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क्षमावाणी: आत्मशुद्धि से विश्वबंधुत्व तक

क्षमा केवल शब्द नहीं, मनुष्य के भीतर से वैर मिटाने की जीवन-दृष्टि है

मुख्य बिंदु
  • मनुष्य के जीवन में कुछ पर्व ऐसे होते हैं, जो केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, बल्कि आत्ममंथन का अवसर बन जाते हैं।
  • क्षमावाणी पर्व ऐसा ही एक पावन अवसर है।
  • यह हमें याद दिलाता है कि जीवन में हमसे जाने-अनजाने भूलें होती हैं, हम किसी के मन को ठेस पहुँचा सकते हैं और कभी-कभी अपने अहंकार, क्रोध या स्वार्थ के कारण संबंधों में दूरी पैदा कर देते हैं।
  • क्षमावाणी इन सब पर पुनर्विचार करने और मन को निर्मल बनाने का संदेश देती है।
  • जैन परंपरा में क्षमावाणी पर्व आत्मावलोकन, प्रायश्चित और परस्पर क्षमा-याचना से जुड़ा है।
  • दशलक्षण पर्व के समापन के बाद मनाया जाने वाला यह पर्व व्यक्ति को अपने आचरण की समीक्षा करने और सभी जीवों के प्रति मैत्रीभाव विकसित करने की प्रेरणा देता है।
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क्षमावाणी: आत्मशुद्धि से विश्वबंधुत्व तक

मनुष्य के जीवन में कुछ पर्व ऐसे होते हैं, जो केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, बल्कि आत्ममंथन का अवसर बन जाते हैं। क्षमावाणी पर्व ऐसा ही एक पावन अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन में हमसे जाने-अनजाने भूलें होती हैं, हम किसी के मन को ठेस पहुँचा सकते हैं और कभी-कभी अपने अहंकार, क्रोध या स्वार्थ के कारण संबंधों में दूरी पैदा कर देते हैं। क्षमावाणी इन सब पर पुनर्विचार करने और मन को निर्मल बनाने का संदेश देती है।

जैन परंपरा में क्षमावाणी पर्व आत्मावलोकन, प्रायश्चित और परस्पर क्षमा-याचना से जुड़ा है। दशलक्षण पर्व के समापन के बाद मनाया जाने वाला यह पर्व व्यक्ति को अपने आचरण की समीक्षा करने और सभी जीवों के प्रति मैत्रीभाव विकसित करने की प्रेरणा देता है।

क्षमा—कमजोरी नहीं, आत्मबल है सामान्य जीवन में क्षमा को कई बार कमजोरी समझ लिया जाता है। वास्तव में किसी के प्रति मन में पल रहे क्रोध, प्रतिशोध और कटुता को छोड़ देना अत्यंत बड़ा आत्मबल मांगता है। बदला लेना आसान हो सकता है, लेकिन क्षमा करना मन की ऊँचाई का परिचायक है।

क्षमा का अर्थ यह नहीं कि अन्याय को सही मान लिया जाए अथवा गलत कार्य का समर्थन किया जाए। क्षमा का वास्तविक अर्थ है—अपने भीतर से द्वेष को समाप्त करना और स्वयं को नकारात्मक भावनाओं के बंधन से मुक्त करना। जब मनुष्य किसी के प्रति वर्षों से संचित शिकायत को छोड़ देता है, तो सबसे पहले उसके अपने मन को शांति मिलती है।

‘मैं सही हूँ’ से ‘मुझसे भी भूल हो सकती है’ तक आज का मनुष्य ज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ रहा है, लेकिन संबंधों में छोटी-छोटी बातों को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। परिवार में संवाद कम हो रहा है, सामाजिक जीवन में असहिष्णुता दिखाई देती है और डिजिटल माध्यमों पर शब्दों के माध्यम से एक-दूसरे को आहत करना आसान हो गया है।

ऐसे समय में क्षमावाणी का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।

यदि हम अपने जीवन में केवल इतना स्वीकार कर लें कि “मुझसे भी गलती हो सकती है”, तो अनेक विवाद वहीं समाप्त हो सकते हैं। क्षमा माँगना स्वयं को छोटा करना नहीं, बल्कि अपने अहंकार से बड़ा होना है।

क्षमा की शुरुआत स्वयं से दूसरों से क्षमा माँगने से पहले मनुष्य को स्वयं के भीतर झाँकना चाहिए। क्या मेरे शब्दों से किसी को चोट पहुँची? क्या मेरे व्यवहार से किसी का आत्मसम्मान आहत हुआ? क्या मैंने किसी के प्रति पूर्वाग्रह रखा? क्या मेरे क्रोध ने किसी रिश्ते को कमजोर किया?

