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बेहतर कल के लिए आयुर्वेद एक नारा नहीं हकीकत है

डॉ.मनजीत कौर

मुख्य बिंदु
  • आज ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर फूट रहें हैं,बादल फट रहे हैं,जंगलों में आग धधक रही है,कई प्राणियों की प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं,नित नये वायरस अपना रूप बदल कर आ रहे हैं।
  • यह प्रकृति का ही प्रतिशोध है जो इंसानों के अति महत्वाकांक्षी होने पर हमें दिखाई दे रहा है।
  • आज धरती माता की जो हालत है वह किसी से छुपी हुई नहीं है।
  • इंसान सारा कूड़ा कचरा नदियों में डाल रहा है और कीटनाशको का भी तय मानकों से ज्यादा उपयोग करने से खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व घट रहें हैं।
  • धरती पर मिलावट का प्रभाव साफ़ दिखाई दे रहा है जिससे सारा संतुलन बिगड़ रहा है।
  • अशुद्ध पानी की वजह से अनेक आंत्र संबंधी बीमारियां उत्पन्न होती है।
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बेहतर कल के लिए आयुर्वेद एक नारा नहीं हकीकत है

आज ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर फूट रहें हैं,बादल फट रहे हैं,जंगलों में आग धधक रही है,कई प्राणियों की प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं,नित नये वायरस अपना रूप बदल कर आ रहे हैं। यह सब क्या है ? यह प्रकृति का ही प्रतिशोध है जो इंसानों के अति महत्वाकांक्षी होने पर हमें दिखाई दे रहा है।

आज धरती माता की जो हालत है वह किसी से छुपी हुई नहीं है। इंसान सारा कूड़ा कचरा नदियों में डाल रहा है और कीटनाशको का भी तय मानकों से ज्यादा उपयोग करने से खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व घट रहें हैं। धरती पर  मिलावट का प्रभाव साफ़ दिखाई दे रहा है जिससे सारा संतुलन बिगड़ रहा है।

अशुद्ध पानी की वजह से अनेक आंत्र संबंधी बीमारियां उत्पन्न होती है। कुल मिलाकर इंसान अपनी  सेहत पर ध्यान देने की बजाय  अधिक पैसा कमाने पर अधिक ध्यान दे रहा है। जब तक हम सभी को यह समझ नहीं आयेगा कि पहला सुख निरोगी काया है।तब तक बीमारियों का यह सिलसिला रुकने के बजाय और अधिक बढ़ता ही जायेगा।

हमारी प्रथम प्राथमिकता हमारा स्वास्थ्य और प्रथम प्रेम हमारी प्रकृति होनी चाहिए। आयुर्वेद प्रकृति की गोद से ही निकला है जो हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाता है।पेड़ पौधों से ही औषधियाँ बनती हैं जो मानव जाति को निरोगी बनाती हैं।इसके अलावा हमारे जो खनिज हैं उनसे रसोषधियों का निर्माण किया जाता है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति भारत की सबसे प्राचीन वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है।आज के समय में इसकी जरूरत और उपयोगिता और भी ज्यादा बढ़ गईं है।आज जब विश्व अनेक लाइलाज बीमारियों के साथ पर्यावरण, मौसम, जलवायु ,जल , थल , नभ , कृषि, व्यापार इत्यादि की दृष्टि से अनेक बदलावों से गुजर रहा है तो इसका सीधा असर मानव और प्रकृति के अन्य जीवों पर भी पड़ रहा है। आज हम देख रहे हैं कि प्रकृति का मिज़ाज जिस तरह से बदल रहा है इसका कारण भी हम इंसान है।हमने चाहे विज्ञान, कृषि, चिकित्सा, उद्योगों, इन्फ़्रास्ट्रक्चर आदि क्षेत्रों में चाहे कितनी भी प्रगति कर ली है,लेकिन इससे हमारी प्रकृति को कितना नुकसान हो रहा है इसका पूरी तरह से ईमानदारी के साथ आंकलन अब तक नहीं हो सका है।

आयुर्वेद में जन्म से मृत्यु पर्यन्त जीवन को जीने की अद्भुत कला का वर्णन मिलता है।

आयुर्वेद हर तरफ संतुलन की बात करता है केवल सम दोष, सम अग्नि,सम धातु,सम मल की समानता की बात नहीं करता बल्कि प्रसन्न आत्मा,इन्द्रियों और प्रसन्न मन जिसके हो उसको ही स्वस्थ कहता है।चरक संहिता जो कि आयुर्वेद का सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा ग्रंथ है उसमें सद्वृत्त का विस्तृत वर्णन मिलता है।सद्वृत्त के अन्तर्गत एक मनुष्य को अपने कल्याण के लिए क्या क्या करना चाहिए और क्या क्या नहीं करना चाहिए सभी बातों को उल्लेख मिलता है।

समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।

प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥"(सु०सू०१५/१०)

