पं. चमूपति जी अपने समय 1893-1937 के आर्यसमाज के शीर्ष विद्वानों में थे। पं. जी का जन्म 15 फरवरी 1893 को बहावलपुर (पाकिस्तान) में हुआ था तथा निधन लाहौर में 15 जून 1937 को हुआ।
वर्तमान समय में पं. चमूपित जी की चर्चा कम ही सुनने को मिलती है। अतः हम उन पर कुछ शब्द प्रस्तुत कर रहे हैं।
हम जो जानकारी दे रहे हैं वह हमें पं. चमूपति जी जी की ‘कुरान वेद की छाओं में’ के पृष्ठों को पलटते हुए मिली। इस पुस्तक का सम्पादन पं. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने किया है।
इस पुस्तक में जिज्ञासु जी ने ‘कविर्मनीषी पं0 चमूपति जी’ शीर्षक से पुस्तक के पृष्ठ 23 पर संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया है।
उनके द्वारा दिया गया विवरण आद्योपान्त प्रस्तुत हैः पं. चमूपति जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी एक महान् विचारक, दार्शनिक, कवि, सिद्धहस्त लेखक, धर्म व दर्शनों के एक अधिकारी विद्वान् थे।
आप बहुभाषाविद् थे। आपने तीन भाषाओं में अत्यन्त खोजपूर्ण व मौलिक साहित्य का सृजन किया।
आप हिन्दी, उर्दू व फारसी भाषा के एक यशस्वी कवि थे। भारत के स्वराज्य संग्राम में कारागारों की काल कोठरियों में भी आपके गीत गूंजते रहे।
पं. चमूपित द्वारा रचित ‘चौदहवीं का चांद’, ‘जवाहिरे जावेद’, ‘मजहब का मकसद’ आदि दार्शिनिक पुस्तकों ने दर्शन प्रेमियों के मन व मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला है व डाल रहीं हैं। मत पन्थों के गम्भीर विद्वानों व गवेषकों को इस साहित्य ने अपने रंग में रंग दिया है। ‘दयानन्द आनन्द सागर’ पुस्तक के प्रकाशन के कारण आपको मतान्ध मुस्लिम स्टेट बहावलपुर से निष्कासित किया गया।
‘कुरान वेद की ठण्डी छाओं में’ आपकी आर्य साहित्य की सर्वश्रेष्ठ व मौलिक पुस्तकों में से एक है। ऐसे ही ‘भारत भक्ति’ आपकी अत्युत्तम राष्ट्रीय कविताओं का संग्रह अब हिन्दी में भी प्राप्य है।
श्री उत्तमचन्द जी ‘शरर’, पं. कृष्णचन्द्र जी तथा पं. राजेन्द्र जिज्ञासु आपके साहित्य के प्रमुख अनुवादक हैं। पण्डित जी ने केवल 44 वर्ष की आयु में जून 1937 में लाहौर में लश्वर देह का परित्याग किया। यहां कुरान वेद की छाओं में पुस्तक में पं. चमूपति जी पर दिया विवरण समाप्त होता।
हम अपने मित्रों को यह भी बता दें कि पं. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने पं. चमूपति जी का विस्तृत जीवन चरित्र ‘कविर्मनीषी पं. चमूपति’ के नाम से लिखा है।
यह ग्रन्थ अप्रैल 2009 में प्रकाशित हुआ था। ग्रन्थ में पृष्ठों की संख्या 247 है।
हमारे पास पं. चमूपति जी की कई पुस्तकें हैं। हमने उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सोम सरोवर’ पढ़ी है।
इस पुस्तक के बारे में एक बार हमने पं. राजेन्द्र जिज्ञासु जी के विचार पढ़े थे जिसमें उन्होंने सूचित किया था कि यह पुस्तक नोबेल पुरस्कार दिए जाने योग्य थी।
सभी स्वाध्यायशील पाठकों को इस पुस्तक को पढ़ना चाहिये। यह भी बता दें कि डा. भवानीलाल भारतीय जी ने अपने ग्रन्थ ‘आर्य लेखक कोष’ (प्रकाशन वर्ष 1991) में पृष्ठ संख्या 70-71 पर पं. चमूपति जी का परिचय दिया है और उनके सभी ग्रन्थों की सूचित भी दी है।
हम आशा करते हैं कि हमारे मित्र पाठकों को पं. चमूपति जी का यह परिचय एवं जानकारी रुचिकर प्रतीत होगी। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य पताः 196 चुक्खूवाला-2 देहरादून-248001 फोनः09412985121
