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राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति होती है: आचार्य अनुज शास्त्री

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

मुख्य बिंदु
  • आज हम रविवार दिनांक 16 अगस्त, 2026 को आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के रविवारीय सत्संग में सम्मिलित हुए।
  • हमने आर्यसमाज में आर्यसमाज के युवा विद्वान आचार्य अनुज शास्त्री जी का ओजस्वी व्याख्यान सुना।
  • आचार्य जी के व्याख्यान से पूर्व समाज-मन्दिर की यज्ञशाला में आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित आचार्य विद्यापति शास्त्री जी के पौरोहित्य में सामूहिक यज्ञ सम्पन्न हुआ जिसमें आर्यसमाज के सदस्य, सदस्यायें, अधिकारीगण एवं श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बालक तथा बालिकायें सम्मिलित हुए।
  • यज्ञ के बाद आर्यसमाज के भव्य सभागार में सत्संग हुआ।
  • सत्संग में व्याख्यान से पूर्व भजन, सामूहिक प्रार्थना एवं ऋषि दयानन्द जी के जीवन चरित से कुछ अंशों का पाठ आचार्य विद्यापति शास्त्री जी ने पढ़कर सुनाया।
  • आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि देश में एकता व अखण्डता तभी आ सकती है जब देश के सब लोगों का आराध्य देव एक हो।
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राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति होती है: आचार्य अनुज शास्त्री

आज हम रविवार दिनांक 16 अगस्त, 2026 को आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के रविवारीय सत्संग में सम्मिलित हुए। हमने आर्यसमाज में आर्यसमाज के युवा विद्वान आचार्य अनुज शास्त्री जी का ओजस्वी व्याख्यान सुना।

आचार्य जी के व्याख्यान से पूर्व समाज-मन्दिर की यज्ञशाला में आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित आचार्य विद्यापति शास्त्री जी के पौरोहित्य में सामूहिक यज्ञ सम्पन्न हुआ जिसमें आर्यसमाज के सदस्य, सदस्यायें, अधिकारीगण एवं श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बालक तथा बालिकायें सम्मिलित हुए।

यज्ञ के बाद आर्यसमाज के भव्य सभागार में सत्संग हुआ। सत्संग में व्याख्यान से पूर्व भजन, सामूहिक प्रार्थना एवं ऋषि दयानन्द जी के जीवन चरित से कुछ अंशों का पाठ आचार्य विद्यापति शास्त्री जी ने पढ़कर सुनाया।

आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि देश में एकता व अखण्डता तभी आ सकती है जब देश के सब लोगों का आराध्य देव एक हो। इसका कारण भी आचार्य जी ने बताया।

आचार्य जी ने कहा कि जब हम विश्व गुरु थे तब हम सब देशवासी एक थे। तब हमारा देश भी अखण्डित था।

आचार्य जी ने कहा कि 15 अगस्त, 1947 को देश मे केवल सत्ता का हस्तान्तरण हुआ था। आचार्य जी ने देश में विद्यमान अनेक भाषाओं की चर्चा करते हुए कहा कि हम नागरिकों द्वारा परस्पर बोली जाने वाली भिन्न भिन्न बोलियों को भाषा कहते हैं।

यह उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि महाभारत काल तक सम्पूर्ण देश में केवल एक ही भाषा संस्कृत थी।

देश के सभी लोग केवल संस्कृत भाषा का ही प्रयोग व व्यवहार करते थे।

आचार्य जी ने कहा कि देश में अनेक पूजा पद्धतियां प्रचलित हैं, इनके आधार पर देश बंटा हुआ है। देश में आरक्षण की व्यवस्था पर भी आचार्य जी ने अपने विचार प्रस्तुत किये।

उन्होंने कहा कि जो बन्धु आरक्षण का लाभ प्राप्त कर धनी व सम्पन्न हो गये उनके परिवारों को भी आरक्षण का लाभ मिलता जाता है। उनके अनुसार आरक्षण का अत्यन्त गरीब, पिछड़े, वंचित, शोषित एवं दलित परिवारों को ही दिए जाने के लिये किया गया था।

धनी व सम्पन्न लोगों को लाभ मिलने से गरीब व वंचित तथा अभावों का जीवन व्यतीत करने वाले बन्धु व परिवार आरक्षण के लाभ से वंचित होते हैं। आचार्य जी ने यह भी कहा कि सत्ता व सरकार के परिवर्तन से राष्ट्र बदलने वाला नहीं है।

आचार्य जी ने यजुर्वेद के 22 वें अध्याय में आये ‘आ ब्रह्मन् ब्रह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायताम्’ मन्त्र की चर्चा की और इसकी विस्तार से व्याख्या की।

उन्होंने कहा कि यदि हमने वेद की राष्ट्रीय प्रार्थनाओं को अपनाया होता तो हमारा राष्ट्र एक सूत्र मे बंधा हुआ होता।

आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि चार वेद संसार की रचना, पालन व समय पर इसकी प्रलय करने वाली सत्ता परमात्मा द्वारा प्रदत्त वाणी है। आचार्य जी ने कहा कि शरीर के आत्मा से निकल जाने पर शरीर मिट्टी बन जाता है।

इसी प्रकार से राष्ट्र की स्थिति होती है। आचार्य जी ने ओजस्वी स्वरों में कहा कि राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति होती है।

