भारत के सांस्कृतिक इतिहास में विजयदशमी केवल असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर मर्यादा की विजय का पर्व नहीं है। यह आत्ममंथन, संकल्प और नई शुरुआत का अवसर भी है।
इसी दिन वर्ष 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। इस ऐतिहासिक संयोग ने विजयदशमी को संघ के स्थापना दिवस के रूप में विशिष्ट पहचान दी।
एक शताब्दी की यात्रा पूरी करने के बाद संघ का इतिहास भारतीय समाज, संस्कृति और संगठनात्मक जीवन के अनेक पहलुओं पर विमर्श का विषय है।*राजनीतिक स्वतंत्रता से आगे राष्ट्र निर्माण की कल्पना*बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था।
स्वतंत्रता आंदोलन गति पकड़ रहा था और देश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक जागरण के साथ सामाजिक सुधार की गतिविधियां भी चल रही थीं।
ऐसे वातावरण में डॉ. हेडगेवार के सामने यह प्रश्न था कि स्वतंत्रता की आकांक्षा को व्यापक सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चरित्र से कैसे जोड़ा जाए।संघ की स्थापना के पीछे उनकी परिकल्पना एक ऐसे संगठन की थी, जो नियमित संपर्क, अनुशासन, सामूहिक गतिविधियों और स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण के माध्यम से समाज में संगठन की भावना विकसित करे।
इस दृष्टिकोण में व्यक्ति का निर्माण राष्ट्र निर्माण की आधारशिला माना गया।संघ की स्थापना किसी राजनीतिक दल के रूप में नहीं हुई थी। उसकी प्रारंभिक कार्यपद्धति में शाखा, शारीरिक प्रशिक्षण, सामूहिक खेल, बौद्धिक चर्चा और अनुशासित दिनचर्या को प्रमुख स्थान दिया गया।
उद्देश्य यह था कि सामाजिक जीवन में सक्रिय, जिम्मेदार और संगठित नागरिक तैयार हों।*शाखा : व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशाला*राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान उसकी शाखा व्यवस्था से गहराई से जुड़ी है।
शाखा में स्वयंसेवक नियमित रूप से एकत्र होते हैं और खेल, व्यायाम, प्रार्थना, चर्चा तथा विभिन्न सामूहिक गतिविधियों में भाग लेते हैं। संघ की दृष्टि में यह दिनचर्या अनुशासन, समयबद्धता, सहयोग और सामाजिक दायित्व की भावना विकसित करने का माध्यम है।
व्यक्ति निर्माण की यह अवधारणा इस विश्वास पर आधारित है कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, सैन्य क्षमता या राजनीतिक संस्थाओं से निर्धारित नहीं होती।
नागरिकों का चरित्र, सार्वजनिक जीवन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और संकट के समय एक-दूसरे के सहयोग की तत्परता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।हालांकि, किसी संगठन के प्रशिक्षण से सामाजिक चरित्र में कितना व्यापक परिवर्तन आता है, इसका आकलन उसके घोषित उद्देश्यों के साथ-साथ वास्तविक कार्यों, सामाजिक प्रभाव और आलोचनात्मक अनुभवों के आधार पर भी किया जाना चाहिए।*संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान*संघ भारतीय संस्कृति, सभ्यतागत निरंतरता और हिंदू सांस्कृतिक पहचान को अपने वैचारिक चिंतन में केंद्रीय स्थान देता है।
उसके समर्थक इसे भारत की ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने वाला प्रयास मानते हैं।
दूसरी ओर, आलोचकों ने उसके हिंदुत्व संबंधी दृष्टिकोण, अल्पसंख्यकों के स्थान और बहुलतावादी राष्ट्रवाद के साथ उसके संबंधों पर प्रश्न उठाए हैं।यह विमर्श भारतीय लोकतंत्र की वास्तविकता का हिस्सा है।
भारत की संस्कृति में अनेक भाषाएं, परंपराएं, आस्थाएं और जीवन पद्धतियां साथ-साथ विकसित हुई हैं।
इसलिए राष्ट्र निर्माण की किसी भी अवधारणा की सार्थकता का मूल्यांकन इस कसौटी पर भी होना चाहिए कि वह विविधता के बीच संवाद, समान नागरिकता और सामाजिक सद्भाव को किस प्रकार स्थान देती है।*सेवा कार्य और सामाजिक सहभागिता*समय के साथ संघ से जुड़े स्वयंसेवकों तथा विभिन्न सहयोगी संगठनों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, आपदा राहत और सामाजिक जागरूकता जैसे क्षेत्रों में गतिविधियां संचालित की हैं।
प्राकृतिक आपदाओं और स्थानीय संकटों के समय स्वयंसेवकों की भागीदारी अनेक स्थानों पर देखी गई है।सेवा की विश्वसनीयता का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसका लाभार्थी के प्रति व्यवहार है।
समाज सेवा तब व्यापक विश्वास अर्जित करती है, जब वह जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र और धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचे।
सेवा का मूल्य उसके प्रचार से अधिक उसकी निरंतरता, पारदर्शिता और वास्तविक परिणामों से निर्धारित होता है।*सौ वर्ष बाद आगे की कसौटी*संघ की सौ वर्षीय यात्रा का मूल्यांकन केवल उसके विस्तार या संगठनात्मक क्षमता से नहीं किया जा सकता।
यह देखना भी जरूरी है कि वह नई पीढ़ी में नागरिक जिम्मेदारी, संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता को किस प्रकार प्रोत्साहित करता है।आज भारत तेजी से बदल रहा है।
तकनीक, शहरीकरण, आर्थिक असमानता, पर्यावरण संकट और सामाजिक संवाद की चुनौतियां नए उत्तर मांगती हैं।
ऐसे समय में व्यक्ति निर्माण की कोई भी परिकल्पना तभी सार्थक होगी, जब वह अनुशासन के साथ विवेक, संगठन के साथ सहिष्णुता और राष्ट्रीय गौरव के साथ दूसरों के अधिकारों के प्रति सम्मान भी विकसित करे।विजयदशमी का संदेश भी यही है कि विजय केवल किसी बाहरी प्रतिद्वंद्वी पर प्राप्त उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने भीतर की कमजोरियों पर नियंत्रण का नाम है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के सौ वर्ष इस विचार पर पुनर्विचार का अवसर प्रदान करते हैं कि राष्ट्र निर्माण का सबसे टिकाऊ आधार कैसा नागरिक और कैसा समाज होना चाहिए।——-*(लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधान सभा के माननीय अध्यक्ष हैं)*
