आर्यसमाज लक्ष्मण चौक, देहरादून का 60वां दो दिवसीय वार्षिकोत्सव आज दिनांक 3 -10-2026 को सोल्लास आरम्भ हुआ। आज प्रातः 8.00 बजे से तीन बड़ी यज्ञ वेदियों में यज्ञ किया गया।
यज्ञ के ब्रह्मा आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित पं. गुरमीत शास्त्री जी थे। यज्ञ की समाप्ति के पश्चात ओ३म ध्वजारोहण हुआ।
आर्यसमाज के विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी, डा. आचार्य धनंजय आर्य जी, भजनोपदेशक श्री सुखपाल आर्य जी, पं. प्रेम प्रकाश शर्मा जी, पं. गुरमीत शास्त्री जी एवं आर्यसमाज के प्रधान श्री राजकुमार जी ने ध्वजारोहण किया।
ध्वजारोहण के साथ ही ध्वजगीत ‘जयति ओ३म् ध्वज व्योम विहारी’ का समवेत गान भी वहां उपस्थित आर्यसमाज के अधिकारियों, सदस्यों, माताओं एवं आर्यसमाज के बाल विद्यालय के बच्चों ने गाकर किया।
ध्वजारोहण के बाद सभी उपस्थित स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों ने प्रातःराश लिया। इसके बाद प्रातः 10.00 बजे से आरम्भ भजन एवं उपदेश के कार्यक्रम में विद्वानों के उपदेश आदि हुए।
प्रथम श्री सुखपाल आर्य जी के भजन हुए। उन्होंने कई भजन प्रस्तुत किये।
पं. सुखपाल आर्य जी ने प्रथम भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘सबसे बड़ा ओम् का नाम, ओम् नाम से सब दुःख भागे कमाओ उम्र तमाम, सबसे बड़ा ओम् का नाम।।’ पंडित जी ने दूसरा भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘थोड़ा घी, थोड़ी सामग्री और समिधा लेकर हवन करो।
करो प्रदुषण दूर और प्रतिदिन हवन किया करो।।’ पंडित सुखपाल आर्य जी ने बेमोल जी लिखित तीसरा भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे - ‘धर्म के नाम पर इंसान कितना पाप करता है, कहीं सरे आम करता है कहीं चुपचाप करता है।
चढ़ा कर भेंट पशुओं की मनाता है खुशियां, कोई पूछे पुजारी से तू यह कैसा काम करता है।” पंडित सुखपाल आर्य जी ने चैथा भजन भी प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘न राम होता न श्याम होता, न वेद होते न गीता होती, अगर दयानन्द न आते तो यहां कुरान और बाईबिल पढ़ाई जाती।
यदि ऋषि दयानन्द न आते तो हमारी जाति की हालात बहुत खराब होती।’
आज के उत्सव में प्रसिद्ध वैदिक आर्ष गुरुकुल पौंधा के विद्वान आचार्य डा. धनजंय आर्य जी भी पधारे थे।
आचार्य जी ने समारोह में उपस्थित समाज द्वारा संचालित बाल विद्यालय के बच्चों तथा सदस्यों को सम्बोधित करते हुए कहा कि जो विद्यार्थी अपने जीवन में अपने कर्तव्यों का भलीभांति पालन करते हैं उन्हें दूसरों से प्रशंसा मिलती है और उनका जीवन धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से सफलता प्राप्त करता है।
आचार्य जी ने कहा कि हमें मानव शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है। हमें परमात्मा के ज्ञान जो उन्होंने सृष्टि के आरम्भ में वेद के द्वारा दिया था, को जानना और प्राप्त करना है।
उस वेद ज्ञान को हमें अपने आचरण में लाना है। ऐसा करने से हमारा जीवन सफल होगा।
आचार्य जी ने श्रोताओं व बच्चों को बताया कि पितर वह होते हैं जो हमें ज्ञान व संस्कार देते हैं तथा हमें वेदानुसार जीवन चलाने में मार्गदर्शन देते हैं।
उन्होंने बताया कि देव व पितर मनुष्य की मेधा बुद्धि से तृप्त व प्रसन्न होते हैं। उन्होंने कहा कि मेधा बुद्धि वह ज्ञान सम्पन्न बुद्धि होती है जिससे हमें सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है।
