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झीलों की नगरी में बह रहा ‘गटर का पानी’! उदयपुर की झीलों पर मंडरा रहा बड़ा संकट

एमएलएसयू के प्रोफेसर देवेंद्र सिंह चौहान की स्टडी में चौंकाने वाले खुलासे, उदयसागर और रूपसागर की स्थिति सबसे चिंताजनक

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झीलों की नगरी में बह रहा ‘गटर का पानी’! उदयपुर की झीलों पर मंडरा रहा बड़ा संकट
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उदयपुर। झीलों की खूबसूरती और अपनी ऐतिहासिक जल व्यवस्था के लिए दुनिया भर में पहचान रखने वाले उदयपुर के सामने अब एक गंभीर जल संकट खड़ा हो गया है। शहर की झीलों और आयड़ नदी में पहुंच रहे सीवरेज ने न केवल जल स्रोतों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भूजल और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी चिंता बढ़ा दी है।

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देवेंद्र सिंह चौहान द्वारा उदयपुर की प्रमुख झीलों और आयड़ नदी के पानी पर की गई स्टडी में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। स्टडी के दौरान फतहसागर, पिछोला, दूध तलाई, बड़ी तालाब, उदयसागर, गोवर्धन सागर और स्वरूपसागर से पानी के सैंपल लिए गए और विभिन्न मानकों पर उनकी जांच की गई।

🚨 उदयसागर सबसे ज्यादा चिंताजनक

स्टडी के अनुसार उदयसागर की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक सामने आई है। यहां फीकल कोलीफॉर्म का स्तर बेहद अधिक पाया गया। विशेषज्ञ के मुताबिक भारतीय मानकों के अनुसार 100 एमएल पानी में फीकल कोलीफॉर्म की मौजूदगी शून्य होनी चाहिए, जबकि उदयसागर में इसका स्तर 1600 से भी अधिक पाया गया।

फीकल कोलीफॉर्म और ई-कोलाई जैसे जीवाणु दूषित जल से फैलने वाली गंभीर बीमारियों का संकेत माने जाते हैं।

प्रोफेसर चौहान के अनुसार उदयपुर शहर का अपशिष्ट जल आयड़ नदी के रास्ते उदयसागर तक पहुंच रहा है। शहर की ओर बढ़ने के साथ नदी के पानी में प्रदूषण के स्तर में लगातार वृद्धि दिखाई देती है।

💧 आयड़ नदी में बढ़ता प्रदूषण

स्टडी के दौरान आयड़ नदी के अलग-अलग हिस्सों से भी पानी के सैंपल लिए गए। चिकलवास फीडर से लेकर सुखानाका तक नदी का अध्ययन किया गया।

जैसे-जैसे नदी शहर की ओर बढ़ती है, पानी में फीकल कोलीफॉर्म, ई-कोलाई, टीडीएस और टर्बिडिटी जैसे मानकों में वृद्धि देखी गई। कई स्थानों पर नदी में सीवरेज का पानी सीधे पहुंचता हुआ दिखाई दिया।

नदी किनारे साबुन के झाग और कचरे की मौजूदगी भी प्रदूषण की गंभीर स्थिति की ओर इशारा करती है।

⚠️ रूपसागर की हालत भी बेहद खराब

प्रोफेसर चौहान ने रूपसागर की स्थिति को भी बेहद चिंताजनक बताया। उनके अनुसार झील में आसपास की कॉलोनियों का पानी पहुंच रहा है और जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण प्रदूषित पानी लगातार जमा हो रहा है।

स्टडी के दौरान रूपसागर के आसपास मरी हुई मछलियां भी दिखाई दीं। इसके अलावा झील के कैचमेंट क्षेत्र और आसपास हुए निर्माण तथा मार्बल स्लरी से जुड़े प्रदूषण को भी गंभीर समस्या बताया गया।

🏞️ फतहसागर और पिछोला फिलहाल बेहतर

स्टडी में फतहसागर, पिछोला और बड़ी तालाब के पानी में कुछ मानकों पर अंतर जरूर पाया गया, लेकिन फीकल कोलीफॉर्म जैसे गंभीर प्रदूषक इन सैंपलों में नहीं पाए गए।

हालांकि विशेषज्ञ का कहना है कि झीलों के पानी और उनसे जुड़े भूजल तंत्र को अलग-अलग स्तर पर समझना जरूरी है।

🏠 बोरवेल के पानी पर भी सवाल

सबसे बड़ी चिंता उन इलाकों को लेकर जताई गई है जहां लोग बोरवेल और हैंडपंप के पानी पर निर्भर हैं। झीलों और नदियों से दूषित पानी जमीन में रिसने के कारण भूजल की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है।

विशेषज्ञ ने ऐसे क्षेत्रों में बोरवेल के पानी की नियमित जांच की जरूरत पर जोर दिया है।

🏛️ सदियों पुरानी जल व्यवस्था पर बड़ा सवाल

उदयपुर की झीलें केवल खूबसूरती का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि इन्हें मेवाड़ के शासकों ने भविष्य की जल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया था। एक झील के भरने के बाद दूसरी झील में पानी पहुंचाने वाली पूरी जल प्रणाली उदयपुर की ऐतिहासिक पहचान रही है।

आज वही जल व्यवस्था सीवरेज और अव्यवस्थित विकास के दबाव में है।

अगर झीलें और आयड़ नदी नहीं बचीं, तो उदयपुर की पहचान ही संकट में पड़ सकती है।

अब सवाल सिर्फ झीलों की सुंदरता का नहीं, बल्कि पानी, पर्यावरण, भूजल और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है।

क्या उदयपुर अब जागेगा?

यह स्टडी प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और शहरवासियों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—
करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि सीवरेज का पानी झीलों और नदियों तक पहुंच रहा है, तो आखिर व्यवस्था में कमी कहां है?

उदयपुर की झीलों को बचाना अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि शहर के अस्तित्व का सवाल बन चुका है।