दीपावली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा, आस्था और जीवन-दर्शन का प्रकाशपर्व है। यह अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक है।
भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की स्मृति में दीप जलाने की परंपरा हमें प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता का संदेश देती है। लेकिन आधुनिकता और दिखावे की दौड़ में दीपावली का स्वरूप कहीं-कहीं आतिशबाजी और शोर-शराबे तक सीमित होता जा रहा है।
प्रश्न यह है कि क्या कुछ क्षणों की आतिशबाजी के लिए हम अपनी साँसों, स्वास्थ्य और प्रकृति की अनमोल संपदा को दाँव पर लगा दें?
पटाखों का शोर, प्रकृति पर प्रहार पटाखों से निकलने वाला जहरीला धुआँ वायुमंडल को प्रदूषित करता है। सूक्ष्म कणों और हानिकारक रासायनिक तत्वों से युक्त यह धुआँ बच्चों, बुजुर्गों तथा श्वसन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए विशेष रूप से नुकसानदायक हो सकता है।
वहीं तेज धमाकों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण मनुष्यों के साथ पशु-पक्षियों के लिए भी भय और परेशानी का कारण बनता है। दीपावली के बाद प्रदूषित वातावरण हमें चेतावनी देता है कि उत्सव के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ अब बंद होना चाहिए।
दीपावली की असली पहचान : दीप, प्रेम और सद्भाव हमारी परंपरा में दीपावली का मूल भाव प्रकाश और मंगलकामना है, न कि धुआँ और धमाके। मिट्टी के दीपकों की सौम्य रोशनी, रंगोली की सुंदरता, घर-परिवार का मिलन, मिठाइयों की मिठास और अपनों के प्रति स्नेह ही इस पर्व की वास्तविक पहचान हैं। पटाखों के बिना भी दीपावली उतनी ही आनंदमयी, आकर्षक और यादगार हो सकती है।
बच्चों को दें संस्कार, प्रदूषण नहीं आज आवश्यकता है कि अभिभावक और शिक्षक बच्चों को उत्सव मनाने की नई एवं सकारात्मक दृष्टि दें। उन्हें समझाएँ कि खुशी का अर्थ दूसरों को परेशानी पहुँचाना नहीं, बल्कि सबके जीवन में मुस्कान लाना है।
विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में पर्यावरण-अनुकूल दीपावली अभियान चलाए जाएँ। जरूरतमंद परिवारों को मिठाई, वस्त्र और उपहार देना, मिट्टी के दीपक खरीदना, पौधारोपण करना तथा स्वच्छता अभियान में भाग लेना इस पर्व को सार्थक बना सकता है।
एक दीप मानवता के नाम, एक संकल्प प्रकृति के नाम बिना पटाखों की दीपावली केवल प्रदूषण कम करने का प्रयास नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय जिम्मेदारी का प्रतीक है। यह स्थानीय कुम्हारों और हस्तशिल्पियों को रोजगार देने, स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करने तथा पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का अवसर भी है। यदि प्रत्येक परिवार एक छोटा-सा संकल्प ले, तो सामूहिक प्रयास से बड़ा परिवर्तन संभव है।
इस बार रोशनी ऐसी हो, जो जीवन सँवारे समय आ गया है कि हम दीपावली की खुशियों को पटाखों के शोर से मुक्त कर प्रेम, प्रकाश और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ें। हमारी खुशी किसी की परेशानी का कारण न बने। न किसी बच्चे की साँसों में धुआँ घुले, न किसी बुजुर्ग की शांति भंग हो और न ही किसी बेजुबान जीव को भय का सामना करना पड़े।
आइए, इस दीपावली घरों के साथ हृदय भी रोशन करें। मिट्टी के दीप जलाएँ, रिश्तों में मिठास घोलें, जरूरतमंदों के चेहरों पर मुस्कान लाएँ और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएँ।
क्योंकि दीपावली की सार्थकता आसमान में धमाके करने में नहीं, बल्कि जीवन में उजाला भरने में है।
पटाखे नहीं, प्यार जलाएँ। धुआँ नहीं, खुशियाँ फैलाएँ। दीपावली मनाएँ ऐसी, जिससे धरती भी मुस्कराएँ।
- सत्य भूषण शर्मा उदयपुर – 313001 (राजस्थान)