आचार्य जी के अनुसार जब तक राष्ट्र के लोग राष्ट्र की संस्कृति का पालन नहीं करेंगे तब तक राष्ट्र पूर्ण सुख व उन्नति को प्राप्त नहीं हो सकता। आचार्य जी ने कहा कि देश के लोग राष्ट्र की संस्कृति का त्याग कर रहे हैं।

उन्होंने ओजस्वी स्वरों में कहा हमारे देश व राष्ट्र की संस्कृति है वैदिक संस्कृति। आचार्य जी ने कहा कि वेद व वेदमन्त्र कहते हैं कि हमारे राष्ट्र के लोग ब्रह्म अर्थात् ईश्वर के तेज को धारण करने वाले हों।

उन्होंने कहा कि वेदों के अनुसार की जाने वाली प्रार्थना से यह ज्ञात होता है कि ब्राह्मण कोई जन्मना जाति नहीं है अपितु ब्राह्मण विद्वान एवं तेजस्वी वेद के ज्ञानी लोगों को कहते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि कोई ब्राह्मण अविद्वान हो जाता है तो वह ब्राह्मण नहीं होता। आचार्य जी ने कहा कि ब्राह्मण को हर स्थिति में राष्ट्र का हितैषी होना चाहिये।

आचार्य जी ने कहा कि ब्राह्मण वह व्यक्ति होते हैं जिनको विद्या तथा अविद्या दोनों का ज्ञान होता है। उन्होंने महर्षि दयानन्द के शब्दों को उद्धृत कर शिक्षा व विद्या की परिभाषा भी श्रोताओं को बताई।

ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में बताया है कि शिक्षा उसे कहते हैं जिससे विद्या, सभ्यता, धर्मात्मता, जितेन्द्रियतादि की बढ़ती होवे और अविद्यादि दोष मनुष्यों से छूटें, उसी को शिक्षा कहते हैं।

आचार्य जी ने कहा कि ब्राह्मण वह व्यक्ति होता है जो देश व समाज से अविद्या व अशिक्षा को दूर करता है। आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि कुछ विद्वान अपने स्वार्थों के कारण जनता को आपस में बांट रहे हैं।

आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि व्यवस्था परिवर्तन से ही देश समृद्ध एवं सुखी होगा। आचार्य जी ने अविद्या के अनेक उदाहरण भी दिए।

उन्होंने कहा कि कुछ मतों के आचार्य दूध से स्नान करते हैं और उस दूध की खीर बना कर प्रसाद के रूप में अपने शिष्यों व भक्तों में बांटते हैं। आचार्य जी ने कहा दूध मनुष्य के पीने के लिये बना है स्नान करने के लिये नहीं।

जो ऐसा करते हैं वह अविद्या से युक्त होते हैं। ऐसा करना अनुचित है।

आचार्य जी ने सभी श्रोताओं को कहा कि सभी विद्वानों व मनुष्यो को वेद की बातों को मानना चाहिये। विद्वान आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि प्राचीन काल में जो शास्त्रार्थ किये जाते थे वह सत्य को प्रकाशित व उजागर करने के लिये किये जाते थे।

इससे अविद्या, अशिक्षा, असत्य, अन्धविश्वास, पाखण्ड आदि दूर होते थे। सत्य को मानना और मनवाना और असत्य को छोड़ना व छुड़वाना ही विद्वानों का कर्तव्य होता है।

आचार्य जी ने गो पालन की आवश्यकता पर भी बल दिया और उसके अनेक उदाहरण श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत किये। आज का व्याख्यान अत्यन्त महत्वपूर्ण था।

हम अपने पाठकों से निवेदन करेंगे कि वह आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के यूट्यूब चैनल ‘आर्यसमाज धामावाला देहरादून’ को सर्च कर इस व्याख्यान को पूरा सुने।

यह व्याख्यान उन्हें अच्छा लगेगा। हमने आचार्य जी के व्याख्यान की कुछ ही बाते प्रस्तुत की हैं।

तेज गति से न लिख पाने के कारण सभी बातों को प्रस्तुत नहीं कर सके हैं।

आर्यसमाज धामावाला के अधिकारी एवं युवा विद्वान श्री नवीन भट्ट जी ने आचार्य अनुज शास्त्री जी का आज के ओजस्वी व्याख्यान के लिये धन्यवाद किया। इसके बाद सूचनायें दी गईं।

आज के सत्संग में एक 8 वर्षीय बालक एकाग्र चमोली भी सम्मिलित हुआ। इसने आर्यसमाज के वयोवृद्ध सदस्य एवं विद्वान श्री सतीश आर्य जी को आर्यसमाज का दूसरा नियम सुनाया।

इसे आर्यसमाज के सभी नियम एवं सन्ध्या आदि के अनेक मन्त्र स्मरण हैं। श्री सतीश आर्य जी ने इस बालक को कुछ धनराशि देकर इसे भविष्य में आर्यसमाज से जुड़े रहने और स्वाध्याय करते रहने के लिये प्रेरित किया।

संगठन सूक्त एवं शान्तिपाठ के साथ आज के सत्संग का समापन हुआ। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य पताः 196 चुक्खूवाला-2 देहरादून-248001 फोनः09412985121