उदयपुर। जनजातीय समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपरागत कला और अद्भुत सृजनशीलता को साकार करती जनजातीय चित्रकला एवं कलाकृतियों की तीन दिवसीय प्रदर्शनी का शुक्रवार को समापन हुआ।
माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (टीआरआई), उदयपुर की ओर से जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से सपोर्ट टू टीआरआई कार्यक्रम के तहत आयोजित इस प्रदर्शनी का संभागीय आयुक्त खजानसिंह ने अवलोकन किया।
उन्होंने जनजातीय कलाकारों की कल्पनाशीलता, कलात्मक कौशल और पारंपरिक कला शैलियों की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए ऐसी गतिविधियों को निरंतर प्रोत्साहन देने की आवश्यकता जताई।संभागीय आयुक्त श्री संह ने कहा कि जनजातीय कला हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इन कलाकृतियों में जनजातीय समाज की जीवनशैली, लोकपरंपराओं, प्रकृति के प्रति अनुराग और सांस्कृतिक मूल्यों की अनूठी झलक दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि जनजातीय कलाकार अपनी परंपरागत कला के माध्यम से पीढ़ियों से संजोई सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए हुए हैं।
ऐसी कला शैलियों का संरक्षण और संवर्धन समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जनजातीय कलाकारों की प्रतिभा को व्यापक मंच प्रदान करने के लिए कार्यशालाओं और प्रदर्शनियों जैसे आयोजनों को निरंतरता मिलनी चाहिए।
इससे न केवल पारंपरिक कलाओं को नई पहचान मिलेगी, बल्कि कलाकारों का उत्साहवर्धन होने के साथ नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी।
उन्होंने प्रदर्शनी स्थल पर उपस्थित टीआरआई टीम, बनफूल स्टुडियो के कलाकारों से संवाद भी किया।कलाकृतियों में दिखी भील जनजाति की अनूठी कला परंपराचेतक सर्कल स्थित सूचना केंद्र के प्रदर्शनी हॉल में पहुंचने पर संभागीय आयुक्त का उपनिदेशक जनसंपर्क गौरीकांत शर्मा ने स्वागत किया तथा प्रदर्शनी का अवलोकन कराया।
इस दौरान संभागीय आयुक्त ने प्रदर्शित चित्रों एवं कलाकृतियों को रुचिपूर्वक देखा। उन्होंने भील जनजाति के कलाकारों द्वारा पारंपरिक कला शैलियों के माध्यम से उकेरे गए चित्रों की सराहना की।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन जनजातीय समाज की कला और संस्कृति को व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं।सात जिलों के 35 से अधिक कलाकारों ने दिखाई प्रतिभाटीआरआई निदेशक श्री ओ.पी. जैन ने बताया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से सपोर्ट टू टीआरआई कार्यक्रम के अंतर्गत 9 से 13 अक्टूबर तक राज्य स्तरीय जनजातीय चित्रकला एवं कला कार्यशाला का आयोजन किया गया था।
इसमें उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सलूम्बर, बालोतरा एवं सिरोही जिलों के 35 से अधिक भील जनजातीय कलाकारों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी निभाई।
कार्यशाला के दौरान कलाकारों ने अपनी क्षेत्रीय कला शैलियों, पारंपरिक चित्रांकन तकनीकों और रचनात्मक कौशल का प्रदर्शन करते हुए आकर्षक चित्रों एवं कलाकृतियों का सृजन किया।
इन्हीं कलाकृतियों को तीन दिवसीय प्रदर्शनी के माध्यम से आमजन के अवलोकनार्थ प्रदर्शित किया गया।लोकसंस्कृति और सृजनशीलता का अनूठा संगम बनी प्रदर्शनीश्री जैन ने बताया कि प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य जनजातीय चित्रकला एवं पारंपरिक कलारूपों को प्रोत्साहन देने के साथ आमजन को जनजातीय समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना रहा।
प्रदर्शनी के माध्यम से दर्शकों को भील जनजाति की कलात्मक अभिव्यक्तियों, क्षेत्रीय कला शैलियों और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं को करीब से जानने का अवसर मिला।
तीन दिवसीय प्रदर्शनी ने जनजातीय कलाकारों की प्रतिभा को मंच प्रदान करने के साथ ही उनकी कला के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार का महत्वपूर्ण संदेश दिया।
शुक्रवार को प्रदर्शनी का समापन हुआ।
