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Udaipur News

देवेन्द्रधाम की धर्मसभा में बच्चों के संस्कार, सेवा और परोपकार का दिया संदेश

नवरात्र के प्रथम दिवस शरीर के सातों चक्रों की साधना करवाई गई

मुख्य बिंदु
  • उदयपुर, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव भौतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि अच्छे संस्कारों से रखी जाती है।
  • माता-पिता बच्चों को बेहतर खान-पान, रहन-सहन और शिक्षा देने के साथ उनके जीवन में नैतिक मूल्यों का विकास करना भी न भूलें।
  • यह विचार देवेन्द्रधाम में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन संत डॉ.
  • सुरेंद्र मुनि ने व्यक्त किए।
  • सुरेंद्र मुनि ने कहा कि अच्छे संस्कारों के बिना उपलब्ध कराए गए तमाम संसाधन भी बच्चों को गलत दिशा में ले जा सकते हैं।
  • माता-पिता का आचरण, व्यवहार और जीवनशैली बच्चों के व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करते हैं।
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देवेन्द्रधाम की धर्मसभा में बच्चों के संस्कार, सेवा और परोपकार का दिया संदेश

उदयपुर, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव भौतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि अच्छे संस्कारों से रखी जाती है। माता-पिता बच्चों को बेहतर खान-पान, रहन-सहन और शिक्षा देने के साथ उनके जीवन में नैतिक मूल्यों का विकास करना भी न भूलें।

यह विचार देवेन्द्रधाम में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन संत डॉ. सुरेंद्र मुनि ने व्यक्त किए।डॉ. सुरेंद्र मुनि ने कहा कि अच्छे संस्कारों के बिना उपलब्ध कराए गए तमाम संसाधन भी बच्चों को गलत दिशा में ले जा सकते हैं।

माता-पिता का आचरण, व्यवहार और जीवनशैली बच्चों के व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करते हैं।

इसलिए बच्चों को आदर्श बनाने से पहले माता-पिता को स्वयं अपने जीवन को अनुशासित और व्यवस्थित बनाना चाहिए।उन्होंने कहा कि बच्चों को भौतिक सुविधाएं देने से पहले संस्कारों की पूंजी देना जरूरी है।

बालक कच्ची मिट्टी और नए पौधे के समान होते हैं, जिन्हें जिस प्रकार ढाला जाता है, वे वैसा ही स्वरूप ग्रहण करते हैं। बचपन में विकसित आदतें जीवनभर व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं।

बच्चे देश का भविष्य हैं, इसलिए उनके जीवन को सही दिशा देना परिवार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

प्रवचन से पूर्व आज नवरात्रि के उपलक्ष में प्रथम दिवस डॉ. सुरेंद्र मुनि द्वारा भारी संख्या में उपस्थित गुरु भक्तों को शरीर में स्थित सात चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान , मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा एवं सहस्त्रार की साधना पृथ्वी,जल ,अग्नि, वायु, आकाश ,ज्ञान एवं ध्यान मुद्रा के द्वारा बीज मित्रों के के साथ करवाई गई जिससे उपस्थित जन समूह ने अपने भीतर ऊर्जा का उर्ध्विकरण महसूस किया एवं सभी अभिभूत हो उठे।धर्मसभा में प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने श्रमण संघ विहार सेवा के सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि सेवा ही सर्वाेत्तम धर्म है।

मानव जीवन केवल अपने लिए जीने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की सहायता और परोपकार करने के लिए मिला है।

केवल अपने हित के बारे में सोचने वाला व्यक्ति स्वार्थ तक सीमित रह जाता है।उन्होंने भगवान हनुमान का उदाहरण देते हुए कहा कि हनुमान जी ने भगवान श्रीराम की निष्काम सेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाया।

इसी प्रकार मनुष्य की वास्तविक सुंदरता उसके रंग-रूप में नहीं, बल्कि उसके गुणों, कर्मों और सेवा भावना में होती है। भगवान श्रीकृष्ण अपने श्रेष्ठ गुणों और कर्मों के कारण पूजनीय बने।

व्यक्ति की सच्ची पहचान उसके व्यवहार और परोपकारी कार्यों से होती है।कार्यक्रम में अध्यक्ष एडवोकेट रोशनलाल जैन, दिनेश चोरडिया और संदीप बोलिया सहित अन्य अतिथियों ने श्रमण संघ विहार सेवा में योगदान देने वाले कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

संस्था के महामंत्री हिम्मत बडाला ने सभी अतिथियों और श्रद्धालुओं का स्वागत करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर भक्तामर पाठ एवं नवरात्रि की विशेष साधना विधि-विधानपूर्वक संपन्न हुई।

धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्म, संस्कार, सेवा और परोपकार के संदेश को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।