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पर्यूषण : स्वयं से संवाद और समाज से सद्भाव का पर्व क्षमा और संयम के माध्यम से अंतर्मन को निर्मल करने तथा रिश्तों में विश्वास लौटाने का संदेश

-सत्य भूषण शर्मा प्रवक्ता, पत्रकार, लेखक, कवि एवं यूट्यूबर, उदयपुर (राजस्थान)

मुख्य बिंदु
  • भारतीय संस्कृति में पर्व केवल तिथि विशेष पर होने वाला उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले संस्कार हैं।
  • वे हमें कभी प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाते हैं तो कभी अपने कर्मों का मूल्यांकन करने की प्रेरणा देते हैं।
  • पर्यूषण पर्व इसी महान परंपरा का हिस्सा है, जो मनुष्य को बाहरी आडंबर से हटाकर अपने अंतर्मन की ओर देखने का अवसर प्रदान करता है।
  • आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं से समृद्ध होते हुए भी मानसिक अशांति से घिरा हुआ है।
  • उसके पास संवाद के लिए अनेक माध्यम हैं, लेकिन संवाद की आत्मीयता कम होती जा रही है।
  • रिश्ते हैं, मगर उनमें धैर्य कम है; ज्ञान है, मगर विवेक का अभाव दिखाई देता है; विकास है, मगर संतोष पीछे छूटता जा रहा है।
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पर्यूषण : स्वयं से संवाद और समाज से सद्भाव का पर्व क्षमा और संयम के माध्यम से अंतर्मन को निर्मल करने तथा रिश्तों में विश्वास लौटाने का संदेश

भारतीय संस्कृति में पर्व केवल तिथि विशेष पर होने वाला उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले संस्कार हैं। वे हमें कभी प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाते हैं तो कभी अपने कर्मों का मूल्यांकन करने की प्रेरणा देते हैं। पर्यूषण पर्व इसी महान परंपरा का हिस्सा है, जो मनुष्य को बाहरी आडंबर से हटाकर अपने अंतर्मन की ओर देखने का अवसर प्रदान करता है।

आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं से समृद्ध होते हुए भी मानसिक अशांति से घिरा हुआ है। उसके पास संवाद के लिए अनेक माध्यम हैं, लेकिन संवाद की आत्मीयता कम होती जा रही है। रिश्ते हैं, मगर उनमें धैर्य कम है; ज्ञान है, मगर विवेक का अभाव दिखाई देता है; विकास है, मगर संतोष पीछे छूटता जा रहा है। ऐसे समय में पर्यूषण का संदेश समाज के लिए विशेष रूप से उपयोगी बन जाता है।

अपने भीतर झाँकने का अवसर पर्यूषण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—आत्ममंथन। दूसरों की कमियाँ देखना सरल है, लेकिन अपनी गलतियों को स्वीकार करना कठिन। यह पर्व हमें स्वयं से कुछ असहज प्रश्न पूछने की प्रेरणा देता है—क्या मेरे व्यवहार से किसी को कष्ट पहुँचा? क्या मेरे शब्दों ने किसी का मन दुखाया? क्या मेरे अहंकार ने किसी रिश्ते को कमजोर किया? क्या मेरी आवश्यकताएँ किसी दूसरे के अधिकारों पर भारी पड़ रही हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया ही आत्मशुद्धि की दिशा में पहला कदम है।

वास्तविक धार्मिकता तभी सार्थक होती है जब वह मनुष्य के व्यवहार में दिखाई दे। पूजा, उपवास और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ यदि हमारे भीतर करुणा, संयम, विनम्रता और सहिष्णुता विकसित होती है, तभी पर्व की सार्थकता सिद्ध होती है।

क्षमा में छिपी है मन की मुक्ति पर्यूषण की भावना का सबसे सुंदर पक्ष क्षमा है। जैन परंपरा में ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ के माध्यम से जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा माँगने और दूसरों को क्षमा करने की भावना व्यक्त की जाती है।

आज जब छोटी-सी असहमति भी विवाद और मनमुटाव में बदल जाती है, तब क्षमा का महत्व और बढ़ जाता है। क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। इसका अर्थ है अपने मन को स्थायी घृणा और द्वेष का घर न बनने देना।

कई रिश्ते किसी बड़ी गलती से नहीं, बल्कि ‘पहले मैं क्यों झुकूँ?’ जैसी मानसिकता से टूटते हैं। पर्यूषण हमें इसी अहंकार से ऊपर उठने का अवसर देता है। कभी-कभी एक छोटा-सा ‘माफ कीजिए’ वर्षों की दूरी समाप्त कर सकता है।

