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Literature News

“संसार का स्वामी दुष्कर्म करने वाले सभी पापियों को यथोचित दण्ड देता है”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

मुख्य बिंदु
  • हमारा यह ब्रह्माण्ड स्वयं नहीं बना।
  • संसार की कोई भी उपयोगी वस्तु स्वतः नहीं बनती अपितु इन्हें कुछ ज्ञान-विज्ञान से पूर्ण मनुष्यों द्वारा उत्पन्न किया जाता है।
  • किसी भी वस्तु की रचना के तीन प्रमुख कारण होते हैं।
  • प्रथम कारण चेतन निमित्त कर्ता हुआ करता है।
  • दूसरा प्रमुख कारण उपादान कारण होता है जो वह सामग्री होती है जिससे उस वस्तु का निर्माण होता है।
  • इसे कारण सामग्री भी कह सकते हैं।
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“संसार का स्वामी दुष्कर्म करने वाले सभी पापियों को यथोचित दण्ड देता है”

हमारा यह ब्रह्माण्ड स्वयं नहीं बना। संसार की कोई भी उपयोगी वस्तु स्वतः नहीं बनती अपितु इन्हें कुछ ज्ञान-विज्ञान से पूर्ण मनुष्यों द्वारा उत्पन्न किया जाता है।

किसी भी वस्तु की रचना के तीन प्रमुख कारण होते हैं। प्रथम कारण चेतन निमित्त कर्ता हुआ करता है।

दूसरा प्रमुख कारण उपादान कारण होता है जो वह सामग्री होती है जिससे उस वस्तु का निर्माण होता है। इसे कारण सामग्री भी कह सकते हैं।

तीसरा कारण साधारण कारण कहलाता है। आजकल जो वस्तु बनती हैं वह प्रायः उद्योगों में बनती हैं।

इन उद्योगों में जो पदार्थ बनते हैं उनमें रचना तो उद्योग में बने उत्पाद होते हैं जिनका निमित्त कारण उस उद्योग के स्वामी, इंजीनियर व वैज्ञानिक आदि होते हैं जो अपनी व अपने सहयोगियों की बुद्धि, ज्ञान एवं शक्तियों से उस वस्तु को अस्तित्व में लाते हैं।

उद्योग की मशीनों को हम साधारण कारण कह सकते हैं। इसे त्रैतवाद का सिद्धान्त भी कह सकते हैं।

यह केवल इस सृष्टि में ईश्वर, जीव व प्रकृति के रूप में ही कार्यरत नहीं है अपितु यह जड़ जगत की रचना में भी कार्य करता है। पदार्थ के बनने में भी तीन प्रमुख कारण होते हैं और इन वस्तुओं के निर्माण व वितरण में भी तीन कारण दृष्टिगोचर होते हैं।

किसी भी व्यवसाय में एक स्वामी होता है। दूसरा व्यवसाय होता है और तीसरा वह सामग्री होती है जिसे कुछ उपभोक्ताओं को लाभान्वित करने के लिये विक्रय किया जाता है।

एक दुकान तभी खुलती व चलती है कि जब उसको चलाने वाला, उस दुकान में उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं का सामान तथा उपभोक्ता हों।

हमारी यह सृष्टि भी तीन कारणों से अस्तित्व में आयी है। परमात्मा इस सृष्टि को बनाने वाला निमित्त कारण है।

दूसरा कारण वह जीव जगत है जो अनादि काल से विद्यमान है। यह जीव जगत तथा परमात्मा अनादि व नित्य सत्तायें हैं जिनकी न कभी उत्पत्ति होती है और न ही नाश होता।

अतः ईश्वर अपनी शक्ति, सामथ्र्य, ज्ञान, व अनादि सत्ता त्रिगुणात्मक प्रकृति जो सत्व, रज व तम गुणों वाली है, इन्हें विज्ञान के नियमों के अनुसार घनीभूत कर इनसे इस सृष्टि के परमाणुओं, अणुओं, वायु, जल, अग्नि, पृथिवी व आकाश सहित सूर्य, चन्द्र, ग्रह, उपग्रह आदि पदार्थों को उत्पन्न करते हैं।

उन्होंने ही सृृष्टि में मानव शरीरों को बनाया है और वही इस सम्पूर्ण जगत का अपनी अनन्त शक्तियों से पालन व व्यवस्था कर रहे हैं।

ईश्वर का स्वभाव जहां सृष्टि को उत्पन्न करना, इसका पालन व प्रलय करना है, वहीं वह सभी जीवों को उनके पूर्वकल्पों व जन्मों के अभुक्त कर्मों के अनुसार जन्म और उन्हें सुख व दुःखरूपी फल देते हैं।

