-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। हम वर्ष 1970 से 1975 के मध्य आर्यसमाज से जुड़े वा इसके सदस्य बने।
आरम्भ में ही आर्यसमाज के सत्संगों में विद्वानों के उपदेश सुनना हमारी रुचि बन गई थी। हम मई, 1974 में सरकारी नौकरी में लग गये थे।
देहरादून की समाचार पत्र-पत्रिकायें की प्रमुख एजेन्सी ‘गुप्ता न्यूज एजेन्सी’ के यहां हम सायं के समय जाते थे और एकाउण्ट्स आदि का काम देखते थे।
हमारे सम्मुख उन दिनों सभी समाचार पत्र और पत्रिकायें हुआ करती थी जिनके हम पनने पलट कर आर्यसमाज के समाचार ढंूढते व देखते थे परन्तु दिवाली आदि के एक दो अवसरों को छोड़कर हमें आर्यसमाज विषयक समाचार व सूचनायें देखने को नहीं मिलती थी।
तभी हमारे मन में पत्रों के माध्यम से आर्यसमाज विषयक समाचार व लेख लिखने व उन्हें प्रकाशित कराने की प्रेरणा हुई। इन दिनों हम आर्यजगत, दयानन्द सन्देश, वेदप्रकाश, सविता मासिक आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं के वार्षिक ग्राहक बन चुके थे।
हमने यज्ञ आदि विषयों को लेकर यदा-कदा लिखना आरम्भ किया। देहरादून से प्रकाशित साधारण कोटि के पत्रों में उन्हें देने पर वह प्रकाशित होने लगे थे।
इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ता रहा और हमने लेख लिखने की गति को बढ़ाया। इस प्रकार यह सिलसिला आरम्भ होकर वर्तमान तक पहुंचा हैं।
हमने अपने लेखन काल में आर्यसमाज के अनेक विद्वानों पर भी लगभग दो सौ लेख लिखे हैं। इन लेखों में स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी तथा आचार्य भद्रसेन जी, अजमेर भी सम्मिलित हैं।
स्थानीय दैनिक पत्र दूनदर्पण आदि कुछ पत्रों में यह लेख छपे। आर्यसमाज के पत्रों आर्यमित्र आदि में भी उन दिनों हमारे कुछ लेख छपे।
इसका ज्ञान आचार्य भद्रसेन जी के यशस्वी पुत्र कैप्टेन देवरत्न आर्य जी, मुम्बई को भी हुआ। उनसे यदा कदा हमारा पत्राचार होता था।
उन्होंने हमें आर्यसमाज सान्ताक्रूज, मुम्बई के मंत्री जी के माध्यम से आचार्य भद्रसेन जी की जीवनी, कुछ साहित्य और भजनों के कैसेट भी भिजवाये थे।
फरवरी, 1997 में उन्होंने सत्यार्थप्रकाश न्यास, उदयपुर की ओर से स्वामी विद्यानन्द सरस्वती का सम्मान किये जाने की योजना बनाई थी। उन्हें 31 लाख रुपये की धनराशि का चैक भेंट किया जाना था।
उन दिनों व उससे पहले शायद इतनी राशि देकर किसी विद्वान का सम्मान नहीं किया गया था। यह अधिकांश धनराशि, हमारा अनुमान है, कैप्टेन देवरत्न आर्य जी ने ही अपने सम्पर्कों के आधार पर एकत्रित की थी।
कैप्टेन देवरत्न आर्य जी ने हमें फोन पर स्वामी जी के सम्मान किये जाने की जानकारी दी और स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी को इस अवसर पर भेंट किये जाने वाले अभिनन्दन पत्र को बनाने का हमसे अनुरोध किया था।
हमारे द्वारा असमर्थता व्यक्त करने पर भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया और कहा कि नहीं अभिनन्दन पत्र आपको ही बनाना है।
इस कार्य को सम्पन्न करने के लिये हमने वेदों के शीर्षस्थ विद्वान आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी से कैप्टेन देवरत्न आर्य जी से हुई वार्ता का उल्लेख कर हमारा मार्गदर्शन करने का निवेदन किया।
आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी अजमेर में आचार्य भद्रसेन जी के सम्पर्क में आये थे। आचार्य रामनाथ जी ने हमें आचार्य भद्रसेन जी से जुड़े अपने निजी कुछ संस्मरण भी सुनाये थे और उनके सद्व्यवहार की प्रशंसा की थी।
‘आचार्य जी ने हमें कहा कि आप इसका प्रारूप बनायें, जो कमी रहेगी उसे मैं पूरा कर दूंगा।’ उन्होंने हमें स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी की आत्मकथा ‘खट्टे मीठे अनुभव’ भी अपने पास से दी थी।
उसको पढ़कर हमने अभिनन्दन पत्र का रफ प्रारूप तैयार किया और ले जाकर आचार्य जी को दिखाया। यह प्रारूप उपयुक्त नहीं था।
स्वामी जी के अभिनन्दन की तिथि निकट आ रही थी। इस भेंट में आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी ने हमें कहा कि आप यह प्रारूप छोड़ जायें, मैं अभिनन्दन पत्र बना दूंगा।
उन्होंने कुछ ही दिनों में अभिनन्दन पत्र तैयार कर दिया और जब हम गये तो उन्होंने हमें वह दे दिया। आचार्य जी ने उस अवसर बताया कि उस बीच उनको ज्वर हो गया था।
उसी अवस्था में उन्हें उसे बनाना पड़ा। उसे देख कर हमारे मन से इस कार्य का भार उतरा।
उसी दिन हमने उस अभिनन्दन पत्र को कैप्टेन देवरत्न आर्य जी को फैक्स करा दिया था।
उसी अभिनन्दन पत्र को सत्यार्थप्रकाश न्यास की ओर से यथावत् छपवाकर उसे स्वामी जी को दिनांक 27-2-1997 को उदयपुर में न्यास के प्रांगण में आयेाजित भव्य समारोह में भेंट किया गया था।
उस भव्य समारोह में हम भी पहुंचे थे। देवरत्न आर्य जी ने सभी श्रोताओं को अभिनन्दन पत्र की भूमिका बताई थी और हमारा भी मंच पर बुलाकर व पुष्पमाला पहनाकर सम्मान किया था।
इस प्रकार हमारी देवरत्न आर्य जी से निकटता थी। कैप्टेन देवरत्न आर्य जी से हमारी भेंट हिण्डोन सिटी में मनाई गई पण्डित लेखराम बलिदान शताब्दी के अवसर पर तथा एक बार दिल्ली में आर्यसमाज दीवानहाल में हुई थी।
हिण्डोनसिटी में आर्य जी का हमने एक चित्र अपने कैमरे में लिया था जिसे हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।
यह भूमिका हम आज फेसबुक पर प्रस्तुत कर रहे देवरत्न आर्य जी के चित्र जिसमें वह उदयपुर में रथ पर बैठे हैं, की है। जब हम अभिनन्दन समारोह में भाग लेने उदयपुर पहुंचे थे तब वहां शोभा यात्रा निकलनी थी।
हम शोभा यात्रा में पहुंचे थे। सबसे आगे बैण्ड व कुछ लोगों के बाद एक रथ पर स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी और एक गुरुकुल के आचार्य स्वामी जी बैठे थे।
गुरुकुल के आचार्य स्वामी जी का नाम अब हमें विस्मृत हो गया था। रथवान के आसान पर देवरत्न आर्य जी बैठे थे।
भावनाओं के आवेग में हम रथ पर चढ़ गये थे और स्वामी जी के कानों में हमने अपना नाम व स्थान बता कर आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी का अभिनन्दन सम्बन्धी सन्देश व उनकी शुभकामनाओं से उन्हें अवगत कराया था।
कल यह चित्र हमें अपने पुराने संग्रह में दिखाई दिया। इसे हम अपने सभी प्रिय मित्रों से साझा कर रहे हैं।
हम आशा करते हैं कि हमारे मित्र इस इतिहास की धरोहर इस चित्र को पसन्द करेंगे। सादर।
मनमोहन कुमार आर्य