विद्वान आचार्य ने श्रोताओं को कहा कि हमें संसार को यथार्थ रूप में जानने की आवश्यकता है। आचार्य जी ने कहा कि हमें वेदों का अध्ययन कर मेधा बुद्धि को प्राप्त होकर उसका सदुपयोग ईश्वर की उपासना एवं सांसारिक जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिये करना है।
आचार्य जी ने कहा कि जिन परिवारों में आर्य विचारधारा का प्रभाव व प्रचलन है उन परिवारों के बच्चे अन्य परिवारों से अधिक संस्कारित एवं शुभ गुणों से युक्त होते हैं।
वह परिवार और बच्चे देश व समाज के अहित का कोई कार्य नहीं करते। वह परिवार देश और समाज की उन्नति में प्रयत्नशील व सहयोगी होते हैं।
उन्होंने श्रोताओं के रूप में गृहस्थी बन्धुओं को कहा कि आप अपने परिवारों के बच्चों को उत्तम वैदिक संस्कारों से सुभूषित करें। आचार्य जी ने आगे कहा कि ईश्वर भक्त व्यक्ति ही अपनी मेधा बुद्धि को जाग्रत कर सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि हमें अपनी मेधा बुद्धि को जाग्रत करना है तथा उसे श्रेष्ठ बनाना है। हमें प्रतिदिन प्रातः व सायं ईश्वर की उपासना, ईश्वर का ध्यान, चिन्तन तथा मनन करना चाहिये।
हमें प्रतिदिन वैदिक ग्रन्थों का स्वाध्याय भी करना चाहिये।
स्वाध्याय के लिये उन्होंने सत्यार्थप्रकाश, चार वेद, 6 दर्शन, 11 उपनिषद्, विशुद्ध मनुस्मृति, स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती द्वारा सम्पादित वाल्मीक रामायण एवं महाभारत ग्रन्थ तथा आर्य विद्वानों के वेदों पर लिखे गये ग्रन्थों को उत्तम बताया।
आचार्य धनंजय जी ने यह भी कहा कि जो मनुष्य व गृहस्थी पंचमहायज्ञों को नहीं करता उसे पाप लगता है और इस कारण उसे जीवन में दुःख मिलता है। महायज्ञ न करने से मनुष्यों को वो सफलतायें नहीं मिलती जो इन यज्ञों को करने वालों को मिलती है।
आचार्य जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक उपदेश यह भी किया कि आर्यसमाज के सभी अधिकारियों व सदस्यों को आर्यसमाज में समय समय पर आने वाले विद्वानों, भजनोपदेशकों एवं विद्वान अतिथियों को अपने घर पर आमंत्रित कर भोजन कराना चाहिये।
इससे होने वाले लाभों की भी उन्होंने चर्चा की और कहा कि वह आज जो हैं वह अपने पिता के इसी अतिथि यज्ञ के गुण के कारण से हैं। आचार्य जी ने कहा कि जिस परिवार में वैदिक विद्वानों का आना जाना लगा रहता है उस परिवार के बच्चों को भी अच्छे संस्कार मिलते हैं।
अपने व्याख्यान को विराम देते हुए उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि वह हम सबको मेधा बुद्धि से सम्पन्न करें। आचार्य जी के व्याख्यान के बाद आयोजन में उपस्थित दो सामाजिक कार्यकर्ताओं श्री कुलदीप जी और श्री रोहित मौर्य जी का सम्मान किया गया।
यह बन्धु हिन्दू समाज की युवतियों को विधर्मियों से बचाते हैं और उनके विवाह आदि सम्पन्न कराने में योगदान करते हैं तथा वीर सावरकर जी की विचारधारा का प्रचार करने सहित उनके जीवन पर उनकी जयन्ती आदि अवसरों पर सामाजिक आयोजन आदि करते हैं।
आज के समारोह के मुख्य वक्ता हरिद्वार से पधारे आर्य विद्वान एवं ऋषिभक्त श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी थे। अपने व्याख्यान के आरम्भ में उपस्थित बच्चों को उन्होंने बताया कि जो बचे हुए हैं उन्हें बच्चा कहा जाता है।
बचे हुए होने का तात्पर्य काम, क्रोध, व्यसन, द्वेष व अभिमान आदि से बचा हुआ होना है। इन बुराईयों के न होने के कारण बच्चे सबको अच्छे लगते हैं।
उन्होंने आर्यसमाज पर एक भजन ‘ये आर्यसमाज है जी आर्य समाज है’ का अपने स्वरों में स्वर मिलाकर पाठ कराया। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज ने देश व समाज से रुढ़ियों को मिटाया है।
आर्यसमाज व आर्यसमाजी सच्ची मूर्तियों की पूजा करते हैं। आचार्य जी ने वास्तविक मूर्तिपूजा का यथार्थ अर्थ भी बताया।
