, न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता और सामाजिक जीवन में परस्पर सम्मान—ये वे आधार हैं, जिन पर एक सशक्त, समतामूलक और संवेदनशील भारत का निर्माण किया जा सकता है। राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों का दायित्व नहीं; प्रत्येक नागरिक की ईमानदार भूमिका भी इसमें निर्णायक होती है।
हमें उत्सवों को सामाजिक एकता और जनकल्याण का माध्यम भी बनाना चाहिए। दशहरे के अवसर पर जरूरतमंदों की सहायता, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और बच्चों में नैतिक मूल्यों के विकास के लिए सामूहिक प्रयास किए जा सकते हैं। विजयादशमी का उत्सव तभी अधिक अर्थपूर्ण होगा, जब उसकी खुशियाँ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचें और किसी भी वर्ग के प्रति भेदभाव के बजाय सद्भाव का वातावरण निर्मित करें।
यह भी समझना आवश्यक है कि राम के आदर्शों को अपनाने का अर्थ केवल उनकी जय-जयकार करना नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, मर्यादा और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्ध होना है। किसी भी समाज में आदर्शों की प्रतिष्ठा तभी होती है, जब वे नारों से निकलकर व्यवहार में दिखाई देने लगते हैं।
अंततः दशहरा आत्मविजय का पर्व है। रावण का पुतला कुछ क्षणों में जलकर राख हो जाता है, लेकिन अपने भीतर के अहंकार और अन्याय को समाप्त करने के लिए निरंतर साधना करनी पड़ती है। सच्चा दशहरा वही है, जब व्यक्ति अपने दुर्गुणों पर विजय प्राप्त करे, समाज अन्याय के विरुद्ध एकजुट हो और राष्ट्र नैतिक मूल्यों के आधार पर विकास की नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करे।
आइए, इस विजयादशमी पर हम केवल रावण-दहन का दृश्य देखने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने आचरण में परिवर्तन का संकल्प लें। क्योंकि राष्ट्र का भविष्य केवल उसकी सीमाओं, संसाधनों और उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र और चेतना से निर्मित होता है।
जिस दिन मनुष्य अपने भीतर के रावण को पराजित करना सीख जाएगा, उसी दिन दशहरे का वास्तविक उद्देश्य साकार होगा और रामराज्य की कल्पना न्याय, समानता, सद्भाव तथा मानवीय गरिमा पर आधारित समाज के रूप में आगे बढ़ सकेगी।
— सत्य भूषण शर्मा
