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अहिंसा केवल आचरण नहीं, विश्व शांति का आधार है: विज्ञान समिति की संगोष्ठी में विभिन्न धर्मों के वक्ताओं ने दिया संदेश

उदयपुर। अहिंसा दिवस के अवसर पर विज्ञान समिति, अशोक नगर में विभिन्न धर्मों में अहिंसा की अवधारणा विषय पर विचारपूर्ण संगोष्ठी आयोजित की

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अहिंसा केवल आचरण नहीं, विश्व शांति का आधार है: विज्ञान समिति की संगोष्ठी में विभिन्न धर्मों के वक्ताओं ने दिया संदेश

उदयपुर। अहिंसा दिवस के अवसर पर विज्ञान समिति, अशोक नगर में “विभिन्न धर्मों में अहिंसा की अवधारणा” विषय पर विचारपूर्ण संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम का शुभारंभ कुलगीत से हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विज्ञान समिति के अध्यक्ष डॉ. के. एल. तोतावत ने की, जबकि डॉ. के. पी. तलेसरा ने विषय का परिचय दिया तथा संचालन प्रकाश तातेड़ ने किया।

डॉ. के. पी. तलेसरा ने अपने विषय - परिचय में इस विचार को रेखांकित किया कि स्वर्ग का राज्य मनुष्य के भीतर ही विद्यमान है। उन्होंने अहिंसा को बाहरी आचरण के साथ - साथ अंतर्मन की शुद्धता और आत्मचेतना से जोड़कर देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने डेविड थोरो के विचारों का भी संदर्भ दिया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि महात्मा गांधी का जीवन और उनका अहिंसा का दर्शन अनेक महान व्यक्तित्वों और विचारों से प्रेरित हुआ था।

वक्ताओं में डॉ. आर. के. गर्ग ने कहा कि सत्य और अहिंसा एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। उन्होंने मानसिक, वाचिक और शारीरिक हिंसा के विभिन्न रूपों की चर्चा करते हुए कर्म के सिद्धांत को समझाया। रामायण एवं महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने बताया कि भारतीय परंपरा में हिंसा-अहिंसा और कर्म के परिणामों को लेकर गहन चिंतन मिलता है।

डॉ. पी. एम. अग्रवाल ने जैन दर्शन में अहिंसा की व्यापक अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने तत्त्वार्थ सूत्र के संदर्भ में हिंसा के चार भेदों को समझाया तथा गृहस्थ जीवन में संकल्पपूर्वक हिंसा को शून्य करने और अणुव्रत के रूप में अहिंसक जीवनशैली अपनाने पर बल दिया। उन्होंने सात बुरी आदतों के प्रति Zero Tolerance की भावना विकसित करने का आह्वान किया।

फादर जोबिन एसपीडी ने ईसाई दृष्टिकोण से अहिंसा की व्याख्या करते हुए कहा कि हमारे विचार और शब्द सदैव शुद्ध होने चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सहिष्णुता और क्षमा की विशेष आवश्यकता है। हिंसा से हिंसा समाप्त नहीं होती, बल्कि बढ़ती है। मानसिक शांति और संवाद के माध्यम से ही समस्याओं का समाधान संभव है।

इंजीनियर फारूक ओमान ने कुरआन की आयतों के माध्यम से निर्दोष व्यक्ति की जान लेने तथा किसी व्यक्ति का जीवन बचाने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि बदला लेने में सक्षम होने के बावजूद इंसाफ, रहम और माफी का रास्ता अपनाना अहिंसा और मानवीयता का महत्वपूर्ण स्वरूप है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अहिंसा कायरता नहीं, बल्कि साहस और आत्मसंयम है।

सुजान सिंह ने समाज से अस्पृश्यता को जड़-मूल से समाप्त करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सामाजिक भेदभाव भी व्यापक अर्थों में हिंसा का स्वरूप है।

आर. के. नेभनानी ने अद्वैतवाद और अहिंसा के संबंध पर विचार व्यक्त करते हुए प्रश्न उठाया कि जब विश्व के सभी प्रमुख धर्म शांति का संदेश देते हैं, तो फिर विश्व में अशांति के मूल कारण क्या हैं। उन्होंने आत्मचिंतन और मानवीय दृष्टिकोण को इसका महत्वपूर्ण समाधान बताया।

प्रो. प्रेम सुमन ने बौद्ध धर्म में अहिंसा की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का उल्लेख किया। उन्होंने बोधि और धर्मपथ के माध्यम से करुणा, मैत्री और आत्मबोध को अहिंसक जीवन का आधार बताया।

प्रो. विमल शर्मा ने अहिंसा को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समझाते हुए डॉ. ह्यू लेन से जुड़े होहोपोनोपोनो से हिंसक मरीजों को ठीक करने के उदाहरण का उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि इस उदाहरण में मानसिक रूप से आक्रामक मरीजों के प्रति क्षमा, आत्मचिंतन और सकारात्मक मानसिकता के माध्यम से परिवर्तन की अवधारणा सामने आती है।

उन्होंने कहा कि हिंसक मानसिकता को भी करुणा, क्षमा, आत्मशुद्धि और सकारात्मक संवाद के माध्यम से अहिंसक दिशा दी जा सकती है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. के. एल. तोतावत ने कहा कि अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। मन, वचन और कर्म की शुद्धता, सहिष्णुता, क्षमा और परस्पर सम्मान इसके आवश्यक अंग हैं।

कुल प्रमुख डॉ के एल कोठारी ने कहा कि संगोष्ठी में यह संदेश प्रमुखता से उभरा है कि अहिंसा केवल किसी को चोट न पहुँचाने का नाम नहीं, बल्कि मन में द्वेष न रखना, वाणी में कटुता से बचना, क्षमा करना, असहमति में भी संवाद बनाए रखना और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करना है।

कार्यक्रम का संचालन प्रकाश तातेड़ ने किया।