आचार्य जी ने कहा कि मूर्ति को मनुष्य भी बनाता है और परमात्मा भी बनाता है। उन्होंने कहा कि हमारे माता, पिता व आचार्य आदि सब सजीव मूर्तियां हैं, इन्हें परमात्मा ने बनाया है।
इन ज्ञान व बल से युक्त सजीव मूर्तियों की सन्तानों व अन्य सभी को पूजा व सत्कार करना चाहिये। माता, पिता तथा आचार्यों आदि की वैदिक विधि से सत्कार पूर्वक सेवा आदि करना ही सच्ची मूर्तिपूजा है।
उन्होंने कहा हमारी यह मूर्तियां भोजन भी करती हैं जबकि पाषाण आदि की बनी मूर्तियां भोजन नहीं करती। पाषाण मूर्तियों को भोजन कराना व्यर्थ एवं मिथ्या है।
आचार्य जी ने कहा कि माता, पिता व आचार्य उन्हीं सन्तानों व शिष्यों को पसन्द करते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के उनकी इच्छानुसार उनकी सेवा करते हैं, उन्हें भोजन कराते हैं तथा उन्हें आवश्यकता के अनुसार वस्त्र देते हैं तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करके उन्हें सन्तुष्ट रखते हैं।
आचार्य जी ने कहा कि इस प्रकार से माता, पिता आदि की सेवा सुश्रुषा करना ही सच्ची मूर्ति पूजा है। उन्होंने कहा हम आर्यसमाजी इसी मूर्ति पूजा को करते हैं।
आचार्य जी ने कहा कि माता, पिता आदि अपनी उसी सन्तान को पसन्द करते हैं जिसकी सेवा से वह सन्तुष्ट होते हैं। जो सन्तानें माता-पिता की सेवा नहीं करती हैं उनसे माता-पिता सन्तुष्ट नहीं होते हैं।
आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने श्राद्ध पक्ष में सभी सन्तानों को अपने जीवित माता-पिताओं, पितामह व पितामही आदि को अच्छा भोजन कराने, उन्हें वस्त्र आदि देने सहित अपनी सेवा से सन्तुष्ट करने की प्रेरणा की।
आचार्य जी ने बताया कि ऋषि दयानन्द को ‘ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव’ सबसे अधिक प्रिय था। इसका अर्थ भी उन्होंने श्रोताओं को बताया और कहा कि इसमें ईश्वर से दुर्गुणों के त्याग तथा सद्गुणों की प्राप्ति की प्रार्थना है।
आचार्य जी ने यह भी कहा कि हमें अपनी बुराईयों को जानना चाहिये और उन्हें दूर करना चाहिये। उन्होंने कहा कि हमें सभी सद्गुणों को भी जानना चाहिये और उन्हें अपने आचरण में लाना चाहिये।
आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि सत्संग को नापने का पैमाना सत्संग में सुनी बातों का वेदानुकूल होना होता है। यदि सत्संग की कोई बात वेदानुकूल न हो तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को जिस काम को करने में भय, शंका व लज्जा उत्पन्न होती है वह काम करने योग्य नहीं होता। ऋषि दयानन्द जी के इस कथन पर विद्वान वक्ता ने विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने अच्छे कार्यों को भी ऋषि दयानन्द जी के शब्दों में प्रस्तुत किया और कहा कि जिन कार्यों को करने में भय न हो, शंका न हो, लज्जा न हो तथा जो वेद सम्मत हों एवं जिसे करने से आत्मा में प्रसन्नता हो, वह कार्य करने योग्य होते हैं।
कार्यक्रम का संचालन आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित श्री गुरमीत शास्त्री जी ने योग्यतापूर्वक किया। आज के आयोजन में श्री शत्रुघ्न मौर्य, जितेन्द्र तोमर जी, बहिन श्रीमती सुषमा शर्मा जी, श्री मदन मोहन जी, श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी, श्री पवन कुमार जी, आर्यसमाज के पदाधिकारी एवं सदस्यगण तथा आर्यसमाज के स्कूलों के बच्चे बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। आज का कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य पताः 196 चुक्खूवाला-2 देहरादून-248001 फोनः09412985121
