भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से घिरा एक देश नहीं, बल्कि विविध भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों, परंपराओं और जीवनशैलियों का अद्भुत संगम है। इस विविधता को एक सूत्र में पिरोकर राष्ट्रीय एकता की मजबूत नींव रखने में जिन महापुरुषों का योगदान अविस्मरणीय है, उनमें लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम सर्वोपरि है। उनकी जयंती 31 अक्टूबर को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस हमें केवल अतीत के गौरव का स्मरण नहीं कराता, बल्कि वर्तमान की चुनौतियों के बीच एक सशक्त, समरस और अखंड भारत के निर्माण का संकल्प भी दिलाता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देशी रियासतों का एकीकरण था। उस समय सैकड़ों रियासतों में विभाजित भारत को एक राजनीतिक एवं प्रशासनिक इकाई के रूप में स्थापित करना अत्यंत कठिन कार्य था। सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी अद्भुत दूरदर्शिता, दृढ़ इच्छाशक्ति, कूटनीतिक कुशलता और राष्ट्रहित के प्रति अटूट समर्पण से इस असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को संभव बनाया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टिकोण और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के सामने बड़ी से बड़ी चुनौती भी छोटी पड़ जाती है। यही कारण है कि उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है।
आज राष्ट्रीय एकता का अर्थ केवल भौगोलिक अखंडता तक सीमित नहीं है। सामाजिक सद्भाव, सांप्रदायिक सौहार्द, भाषाई सम्मान, जातिगत भेदभाव से मुक्ति, लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठा भी राष्ट्रीय एकता के महत्वपूर्ण आधार हैं। भारत की असली ताकत उसकी विविधता में निहित है। हमारी भाषाएँ अलग हो सकती हैं, पूजा-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं और सांस्कृतिक परंपराएँ भी अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी राष्ट्रीय पहचान एक है। अनेकता में एकता ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता और विश्व के सामने हमारी विशिष्ट पहचान है।
वर्तमान समय में राष्ट्रीय एकता के समक्ष अनेक चुनौतियाँ भी हैं। जातिवाद, क्षेत्रवाद, धार्मिक कट्टरता, सामाजिक असमानता, नफरत फैलाने वाली अभिव्यक्तियाँ और सोशल मीडिया पर प्रसारित भ्रामक सूचनाएँ समाज के ताने-बाने को कमजोर कर सकती हैं। व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना आज की आवश्यकता है। असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक गुण है, लेकिन असहमति को वैमनस्य और शत्रुता में बदलने से रोकना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाने में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यालय केवल पुस्तकीय ज्ञान देने के केंद्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र, सामाजिक संवेदना और नागरिक उत्तरदायित्व विकसित करने के संस्थान भी हैं। बच्चों को संविधान, स्वतंत्रता आंदोलन, महापुरुषों के आदर्शों और देश की सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराना आवश्यक है। शिक्षक अपने आचरण और शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों में भेदभावरहित दृष्टिकोण, सहयोग, सहिष्णुता तथा राष्ट्रप्रेम की भावना विकसित कर सकते हैं।
युवा शक्ति भी राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी पूँजी है। उन्हें तकनीक, विज्ञान, नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से देश को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक समरसता के संवाहक की भूमिका निभानी होगी। डिजिटल युग में युवाओं का दायित्व है कि वे अफवाहों के स्थान पर सत्य, घृणा के स्थान पर सद्भाव और विभाजन के स्थान पर संवाद को बढ़ावा दें।
राष्ट्रीय एकता दिवस हमें यह आत्ममंथन करने का अवसर देता है कि हम अपने व्यवहार, विचार और कर्म से देश की एकता को कितना मजबूत बना रहे हैं। राष्ट्रनिर्माण केवल सरकारों या संस्थाओं का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की साझी जिम्मेदारी है। जब हम जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर एक-दूसरे के सम्मान, अधिकार और अस्तित्व को स्वीकार करेंगे, तभी सच्चे अर्थों में एक भारत, श्रेष्ठ भारत का स्वप्न साकार होगा।
सरदार पटेल को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके दृढ़ संकल्प को अपने जीवन का आदर्श बनाएँ। राष्ट्रीय एकता किसी एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि प्रतिदिन निभाया जाने वाला राष्ट्रीय दायित्व है। याद रहे, देश की सीमाएँ सेना सुरक्षित रखती है, लेकिन देश की आत्मा को नागरिकों की एकता, सद्भावना और सामूहिक चेतना ही सुरक्षित रखती है। एकजुट भारत ही समर्थ भारत है और समर्थ भारत ही विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आत्मविश्वास से आगे बढ़ सकता है।
-सत्य भूषण शर्मा [ प्रवक्ता, पत्रकार, लेखक, कवि एवं यूट्यूबर]
उदयपुर (राजस्थान)