प्रकृति ईश्वर द्वारा इंसान को दिया गया वो तोहफ़ा है जहाँ पर उसे शांति सुकून और आत्मिक आनंद मिलता है।पेड़ पौधों से न केवल हमें साँसें मिल रही हैं बल्कि रोगों को दूर करने वाली औषधियों के अतिरिक्त परोपकारी जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण सीख भी मिलती है।मौसमी बीमारियों को हम आयुर्वेद के माध्यम से आसानी से रोक सकते हैं और उनका उपचार कर सकते हैं। बिना जरूरत की एंटीबायोटिक दवाओं के खर्च और दुष्परिणामों से भी बच सकते हैं। प्रकृति ने शरीर को खुद हील होने की पावर भी दी है लेकिन तुरंत रिज़ल्ट के चक्कर में हम बिना जरूरत के भी दवा खा लेते हैं जिनसे हमें बचना चाहिए लेकिन जहाँ स्थिति ठीक न लगे तुरंत चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

खाँसी,जुकाम,उल्टी,दस्त जैसी बीमारियाँ तो हमारी रसोई में रखे मसले जैसे लौंग, दाल चीनी,काली मिर्च, हल्दी, सौंठ, सौंफ, पुदीना, जीरा अदरक,तेजपत्ता लहसुन,प्याज़ शहद इत्यादि से ही ठीक कर सकते हैं लेकिन अगर बीमारी कारण दूसरा हो और ज्यादा उल्टी दस्त हो जाये तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।किसी भी दवा का सेवन चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिये।


आयुर्वेद में ब्रह्म मुहूर्त में उठने से लेकर दिनचर्या,ऋतुचर्या,आचार रसायन, धारणीय, अधारणीय वेग,आहार विधि विशेषायतन, मात्रापूर्वक आहार,अग्नि पर विशेष जोर दिया गया है। प्रकृति परीक्षण के आधार पर शरीर में दोषों की प्रकृति तय करना और कौन-सी ऋतु में कौन-सा दोष कुपित होता है और किस ऋतु में किस दोष का शमन होता है और ऋतुसंधि में कौन कौन से रोग होते हैं उनकी रोकथाम कैसे करते हैं । यह सब आयुर्वेद के माध्यम से हम जान सकते हैं। आयुर्वेद न केवल रोगों से निजात दिलाता है बल्कि रोग हो ही नहीं ऐसा जीवन जीना सिखाता है।आयुर्वेद केवल जीवनशैली ही नहीं सर्वांगीण विकास की राह बताता है और आयुर्वेद को अपना कर मनुष्य धर्म,अर्थ, काम,मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।


आज के भौतिक युग की दुनियाँ और लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को देखते हुए यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम शारीरिक सौष्ठव के साथ बौद्धिक सौष्ठव को भी सुदृढ़ करें। यह शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए। हमारी दिनचर्या की शुरुआत कैसे हो,हम सुबह जल्दी उठकर स्नान,ध्यान करें ,ईश्वर स्मरण करें,अपने माता पिता बड़े बुज़ुर्गों के पैर छुए उनसे आशीर्वाद लें फिर अपना नाश्ता इत्यादि करें।स्कूल में अपने गुरूजनों को प्रणाम करें अपने साथियों के साथ सदैव मित्रवत् व्यवहार करें और अपने से छोटों का हमेशा ध्यान रखें।अपने पड़ोसियों से भी हमेशा सम्मानपूर्वक व्यवहार करें,बड़ों के साथ शिष्टाचार से पेश आये।सुख दुख में एक दूसरे के सहयोगी बनें। कहने का तात्पर्य यह है कि हम अपने व्यवहार और आचरण को इस तरह शालीन बनायें और दिनचर्या ऐसी रखें जिससे हमारा शारीरिक और मानसिक विकास हो यही सद्वृत्त कहलाता है।सद्वृत्त से ईर्ष्या द्वेष अहंकार काम क्रोध इत्यादि विकृत मनोभावों पर विजय पाने की ताक़त मिलती है और आज जब विश्व में कई देशों में आपस में युद्ध चल रहे हैं या युद्ध जैसी स्थितियाँ बन रही हैं ऐसे में मानसिक सौष्ठव की बहुत ज्यादा ज़रूरत है।


भारत में 23 सितंबर को हम 11वाँ आयुर्वेद दिवस मना रहे हैं।पहले यह दिवस हर वर्ष दीपावली से पहले धन्वंतरि जयंती (धनतेरस) के दिन मनाया जाता था,लेकिन हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस दिवस को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने के लिये विगत मार्च 2025 में यह निश्चित किया कि आयुर्वेद दिवस को प्रतिवर्ष 23 सितम्बर को मनाया जायेगा जिससे एक निश्चित तिथि पर पूरे भारतवर्ष में ही नहीं पूरे विश्व में इसको मनाया जा सके।इस वर्ष 2026 के आयुर्वेद दिवस की थीम *आयुर्वेद फॉर द हेल्थियर टुमारो* यानी *बेहतर कल के लिए आयुर्वेद* रखी गई है।आयुर्वेद को अपनाकर न केवल हम स्वस्थ जीवन जी सकते हैं बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के आर्थिक भार को भी कम कर सकते हैं। हमें स्वस्थ रहने के लिए आलस्य का त्याग कर हमेशा क्रियाशील बनें रहना होगा। आओ ! हम सब मिलकर आयुर्वेद अपनायें अपनी प्रकृति का ऋण चुकायें और ईश्वर की रची दुनियाँ के दुःख दर्द को दूर कर एक स्वस्थ देश और स्वस्थ विश्व की परिकल्पना में अपना सार्थक योगदान प्रदान करें ।