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परमात्मा की वाणी से जीवन में आए बदलाव, तभी सार्थक होगी साधनाःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में प्रवचन, सहज सुख और आरोपित सुख के अंतर को समझाया

मुख्य बिंदु
  • वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शनिवार को आयोजित नियमित व्याख्यान में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को जीवन की सार्थकता, आत्मशुद्धि और वैराग्य के महत्व पर संबोधित किया।
  • उन्होंने कहा कि परमात्मा महावीर ने शासन की स्थापना के बाद जीवों के कल्याण, आत्मा की शुद्धि और आत्मस्वरूप की अनुभूति का मार्ग बताया।
  • परमात्मा ने अपनी देशना में संसार की असारता को समझाते हुए सहज सुख और आरोपित सुख के अंतर को स्पष्ट किया।
  • साध्वी श्री ने कहा कि इंद्रियों, बाहरी व्यवस्थाओं और विभिन्न क्रियाओं से मिलने वाला सुख आरोपित सुख है, जबकि भीतर से, स्वभाव और चेतना से उत्पन्न होने वाला सुख सहज एवं प्राकृतिक है।
  • मनुष्य का वास्तविक कल्याण बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और आंतरिक परिवर्तन में निहित है।
  • उन्होंने कहा कि परमात्मा की वाणी हमें भीतर तक भिगोना चाहती है।
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उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शनिवार को आयोजित नियमित व्याख्यान में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को जीवन की सार्थकता, आत्मशुद्धि और वैराग्य के महत्व पर संबोधित किया।

उन्होंने कहा कि परमात्मा महावीर ने शासन की स्थापना के बाद जीवों के कल्याण, आत्मा की शुद्धि और आत्मस्वरूप की अनुभूति का मार्ग बताया।

परमात्मा ने अपनी देशना में संसार की असारता को समझाते हुए सहज सुख और आरोपित सुख के अंतर को स्पष्ट किया।साध्वी श्री ने कहा कि इंद्रियों, बाहरी व्यवस्थाओं और विभिन्न क्रियाओं से मिलने वाला सुख आरोपित सुख है, जबकि भीतर से, स्वभाव और चेतना से उत्पन्न होने वाला सुख सहज एवं प्राकृतिक है।

मनुष्य का वास्तविक कल्याण बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और आंतरिक परिवर्तन में निहित है।उन्होंने कहा कि परमात्मा की वाणी हमें भीतर तक भिगोना चाहती है।

हमें विचार करना चाहिए कि हमने धर्मवाणी को पत्थर की तरह ग्रहण किया है या रुई की तरह, जो पानी को अपने भीतर तक सोख लेती है।

धर्मश्रवण तभी सार्थक है, जब उसका प्रभाव हमारे व्यवहार और जीवन में दिखाई दे।साध्वी श्री ने कहा कि साधना का उद्देश्य केवल बाहरी साधनों को प्राप्त करना नहीं, बल्कि शांति, समाधि और आत्मिक संतोष हासिल करना होना चाहिए।

आज मनुष्य बंगले और गाड़ी को सुख का साधन मानता है, जबकि वास्तविक सुख आत्मिक शांति में है। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी और साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने मधुर गीत प्रस्तुत किया।

प्रवचन में श्रावक-श्राविकाओं ने धर्मलाभ लिया।