कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन... अर्थात, मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। इसलिए फल की चिंता किए बिना अपना कर्तव्य करें।
निष्काम कर्म का दुनिया को संदेश देने वाले भगवान कृष्ण न केवल भारत के असंख्य भक्तों की आस्था,विश्वास,श्रद्धा की वजह से प्रमुख देवताओं में अपना स्थान रहते हैं वरन अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) के माध्यम से विश्व के कई देशों में पूजे जाते हैं।
कृष्ण ने न केवल निष्काम कर्म का मार्ग दिखाया वरन उन्होंने कहा आत्मा अमर है, समत्व ही योग है, अपने स्वधर्म का पालन करो, अपने मन को अभ्यास और वैराग्य से वश में करो, भक्ति सबसे सुलभ मार्ग है, ईश्वर सर्वव्यापी है, ध्यान से आत्म-साक्षात्कार होता है, काम-क्रोध-लोभ नरक के द्वार हैं एवं ईश्वर की शरण में जाओ।
कालांतर में यही उपदेश जग के लिए कृष्ण की शिक्षा और जीवन के आध्यात्म का आधार बन गई। उनके संदेश वर्तमान परिस्थितियों में भी पूर्ण प्रासंगिक हैं।
श्याम या नीलवर्ण, सर पर मोर मुकट धारण किए, हाथों में बांसुरी लिए अथवा बांसुरी बजाते और बाएं पैर को दांए पैर पर डाले त्रिभंग मुद्रा वाले कृष्ण का जन्म मथुरा नरेश कंस के कारागृह में भाद्रपद मास की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र, मीन लग्न में अर्ध-रात्रि के समय के समय हुआ जहां उनकी माता देवकी और पिता वासुदेव बन्दी बनाकर रखा गया था।
जन्म के साथ ही कारागृह दिव्य प्रकाश से आलोकित हो गया। दिव्य ज्योतियुक्त कृष्ण, दिव्य आभूषण और मुरली धारण किए हुए थे।
वासुदेव भगवान के इस रूप को पहचान गए और उन्होंने उनकी स्तुति की। कंस के अत्याचार से बचाने के लिए रातों रात बालक कृष्ण को गोकुल में नंद - यशोदा घर भेज दिया।
देवकी की गोद में प्रभु की माया से लड़की आ गई। इसकी हत्या करना व्यर्थ समझ कर कंस ने वासुदेव और देवकी को कारागृह से मुक्त कर दिया।
वासुदेव इसको नंद के घर चले गए । यह लड़की, पार्वती का अवतार थीं और कृष्ण के परिणय-बंधन के समय उसे भी विधि- विधानानुसार शिवावतार महर्षि दुर्वासा को समर्पित कर दिया गया था।
इस प्रकार कृष्ण, जो 'एक ही हैं', अजन्मा और सर्वव्याप्त हैं, शरीर धारण कर जगत् में प्रकट हुए।
बासुदेव की देवकी के अतिरिक्त दूसरी पत्नी रोहिणी थी। देवकी-वासुदेव को कारागृह में बन्दी बना दिए जाने पर बासुदेव ने रोहिणी को गोकुल में नन्द की सुरक्षा में भेज दिया था।
रोहिणी की कोख से बलराम उत्पन्न हुए थे। आगे चलकर, कृष्ण की मुरली और बलदाऊ का हल उनकी पहचान बने ।
कृष्ण ने दुष्ट मामा कंस का वध कर प्रजा को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई और धर्म की स्थापना की। श्रीकृष्ण को हिंदू धर्म में भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता हैं, जिन्हें प्रेम, करुणा और ज्ञान के सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाता है।
उन्होंने महाभारत में अर्जुन के सारथी बनकर श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दियाएवं ब्रज में अपनी लीलाओं से प्रेम का पाठ पढ़ाया। महाभारत काल में द्रौपदी का चीर बढ़ा कर नारी के प्रति सम्मान का महत्व प्रतिपादित किया।
बाबा नन्द के यहां पल कर कृष्ण बड़े हुए। अपने हाथों और घुटनों पर रेंगते हुए ,नृत्य करते हुए , माखन चुरा कर पकड़े जाने पर यशोदा मैया की प्यारी प्यारी झिड़की सुनना, साथी मित्र ग्वाल बाल को चुराकर मक्खन देते हुए, लड्डू को अपने हाथ में लेकर चलते हुए, चन्दा मामा को लेने के लिए कृष्ण का हठ और माँ यशोदा कठौते के पानी में चाँद का प्रतिबिम्ब दिखाकर उन्हें संतुष्ट करना आदि - आदि बाल लीलाओं से मैया यशोदा को खूब रिझाते हैं।
