मुख्य सामग्री पर जाएँ
बुधवार, 30 सितंबर 2026 उदयपुर · 29°C
MPUAT-NEWS

किसान हितैषी तकनीकों को ‘पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज’ में शामिल कर किसानों तक पहुंचाने पर जोर

एमपीयूएटी में दो दिवसीय ZREAC बैठक का समापन, 70 कृषि वैज्ञानिको तथा अधिकारियों ने लिया भाग

WAf𝕏TGin✉🖨
किसान हितैषी तकनीकों को ‘पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज’ में शामिल कर किसानों तक पहुंचाने पर जोर

उदयपुर। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में आयोजित दो दिवसीय क्षेत्रीय अनुसंधान एवं विस्तार सलाहकार समिति  का मंगलवार को समापन हुआ। बैठक में विश्वविद्यालय द्वारा किसानों के हित में किए जा रहे अनुसंधान, विकसित कृषि तकनीक, नई किस्मों तथा कृषि विस्तार गतिविधियों की समीक्षा की गई। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं विभिन्न विभागों के राजकीय अधिकारियों सहित लगभग 70 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

बैठक के दौरान किसानों के लिए उपयोगी नवीन कृषि तकनीकों पर विस्तृत चर्चा की गई। साथ ही किसानों के सामने आ रही विभिन्न समस्याओं, उनके व्यावहारिक समाधान तथा विश्वविद्यालय द्वारा विकसित तकनीकों को खेत स्तर तक पहुंचाने के संबंध में विचार-विमर्श किया गया। बैठक में विश्वविद्यालय में संचालित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना एवं राष्ट्रीय कृषि विकास योजना परियोजना के अंतर्गत पिछले एक वर्ष के दौरान किए गए कार्यों, अनुसंधान उपलब्धियों एवं प्रगति की भी समीक्षा की गई।

समापन सत्र में निदेशक अनुसंधान, डॉ. मनोज कुमार महला ने मेवाड़ क्षेत्र की प्रमुख फसल मक्का की विशेषताओं, इसके उत्पादन, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने स्थानीय कृषि उपज के बेहतर उपयोग एवं प्रसंस्करण के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने सीताफल जैसी स्थानीय उपज के मूल्य संवर्धन एवं प्रसंस्करण के माध्यम से कृषकों की आय में वृद्धि के अवसरों की जानकारी भी दी।

डॉ. सुधीर वर्मा संयुक्त निदेशक, कृषि (विस्तार), उदयपुर ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित सभी किसान हितैषी तकनीकों को प्रभावी रूप से पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज में शामिल कर किसानों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्होंने कृषि मशीनरी एवं आधुनिक कृषि यंत्रों के अधिकाधिक प्रचार-प्रसार पर जोर देते हुए कहा कि किसानों को समय पर उचित कृषि मशीनरी की जानकारी एवं उपलब्धता सुनिश्चित होने से कृषि कार्यों में समय एवं श्रम की बचत होगी तथा किसानों को इसका प्रत्यक्ष लाभ मिल सकेगा। उन्होंने कृषि में बायोचार के उपयोग, इसके लाभ एवं मृदा स्वास्थ्य सुधार में इसकी भूमिका के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।

अतिरिक्त निदेशक कृषि, भीलवाड़ा, डॉ. के.सी. मीणा ने विश्वविद्यालय द्वारा किए जा रहे अनुसंधान एवं कृषि विकास कार्यों की सराहना की। उन्होंने राजकीय अधिकारियों से आह्वान किया कि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई किस्मों एवं किसान हितैषी तकनीकों का व्यापक प्रचार-प्रसार कर इन्हें अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि वर्तमान में खाद्यान्न एवं सब्जियों का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में हो रहा है, ऐसे में उत्पादन के साथ-साथ कृषि उत्पादों की गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

बैठक में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों एवं राजकीय विभागों के अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा अनुसंधान को किसानों की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया। प्रतिभागियों ने किसान समस्याओं के समाधान के लिए अनुसंधान, विस्तार एवं विभागीय समन्वय को और मजबूत करने की आवश्यकता व्यक्त की।

समापन अवसर पर क्षेत्रीय अनुसंधान अधिकारी डॉ. एस.एस. लखावत ने कहा कि दो दिवसीय बैठक के दौरान वैज्ञानिकों एवं कृषि विभाग के अधिकारियों के बीच विस्तृत विचार-विमर्श के उपरांत विश्वविद्यालय द्वारा विकसित 15 नई कृषि तकनीको एवं फसल किस्मों को क्षेत्रीय फसलों की पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज पुस्तिका में शामिल करने हेतु कृषि विभाग को अनुशंसा भेजने का निर्णय लिया गया। इसके साथ ही 10 कृषि तकनीकी केन्द्रों (ATCs) से संबंधित प्रौद्योगिकियों/सिफारिशों को पुनरावलोकन हेतु कृषि तकनीकी केन्द्र, चित्तौड़गढ़ भेजने का निर्णय भी लिया गया।