कोई भी जीव अपने किये हुए कर्म का फल भोगने से बच नहीं सकता। ईश्वर संसार के किसी एक जीव के भी कर्मों को क्षमा नहीं करता और न ही उनमें न्यूनाधिक करता है।

वह अनन्त सभी जीवों के कर्मों के साक्षी होते हैं। उन्हें किसी की साक्षी व गवाही की आवश्यकता नहीं होती।

ईश्वर के अलावा संसार में किसी दूसरे ईश्वर, उसके विशेष दूत, पुत्र व सन्देश वाहकों का अस्तित्व नहीं है। एक ईश्वर के अतिरिक्त दूसरी चेतन सत्ता केवल और केवल जीव है जो सब जन्म-मरण धर्मा हैं।

जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु अवश्य होती है। जिसकी मृत्यु होती है उनका जन्म भी अवश्य होता है।

संसार में जो भी जीव उत्पन्न हुआ व मरा है वह सब जन्म-मरण के चक्र में फंसे हुए हैं। सभी अपने किये शुभ व अशुभ तथा पाप व पुण्य कर्मों को भोगते हैं।

श्री राम व श्री कृष्ण ने भी अपने पूर्वजन्मों के कर्मों के फलों को भोगा है, ऋषि दयानन्द ने भी भोगा है और सभी मतों के आचार्य भी अपने अच्छे व बुरे कर्मों का फल संसार के रचयिता व पालक ईश्वर की व्यवस्था से भोगते हैं।

किसी आचार्य एवं उनके अनुयायियों के पाप कर्म क्षमा नहीं होते। आचार्यों द्वारा प्रचार करने पर भी उनके अनुयायियों के पाप व पुण्य कर्मों का फल बिना भोग किये क्षय को प्राप्त नहीं होता।

यह बात एक साधारण वैदिक धर्मी भी जानता है जिससे वह अशुभ व पाप कर्म करने से बचता है परन्तु सभी मत-सम्प्रदायों के लोग इस सिद्धान्त की उपेक्षा करते हैं।

कर्म फल सिद्धान्त का एक प्रमुख नियम यह है कि ‘अवश्यमेव हि भोक्तव्यं कृतं फल शुभाशुभं’ अर्थात् मनुष्य, जीवात्मा, आचार्य, शिष्य, विद्वान, मूर्ख, ईश्वर के दूत व उसको अपना संबंधी बताने वालों सभी मनुष्यों को अपने किये हुए शुभ व अशुभ कर्मों के फल अवश्य ही भोगने होंगे।

ऋषि दयानन्द एक तर्क पूर्ण बात यह कहते हैं कि यदि ईश्वर किसी जीव के साथ किंचित भी पक्षपात करे और उसे फल भोग में छूट दे तो उसकी न्याय व्यवस्था न्याय व्यवस्था नहीं रहेगी।

ईश्वरीय राज्य की सुव्यवस्था भंग हो जायेगी। यह वस्तुतः शत प्रतिशत सत्य सिद्धान्त है।

संसार का राजा कौन है? इसका एक ही उत्तर है कि इस सृष्टि की रचयिता एवं पालक शक्ति व सत्ता ईश्वर ही इसका एक मात्र राजा है।

ईश्वर का कोई प्रतिद्वन्दी नहीं है। कोई उससे अधिक और उसके समान नहीं।

वह एक मात्र सत्ता है। वही सब जीवों को उनके कर्मों का न्यायपूर्वक फल प्रदान करते हुए सुख व दुःख रूपी फलों से लाभान्वित व पीड़ित करता है।

संसार के सभी जीव व सभी मनुष्य जो वर्तमान हैं, भूतकाल में हो चुके हैं तथा भविष्य में होंगे, वह सब ईश्वर की न्यायवस्था के अनुसार अनादि काल से सुख व दुख पाते चले आ रहे हैं और अनन्त काल तक पाते रहेंगे।

सत्य तो यह है कि ईश्वर ही संसार के सभी देशों के सभी न्यायाधीशों का भी उनके निजी कर्मों का न्यायाधीश एवं न्यायकर्ता है।

संसार में जितने मत प्रचलित हैं उनके आचार्यों व अनुयायियों को भी एक सृष्टिकर्ता जगदीश्वर से ही कर्म फलों के अनुसार न्याय के रूप में सुख व दुःख रूपी दण्ड मिलता है।

अतीत में भी मिला है और भविष्य में भी मिलेगा। कोई किसी मत का व्यक्ति पाप कर किसी आचार्य व मत पर विश्वास कर ले, उसे अपने पाप व अन्य कर्मों के फल तो अन्य जीवों व मनुष्यों के समान ही प्राप्त होंगे क्योंकि सब मतों का ईश्वर एक ही सत्ता है।