कवि सूरदास ने कृष्ण की बाल-क्रीड़ा, बाल-सुलभ चपलता आदि के जो नयनाभिराम शब्द चित्र पदों में गढ़े हैं, वे हिन्दी साहित्य के अद्वितीय और अनमोल धरोहर बन गए हैं।
एक दृष्टांत देखते हैं......... मैया मैं तो चाँद खिलौना लै हौं।'
'मैया मेरी कबर्बाह बढ़ेगी चोटी ।'
'मैया मोहि दाऊ बहुत खिजायो ।'
'मैया मोरी मैं नहि माँखन खायो।' श्रीकृष्ण के अनेक रूप अथवा अवतार हमारे सामने आते हैं।
बाल लीलाओं के साथ - साथ वे गोपाल एवं मुरलीधर के रूप में यमुना किनारे बंसी बजाकर ब्रजवासियों और पशु-पक्षियों को मंत्रमुग्ध करते हैं, रासेश्वर के रूप में गोपियों के साथ महारास रचने वाले प्रेम के देवता , द्वारकाधीश या यादवेंद्र के रूप में यादव वंश के रक्षक और द्वारका के राजा, गयोगेश्वर के रूप में कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिव्य ज्ञान और अपना विराट स्वरूप दिखाने वाले, तथा कूटनीतिज्ञ के रूप में सारथी बन कर महाभारत युद्ध में पांडवों के मार्गदर्शक के रूप में दिखाई देते हैं।
साथ ही कृष्ण को कई नामों श्याम, गोपाल, गोविंद, वासुदेव, माधव, मुरलीधर, केशव, दामोदर और मोहन, नटवर आदि से बुलाया जाता है।
भगवान कृष्ण का कर्मक्षेत्र प्रमुख रूप से सम्पूर्ण बृज भूमि मथुरा, वृंदावन, गोकुल और बरसाना उनका प्रारंभिक कर्मक्षेत्र रहा है। यहाँ उन्होंने कंस के अत्याचारों का अंत किया, ग्वालों के साथ अपनी बाल लीलाएं कीं, गोवर्धन पर्वत उठाया और कालिया नाग का दमन किया।
कुरुक्षेत्र में धर्म, ज्ञान और कर्म के महासंग्राम की भूमि में महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई और युद्ध के मैदान में विश्व प्रसिद्ध भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग का ज्ञान दिया।
द्वारका में यदुवंश की रक्षा और सुशासन के लिए उन्होंने समुद्र तट पर द्वारकापुरी का निर्माण किया। यहाँ उन्होंने एक आदर्श राजा, रणनीतिकार और मार्गदर्शक के रूप में अपने कर्मक्षेत्र का विस्तार किया।
कृष्ण के जीवन और पारिवारिक स्वरूप को देखें तो उलझा हुआ प्रतीत होता है। एक माँ ने जन्म दिया दूसरी माँ ने पालन पोषण किया।
इनकी माता देवकी और पिता वासुदेव थे। पालन करने वाली माता यशोधा और पिता बाबा नंद थे।
इनकी शिक्षा सांदीपनि मुनि के आश्रम में हुई। इनके भाई नेमिनाथ, बलराम और गद थे तथा बहिनें एकानंगा ( यशोधा की पुत्री,सुभद्रा और द्रौपदी (मानस भगिनी) थी।
कृष्ण की आठ पत्नियां रुक्मिणी, जाम्बवंती, सत्यभामा, मित्रवंदा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी थी । नरकासुर के कारागार से मुक्त कराई गई 16,110 स्त्रियों को पत्नी का दर्जा दिया।
राधा जी का नाम रानियों की सूची में नहीं है क्योंकि वे कृष्ण के साथ प्रेम और आत्मा के मिलन का शाश्वत प्रतीक मानी जाती हैं, न कि लौकिक विवाह का।
रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न थे, जिन्हें कामदेव का अवतार माना जाता है। कृष्ण ने सुभद्रा का विवाह अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन से और अपने पुत्र साम्ब का विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से किया था।