अहिंसा केवल हाथों से नहीं, शब्दों से भी अहिंसा जैन दर्शन की केंद्रीय जीवन-दृष्टि है। लेकिन आज अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित समझना पर्याप्त नहीं होगा। कटु वाणी, अपमानजनक शब्द, झूठी अफवाहें, सोशल मीडिया पर किसी को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाना—ये सब भी किसी न किसी रूप में मानसिक और सामाजिक हिंसा को जन्म देते हैं।

इसलिए आज के डिजिटल युग में वाणी और विचारों की अहिंसा अत्यंत आवश्यक है। पोस्ट करने से पहले सोचना, टिप्पणी करने से पहले संवेदनशील होना और असहमति के बावजूद दूसरे के सम्मान को बनाए रखना भी अहिंसा का ही विस्तार है।

अपरिग्रह : जरूरत और लालच के बीच की सीमा आज उपभोक्तावाद ने मनुष्य की आवश्यकताओं को निरंतर बढ़ा दिया है। जितना मिलता है, उतना पर्याप्त नहीं लगता। अधिक पाने की यह दौड़ केवल मनुष्य को तनावग्रस्त नहीं करती, बल्कि प्रकृति पर भी असहनीय दबाव डालती है।

जैन दर्शन का अपरिग्रह हमें सीमित संसाधनों वाली पृथ्वी पर संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। इसका अर्थ प्रगति रोकना नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण उपभोग करना है। जितना आवश्यक है उतना ग्रहण करना और अनावश्यक संग्रह से बचना—आज के पर्यावरणीय संकट के दौर में यह विचार अत्यंत प्रासंगिक है।

नई पीढ़ी को मिले जीवन-मूल्यों की विरासत पर्यूषण की भावना केवल धार्मिक समुदाय तक सीमित रहने के बजाय मानवीय मूल्यों के रूप में नई पीढ़ी तक पहुँचे, यह समय की आवश्यकता है। बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि पर्व कब और कैसे मनाया जाता है। उन्हें यह भी समझाना होगा कि क्षमा क्यों जरूरी है, संयम क्या है, अहिंसा का व्यापक अर्थ क्या है और दूसरों के अधिकारों का सम्मान क्यों किया जाना चाहिए।

बच्चे उपदेश से अधिक व्यवहार से सीखते हैं। यदि वे अपने परिवार में बड़ों को अपनी भूल स्वीकार करते, क्षमा माँगते और दूसरों का सम्मान करते देखेंगे, तो यही संस्कार उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनेंगे।

पर्यूषण का संदेश आज पूरे समाज के लिए पर्यूषण किसी एक धर्म या समुदाय की आध्यात्मिक परंपरा होने के साथ-साथ उन सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की भी याद दिलाता है जिनकी आवश्यकता हर समाज को है—अहिंसा, क्षमा, संयम, करुणा, आत्मानुशासन और अपरिग्रह।

आज दुनिया हिंसा, युद्ध, असमानता, पर्यावरण संकट और मानसिक तनाव जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। इन समस्याओं के समाधान के लिए नीतियाँ और तकनीक आवश्यक हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। मनुष्य के भीतर संवेदना और जिम्मेदारी का जागरण भी जरूरी है।

इसलिए पर्यूषण हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—दुनिया को बदलने की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से होती है।

यदि हम इस पर्व पर केवल दूसरों से क्षमा माँगने के बजाय अपनी भूलों को पहचानें, केवल संयम की बात करने के बजाय अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें, केवल अहिंसा का उपदेश देने के बजाय अपनी वाणी को मधुर बनाएं और केवल धर्म की चर्चा करने के बजाय अपने आचरण को मानवीय बनाएं, तो पर्यूषण वास्तव में हमारे जीवन में उतर सकेगा।

आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने मन से क्रोध का थोड़ा भार कम करें, अहंकार को थोड़ा पीछे रखें, किसी टूटे रिश्ते को जोड़ने का प्रयास करें और किसी ऐसे व्यक्ति को क्षमा करें जिसके प्रति मन में वर्षों से कटुता है।

क्योंकि मन की स्वच्छता से ही विचारों की स्वच्छता जन्म लेती है, विचारों की स्वच्छता से व्यवहार बदलता है और अच्छे व्यवहार से ही एक शांत, संवेदनशील और सद्भावी समाज का निर्माण होता है।