उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में गुरुवार को आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने केवलज्ञान प्राप्त कर जिनशासन की स्थापना की और संसार के समस्त जीवों के कल्याण एवं सुख के लिए देशना प्रदान की।
दीपावली भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है। उनके निर्वाण के समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो पूरा संसार अनाथ हो गया हो।साध्वीश्री ने कहा कि जीवन में सबसे पहले आवश्यकता स्वयं को बदलने की है।
अपने मन को समझना सीखें, क्योंकि जिस व्यक्ति ने अपने मन को समझ लिया, उसका जीवन स्वतंत्र हो जाता है। जो मन का मालिक है, वही वास्तव में स्वतंत्र है।
अपेक्षाएं ही दुख का प्रमुख कारण हैं। यदि हम किसी मित्र के घर जाएं और वहां अपेक्षा के अनुरूप सम्मान नहीं मिले तो हमें बुरा लगता है।
इसका कारण सामने वाले का व्यवहार नहीं, बल्कि हमारे मन में रखी गई अपेक्षा है। सुख और दुख का कारण कोई दूसरा नहीं, बल्कि हमारा अपना मन है।उन्होंने कहा कि चातुर्मास अब समापन की ओर है और इन दिनों आत्म-अनुशीलन का विशेष महत्व है।
प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से सवाल करना चाहिए कि उसने अपने भीतर से कितने कषाय और विकार निकाले तथा परमात्मा की वाणी और सद्गुणों से अपने जीवन को कितना भरा।
आत्मचिंतन ही आत्मशुद्धि का मार्ग है।साध्वीश्री ने ग्रहों और वारों के प्रसंग से जीवन में सीधे और सकारात्मक आचरण का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि राहु और केतु की गति टेढ़ी मानी जाती है।
इसी प्रकार जो व्यक्ति जीवन में टेढ़े और उलटे रास्ते पर चलता है, उसका परिवार में भी महत्व कम हो जाता है। सप्ताह के सात वारों के अलावा परिवार को आठवां वार बताते हुए उन्होंने कहा कि आज परिवार की परिभाषा केवल हम दो, हमारे दो तक सीमित होती जा रही है।
भाई-भाई के प्रेम का उदाहरण देना हो तो राम और लक्ष्मण का स्मरण करना चाहिए। धर्मसभा में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने मधुर गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।