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Udaipur News

मोक्ष चाहिए तो अपना पुरुषार्थ करना होगाःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

महावीर की साधना से प्रेरणा लेकर पर्युषण पर्व की तैयारी का किया आह्वान

मुख्य बिंदु
  • वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने मंगलवार को भगवान महावीर की साधना, आत्मशुद्धि और श्रद्धा के महत्व पर प्रकाश डाला।
  • उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने 30 वर्ष की युवावस्था में संयम स्वीकार किया।
  • उस समय इंद्र महाराजा ने उनसे कहा कि केवलज्ञान प्राप्ति तक उन्हें अनेक भयंकर उपसर्ग सहने पड़ेंगे।
  • इंद्र ने महावीर के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते हुए उनके कष्ट दूर करने की अनुमति मांगी, लेकिन भगवान महावीर ने स्पष्ट किया कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए आत्मा को स्वयं पुरुषार्थ से शुद्ध करना होगा।
  • साध्वीश्री ने कहा कि “किसी के सहयोग से केवलज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, कर्मों की निर्जरा स्वयं करनी पड़ती है।
  • ” उन्होंने कहा कि सच्चे प्रेम का अर्थ है अपने प्रिय को कष्ट में न देख पाना, लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर साधक को अपने पुरुषार्थ से ही आगे बढ़ना होता है।
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उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने मंगलवार को भगवान महावीर की साधना, आत्मशुद्धि और श्रद्धा के महत्व पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने 30 वर्ष की युवावस्था में संयम स्वीकार किया। उस समय इंद्र महाराजा ने उनसे कहा कि केवलज्ञान प्राप्ति तक उन्हें अनेक भयंकर उपसर्ग सहने पड़ेंगे।

इंद्र ने महावीर के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते हुए उनके कष्ट दूर करने की अनुमति मांगी, लेकिन भगवान महावीर ने स्पष्ट किया कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए आत्मा को स्वयं पुरुषार्थ से शुद्ध करना होगा।साध्वीश्री ने कहा कि “किसी के सहयोग से केवलज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, कर्मों की निर्जरा स्वयं करनी पड़ती है।” उन्होंने कहा कि सच्चे प्रेम का अर्थ है अपने प्रिय को कष्ट में न देख पाना, लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर साधक को अपने पुरुषार्थ से ही आगे बढ़ना होता है।पर्युषण पर्व की निकटता का उल्लेख करते हुए साध्वीश्री ने कहा कि यह आत्मशुद्धि का अवसर है।

जैसे सरोवर का जल शरीर की प्यास, गर्मी और मैल दूर करता है, वैसे ही पर्युषण आत्मा के विकारों और कर्मों की मलिनता को दूर करने का माध्यम है।

उन्होंने श्रावकों से पर्व की तैयारी श्रद्धा और आत्मचिंतन के साथ करने का आह्वान किया।उन्होंने कहा कि श्रावक जीवन के लिए सच्ची श्रद्धा आवश्यक है।

केवल आंखों से दिखाई देने वाली बात या बुद्धि से समझ में आने वाली बात ही अंतिम सत्य नहीं है, बल्कि गुरु भगवंत और परमात्मा की आज्ञा को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना ही सम्यक दर्शन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।