एक बालुका व्याध (शिकारी) के तीर लगने से इन्होंने देह त्याग दी। कृष्ण जीवन चरित्र को व्यापक रूप से जानने के लिए महाभारत, भगवद् गीता, गीत गोविंद, भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, विष्णु पुराण, गर्ग संहिता एवं हरिवंश प्रमुख ग्रन्थ हैं।
भागवत पुराण और विष्णु पुराण में कृष्ण की कहानी की सबसे विस्तृत जानकारी है।
लड्डू गोपाल के रूप में कृष्ण की पूजा बहुत ही समर्पण और प्रेम से की जाती है। वैष्णव मत के भक्त अपने पूजा स्थल पर लड्डू गोपाल को अपने पुत्र की तरह दिल से लगा कर पूजा करते हैं।
वे प्रवास पर जाते समय इन्हें साथ ले जाते हैं। कहते हैं लड्डू गोपाल की पूजा सच्चे मन, प्रेम और समर्पण से की जानी चाहिए।
सुबह स्नान के बाद भगवान कृष्ण या लड्डू गोपाल की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं, चंदन का तिलक लगाकर, फूल, तुलसी दल (पत्ती), और भोग (मक्खन-मिश्री) अर्पित करें।
पीले वस्त्र, मोर पंख, चंदन, रोली, और इत्र लगाएं। भोग में तुलसी दल दल कर मक्खन, मिश्री, मिठाई, और ऋतु फल अर्पित करें और धूप-दीप जलाकर आरती करें और “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
भगवान कृष्ण से संबंधित प्रमुख पर्व कृष्ण जन्माष्टमी है, जो भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को उनके जन्म के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। अन्य प्रमुख त्योहारों में दही-हांडी, राधाष्टमी, गोवर्धन पूजा, और दीपावली (नरक चतुर्दशी) शामिल हैं, जो उनकी लीलाओं और जीवन से प्रेरित हैं। कृष्ण की रासलीला और बरसाने की होली भी लोकप्रिय पर्व हैं। ये सभी पर्व सामूहिक नृत्य, भजन गायन और कृष्ण पूजा के साथ पूरे उत्साह से मनाए जाते हैं।
भगवान कृष्ण के हजारों मंदिर भारत और विदेशों में है। भारत में प्रमुख कृष्ण मंदिर भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण की लीलाओं और आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उत्तर प्रदेश के मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर, कृष्ण की जन्मस्थली में है। ब्रज क्षेत्र में बांके बिहारी मंदिर, प्रेम मंदिर, यमुना के तट पर द्वारकाधीश मंदिर, वृंदावन का गोविंद देव मंदिर प्रसिद्ध हैं।
गुजरात के द्वारका में द्वारकाधीश मंदिर, भेंट द्वारका में राजा के रूप में कृष्ण महल मंदिर, राजस्थान के श्रीनाथद्वारा में श्रीनाथजी मंदिर, जयपुर में गोबिंद देव मंदिर ,चित्तौड़गढ़ में सांवलिया सेठ मंदिर, सीकर जिले में खाटू श्याम मंदिर, ओडिशा के पुरी में रथ यात्रा के लिए विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर, पुरी:जहाँ कृष्ण के साथ बलराम और सुभद्रा की पूजा होती है, दक्षिण भारत के कर्नाटक में उडुपी श्रीकृष्ण मठ, केरल में गुरुवायुर मंदिर, चेन्नई में पार्थसारथी मंदिर प्रमुख कृष्ण मंदिर हैं।
हरे कृष्णा हरे राम के अनुयाई अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (इस्कॉन) की स्थापना 1966 में एक भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा न्यूयॉर्क में की गई थी ।
आज दुनिया भर में अनेक मंदिर और 1000 से अधिक केंद्र हैं जो सभी महाद्वीपों में फैले हुए हैं। भारत में ही लगभग 400 से अधिक मंदिर हैं।
कृष्ण और राधा को समर्पित ये मंदिर अपनी भव्यता, आध्यात्मिक शांति और 'हरे कृष्ण' संकीर्तन के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों के माध्यम से कृष्ण भक्ति को वैश्विक फलक पर महसूस किया जा सकता है।
लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल डॉ. वैदेही गौतम
