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Udaipur News

अनुकूलता में राग और प्रतिकूलता में द्वेष से बढ़ता है कर्मबंधनःसाध्वी विद्युतप्रभा

कृष्णगिरी पीठाधीश्वर वसंत विजयानंद गिरी महाराज के आगमन पर हुआ भव्य स्वागत

मुख्य बिंदु
  • वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शनिवार सुबह कृष्णगिरी पीठाधीश्वर वसंत विजयानंद गिरी महाराज के आगमन पर सैकड़ों श्रावकों ने बैंड-बाजे के साथ भव्य अगवानी की।
  • महाराज श्री ने मंदिर पहुंचकर भगवान के दर्शन किए।
  • रविवार को मुनिश्री के सान्निध्य में उवसग्गहरं महापूजा का आयोजन होगा।
  • नियमित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि जीवन में आने वाली अनुकूलता और प्रतिकूलता किसी दूसरे व्यक्ति के कारण नहीं, बल्कि हमारे स्वयं के कर्मों के परिणामस्वरूप आती है।
  • पुण्य कर्म का उदय होने पर अनुकूल परिस्थितियां प्राप्त होती हैं, जबकि पाप कर्मों के उदय से प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
  • उन्होंने कहा कि परमात्मा ने अपनी आत्मा को तपस्या से शुद्ध करते हुए साढ़े बारह वर्षों तक कठोर साधना की और केवलज्ञान प्राप्त किया।
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अनुकूलता में राग और प्रतिकूलता में द्वेष से बढ़ता है कर्मबंधनःसाध्वी विद्युतप्रभा

उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शनिवार सुबह कृष्णगिरी पीठाधीश्वर वसंत विजयानंद गिरी महाराज के आगमन पर सैकड़ों श्रावकों ने बैंड-बाजे के साथ भव्य अगवानी की।

महाराज श्री ने मंदिर पहुंचकर भगवान के दर्शन किए।

रविवार को मुनिश्री के सान्निध्य में उवसग्गहरं महापूजा का आयोजन होगा।नियमित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि जीवन में आने वाली अनुकूलता और प्रतिकूलता किसी दूसरे व्यक्ति के कारण नहीं, बल्कि हमारे स्वयं के कर्मों के परिणामस्वरूप आती है।

पुण्य कर्म का उदय होने पर अनुकूल परिस्थितियां प्राप्त होती हैं, जबकि पाप कर्मों के उदय से प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।उन्होंने कहा कि परमात्मा ने अपनी आत्मा को तपस्या से शुद्ध करते हुए साढ़े बारह वर्षों तक कठोर साधना की और केवलज्ञान प्राप्त किया।

इस दौरान उन्होंने अनेक कष्ट एवं उपसर्ग सहन किए।

साध्वीश्री ने कहा कि जब व्यक्ति सुख-दुःख अथवा अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए किसी अन्य को जिम्मेदार ठहराना छोड़ देता है, तब कर्मों का बंधन कम होने लगता है।साध्वीश्री ने कहा कि कर्मबंधन का मूल कारण बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि हमारा चिंतन है।

सम्यक चिंतन और सम्यक विचार करने वाले व्यक्ति के कर्मों का बंधन अल्प होता है।

अनुकूल परिस्थिति मिलते ही राग और प्रतिकूलता आते ही द्वेष उत्पन्न होना स्वाभाविक है, लेकिन साधना का उद्देश्य इन दोनों से ऊपर उठकर समभाव बनाए रखना है।उन्होंने कहा कि जीवन में अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों आएंगी।

प्रतिकूलताएं कदम-कदम पर मनुष्य की परीक्षा लेती हैं। आराधना के माध्यम से साधना और साधना के माध्यम से आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

कर्मों का बंधन हो या कर्मों की निर्जरा, दोनों में व्यक्ति के चिंतन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।साध्वीश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी हत्यारे के हाथों किसी जीव की हत्या हो और उसी क्षण उसके भीतर यह विचार जाग जाए कि उसने गलत किया है, तो यही आत्मचिंतन परिवर्तन की शुरुआत बन सकता है।

उन्होंने कहा कि शरीर से आने वाली दुर्गंध को तो कुछ समय सहन किया जा सकता है, लेकिन पापकर्मों से उत्पन्न होने वाली कर्मगंध को सहन करना कठिन है।

इसलिए मनुष्य को अपने विचारों और कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।