वह अलग अलग मतों व सम्प्रदायों के लिए अलग अलग नहीं है। इस नियम व सिद्धान्त पर विचार कर सभी मतों के अनुयायियों को अपने-अपने मत में पक्षपातपूर्ण व्यवहार व प्राणियों पर द्वेष व अन्यायपूर्ण व्यवहार को दूर करना चाहिये।

यदि ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें ईश्वर की व्यवस्था से उसका यथोचित फल अन्य सभी मतों के लोगों के समान अवश्य मिलेगा। विज्ञान के नियम पूरे संसार व ब्रह्माण्ड पर समान रूप से लागू होते हैं।

परमात्मा के भी सभी नियम पूरे ब्रह्माण्ड में समान रूप से लागू होते हैं।

सभी मनुष्यों का कर्तव्य है मत-मतान्तरों की विषसम्पृक्त अन्न के समान मान्यताओं व विचारधाराओं का विवेकपूर्वक अध्ययन कर उनकी अविद्यायुक्त बातों को अस्वीकार करना चाहिये और सत्यमत व सत्य विचारधारा को ही अपनाना चाहिये।

संसार में सत्य विचारधारा वैदिक विचारधारा वा वेद की वैदिक विचारधारा ही है। हम वेदों का जितना अध्ययन व आचरण करेंगे उतना ही अधिक हमें वर्तमान जन्म तथा परजन्मों में लाभ होगा।

हमारे ऋषि-मुनि-मनीषी तथा योगी इस सिद्धान्त व नियम को भली प्रकार से समझते थे। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर इन सिद्धान्तों व नियमों को सरलता से समझा जा सकता है।

हम अपने ज्ञान व अनुभव से कहना चाहते हैं कि सत्यार्थप्रकाश के प्रथम दस समुल्लासों में जो नियम व सिद्धान्त वर्णित हैं वह समस्त मानवजाति के लिए हितकर व कल्याणकारी हैं।

इनसे मनुष्य के सौभाग्य में वृद्धि होगी। सभी मनुष्यों व प्राणियों को इससे लाभ होगा।

हम अभय से युक्त लम्बी आयु जी सकते हैं। वेदों में तो यहां तक प्रार्थना की गई हैं कि सभी दिशाओं के सभी प्राणी हमारे मित्र बन जायें।

कहीं पर हमारा कोई शत्रु व विरोधी न हो। वेद सारे संसार को ईश्वर की सन्तान मानता है।

वेद धर्मान्तरण का समर्थन न कर पूरे विश्व को गुण, कर्म व स्वभाव में श्रेष्ठ मनुष्य अर्थात् ‘‘आर्य” बनाने की प्रेरणा करते हैं।

यह बात विद्वानों व निष्पक्ष मनुष्यों की समझ में आसानी से आ जाती है परन्तु संसार को केवल अपनी विचारधारा का अनुगामी बनाने वाले कुछ लोग इसके सही अर्थों को समझने की भी कोशिश न कर इसकी उपेक्षा करते हैं।

वह यह मानते हैं कि इस जन्म के बाद हमारा दूसरा जन्म व पुनर्जन्म नहीं होना है। यह उनका बहुत बड़ा अज्ञान व अविद्या है।

उनका पुनर्जन्म अवश्य होगा और उन्हें अपने किये हुए शुभ व अशुभ कर्म अवश्य ही भोगने होंगे। यदि ऐसा न हो तो ईश्वर न्यायकारी नहीं हो सकता।

ईश्वर न्यायकारी है और वह सभी लोगों को जब तक उनके कर्मों के फलों का भोग न करा दे, दण्ड व पुरस्कार देता रहेगा चाहे इस काम में उसे किसी जीव को हजारों जन्म देने पड़े।

उसके किये कर्मों के अनुसार उसे सजा व पुरस्कार अवश्य ही मिलेगा। यह बात यदि सभी मतों के अनुयायी समझ लें तो इससे उन्हें भी लाभ होगा और विश्व में शान्ति भी उत्पन्न हो सकती है।

ईश्वर इस संसार का राजा है। उसने हमें अपना सेवक, भक्त तथा अनुयायी बनने का अवसर दिया है।

हम सबका कर्तव्य है कि हम सब उसके सन्देशों का यथाशक्ति प्रचार करते रहे जिससे हमारा समाज, देश एवं विश्व श्रेष्ठ बन सके। हम समझते हैं कि हमने विषय व अपने विचारों को स्पष्ट कर दिया है।

ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य पताः 196 चुक्खूवाला-2 देहरादून-248001 फोनः 9412985121