राजस्थान की राजनीति में शक्ति की आराधना केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि लोकविश्वास, सांस्कृतिक विरासत और व्यक्तिगत श्रद्धा से जुड़ा एक विशिष्ट अध्याय है। यहां चुनावी सरगर्मी हो या सत्ता की चुनौतियां, नई जिम्मेदारी का अवसर हो या मतगणना का दिन—कई राजनेता मां दुर्गा और शक्तिस्वरूपा देवियों के दरबार में शीश नवाते दिखाई देते हैं।
राजस्थान के सर्वाधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे मोहन लाल सुखाड़िया चित्तौड़गढ़ के दुर्ग स्थित कालिका माता जी के अनन्य भक्त थे और विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान नियमित दर्शन करते थे । राजस्थान विधान सभा के अध्यक्ष रहें महारावल लक्ष्मण सिंह भी इस परम्परा का निर्वहन करते थे ।
दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा का मां त्रिपुरा सुंदरी मंदिर इस परंपरा का ऐसा ही चर्चित केंद्र है, जहां विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने समय-समय पर दर्शन किए हैं।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी और वसुंधरा राजे की मां त्रिपुरा सुंदरी के प्रति आस्था के प्रसंग प्रदेश की राजनीति में विशेष रूप से चर्चित रहे हैं।
मां त्रिपुरा सुंदरी जीवन पर्यन्त हरिदेव जोशी की आराध्य देवी रहीं । जोशी जी हमेशा अपनी बांसवाड़ा यात्रा की शुरुआत और अंत माता त्रिपुरा सुंदरी के दर्शन से ही करते थे ।
उन्होंने वागड़ के शक्ति पीठ माने जाने वाले इस अर्वाचीन मंदिर के जीर्णोद्धार और विकास की नींव रखी तथा उसे सुंदर रूप दिया। उन्होंने यहाँ अनेक बार सहस्त्र चण्डी यज्ञ और कई प्रसंगों पर बड़े महोत्सवों का आयोजन भी किया।
हरिदेव जोशी की तरह ही वसुंधरा राजे भी माँ की अनन्य भक्त बन गई और कई महत्वपूर्ण अवसरों पर माता के दर्शन करने पहुंची। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव की मतगणना के दिन भी वे बांसवाड़ा स्थित त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में पूजा-अर्चना कर रही थीं।
माता के प्रति उनकी श्रद्धा हमेशा बनी हुई है । वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने चारभुजानाथ, श्रीनाथजी और त्रिपुरा सुंदरी के दर्शन किए।
वे अपनी आस्था व्यक्त करते हुए कहती कि जीवन में कोई बड़ा काम करने से पहले वे भगवान का आशीर्वाद लेती हैं।
वसुंधरा राजे देश के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित श्री पीताम्बरा पीठ (जिसे माँ बगलामुखी मंदिर भी कहा जाता है) को अपनी आराध्य देवी मानती है लेकिन राजस्थान की राजनीति में सक्रिय होते ही वे मध्य प्रदेश से सटे बांसवाड़ा के त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में भी गहरी आस्था प्रदर्शित कर रही हैं ।
राजे ने मुख्यमंत्री रहते त्रिपुरा सुंदरी मंदिर के विकास में गहरी रुचि लेते हुए उसका आधुनिक रूप से विकास कराया है तथा हेलीपेड सहित आवास आदि सुविधाओं का विस्तार भी कराया है।
मां त्रिपुरा सुंदरी का दरबार किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी यहां दर्शन कर चुके हैं।
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले गहलोत, तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया और अन्य नेताओं के मंदिर पहुंचने की खबरें सामने आई थीं।
इससे स्पष्ट होता है कि इस शक्तिपीठ के प्रति श्रद्धा विभिन्न राजनीतिक धाराओं के नेताओं में दिखाई देती है। वर्तमान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी 2 मार्च 2025 को अपनी धर्म पत्नी के साथ मां त्रिपुरा सुंदरी के दर्शन कर विशेष पूजा-अर्चना की।
उनका यह दौरा वागड़ क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थल के प्रति राजनीतिक नेतृत्व की आस्था का एक और उदाहरण बना।
त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत, वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, भूपेंद्र यादव, पूर्व मंत्री गुलाबचंद कटारिया, विधानसभा अध्यक्ष रहे सी.पी. जोशी सहित और पूर्व उप मुख्य मन्त्री सचिन पायलट सहित अनेक प्रमुख हस्तियों के दर्शन करने के प्रसंग भी समाचारों में दर्ज हैं।
यह सूची बताती है कि वागड़ का यह शक्तिस्थल राजस्थान ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति की हस्तियों के लिए भी श्रद्धा का केंद्र रहा है।
त्रिपुरा सुंदरी के साथ ही राजस्थान में आमेर की शिला माता, करौली की कैलादेवी, सीकर की जीण माता, जैसलमेर की तनोट माता, बीकानेर के देशनोक का करणी माता मंदिर, सिकराय क्षेत्र में शाकंभरी देवी मंदिर, सीकर जिले में स्थित जीण माता मंदिर , माउंट आबू में अर्बुदा देवी मंदिर और अन्य शक्तिस्थलों के प्रति भी व्यापक जनविश्वास है।
राजनेताओं के मंदिर-दर्शन के पीछे व्यक्तिगत श्रद्धा, पारिवारिक परंपरा और सांस्कृतिक जुड़ाव जैसे अनेक कारण हो सकते हैं। इसलिए हर धार्मिक यात्रा को केवल सत्ता या चुनाव से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
नवरात्र का वास्तविक संदेश शक्ति, साहस, न्याय और करुणा है। जनता की सेवा का दायित्व निभाने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए मां की आराधना तभी व्यापक अर्थ ग्रहण करती है, जब श्रद्धा के साथ समाज के कमजोर वर्गों की सहायता, नारी सम्मान और जनकल्याण का संकल्प भी जुड़ा हो।
राजस्थान की धरती पर मातारानी के दरबार में झुकते शीश इसी लोकआस्था की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। यहां राजनीति की राहें अलग हो सकती हैं, विचारधाराएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन शक्ति की आराधना के प्रति श्रद्धा अनेक लोगों को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ती है। यही राजस्थान की परंपरा की विशिष्टता है—मां के चरणों में श्रद्धा और जनसेवा में समर्पण।