इन प्रश्नों का ईमानदारी से उत्तर देना ही आत्मशुद्धि की पहली सीढ़ी है।

जैन दर्शन में क्षमा और आत्मावलोकन का संबंध गहरा है। क्षमावाणी के अवसर पर अपने दोषों को स्वीकार करने, प्रायश्चित करने और वैरभाव छोड़ने की परंपरा बताई गई है।

‘मिच्छामि दुक्कडम्’ की भावना क्षमावाणी के अवसर पर प्रचलित ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ की भावना का आशय है कि जाने-अनजाने हुए दुष्कर्म या भूलें मिथ्या हों और उनके लिए क्षमा-याचना की जाए। जैन परंपरा में सभी जीवों से क्षमा माँगने और सभी जीवों को क्षमा करने की भावना व्यक्त की जाती है।

इस भावना का व्यापक मानवीय संदेश किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यदि मनुष्य दूसरे के प्रति बैर रखने के बजाय मैत्रीभाव विकसित करे, तो परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र तक संवाद एवं सद्भाव का वातावरण मजबूत हो सकता है।

आज की दुनिया को क्षमा की आवश्यकता आज दुनिया अनेक प्रकार के तनावों से गुजर रही है। विचारों का मतभेद कई बार मनभेद में बदल जाता है। सोशल मीडिया पर असहमति शीघ्र ही कटुता का रूप ले लेती है। व्यक्तिगत संबंधों में अहंकार दीवार खड़ी कर देता है।

ऐसे वातावरण में क्षमा का अर्थ और भी व्यापक हो जाता है। हमें केवल व्यक्तिगत जीवन में ही नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार में भी संवाद, सहिष्णुता, करुणा और परस्पर सम्मान को स्थान देना होगा।

एक क्षमा किया हुआ व्यक्ति केवल एक संबंध नहीं बचाता; वह कभी-कभी पूरे परिवार का वातावरण बदल देता है। एक शिक्षक की क्षमा विद्यार्थी के भीतर आत्मविश्वास जगा सकती है। माता-पिता की क्षमा बच्चे को अपनी भूल सुधारने का अवसर दे सकती है। मित्र की क्षमा टूटती मित्रता को पुनः जोड़ सकती है।

क्षमा माँगना भी संस्कार है हम अक्सर चाहते हैं कि सामने वाला पहले क्षमा माँगे। क्षमावाणी हमें इस मानसिकता से बाहर निकलने की प्रेरणा देती है। संबंधों में पहला कदम कौन उठाए—यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए; महत्वपूर्ण यह है कि वैर समाप्त हो।

कभी-कभी एक छोटा-सा वाक्य— “यदि मेरी किसी बात या व्यवहार से आपको दुःख पहुँचा हो तो मुझे क्षमा करें” दो मनुष्यों के बीच वर्षों से खड़ी दीवार को गिरा सकता है।

इसी तरह यदि कोई हमारे पास अपनी भूल स्वीकार करते हुए आए तो उसे क्षमा करने का साहस भी हमारे भीतर होना चाहिए।

क्षमा से बेहतर समाज की ओर क्षमा का अंतिम लक्ष्य केवल व्यक्तिगत शांति नहीं, बल्कि बेहतर समाज का निर्माण भी है। जहाँ मनुष्य अपनी भूल स्वीकार कर सके, वहाँ अहंकार कम होगा। जहाँ दूसरों की भूल को सुधार का अवसर मिले, वहाँ संबंध मजबूत होंगे। जहाँ मतभेद के बावजूद सम्मान बना रहे, वहाँ सामाजिक सौहार्द बढ़ेगा।

इसलिए क्षमावाणी को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय जीवन-मूल्यों के उत्सव के रूप में भी समझा जाना चाहिए। जैन परंपरा में यह पर्व सार्वभौमिक क्षमा, आत्मचिंतन और मैत्री की भावना से जुड़ा है।

अंततः… क्षमा वह दीपक है जो दूसरे के अंधकार से पहले हमारे अपने मन का अंधकार दूर करता है। क्षमा वह जल है जो वर्षों से जमा मन-मल को धो सकता है। क्षमा वह शक्ति है जो टूटे संबंधों में फिर से संवाद का मार्ग खोल सकती है।

इस क्षमावाणी पर्व पर हम केवल औपचारिक रूप से क्षमा न माँगें, बल्कि अपने भीतर झाँकें। जिनसे भूल हुई है, उनसे क्षमा माँगें; जिन्होंने हमें दुख दिया है, उन्हें क्षमा करने का प्रयास करें और आगे के जीवन में अपने शब्दों तथा कर्मों के प्रति अधिक सजग रहें।

क्योंकि सच्ची क्षमा वही है, जो केवल होंठों से नहीं, हृदय से निकले।

मिच्छामि दुक्कडम्।

-सत्य भूषण शर्मा, उदयपुर (राजस्थान)