उदयपुर। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली एवं राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जयपुर के तत्वावधान में शनिवार, 10 अक्टूबर को उदयपुर में राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया गया।
जिला एवं सेशन न्यायाधीश एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष ज्ञान प्रकाश गुप्ता के निर्देशानुसार आयोजित लोक अदालत में कुल 8,73,720 प्रकरणों का निस्तारण किया गया।
इनमें न्यायालयों, अधिकरणों एवं आयोगों में लंबित 13,838 प्रकरण तथा प्री-लिटिगेशन के 8,59,882 प्रकरण शामिल हैं। लोक अदालत में कुल 42 करोड़ 55 लाख रुपये के अवार्ड पारित किए गए।राष्ट्रीय लोक अदालत का विधिवत शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ।
इस अवसर पर पारिवारिक न्यायालय क्रम संख्या एक की न्यायाधीश रेखा चौधरी, एमएसीटी न्यायालय क्रम संख्या एक के न्यायाधीश गणपत लाल विश्नोई, एडीजे न्यायालय क्रम संख्या पांच के न्यायाधीश मुकेश चावला, एसीजेएम न्यायालय क्रम संख्या चार की न्यायाधीश मर्यादा शर्मा, एनआई एक्ट न्यायालय क्रम संख्या चार की न्यायिक मजिस्ट्रेट अक्षिता जैन तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट उत्तर क्रम संख्या एक के आलोक भारद्वाज सहित अन्य न्यायिक अधिकारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में बार एसोसिएशन के अधिवक्ता, बैंक एवं बीमा कंपनियों के अधिकारी और पक्षकार भी मौजूद रहे।जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव एवं अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश राहुल चौधरी ने बताया कि लोक अदालत में एनआई एक्ट न्यायालयों में 2,674 प्रकरणों का निस्तारण किया गया।
इनमें पक्षकारों के पक्ष में लगभग 25 करोड़ 4 लाख रुपये के अवार्ड पारित किए गए। वहीं पारिवारिक न्यायालयों में कुल 496 प्रकरणों का निस्तारण हुआ।
मोटर वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण में 200 प्रकरणों का निस्तारण करते हुए लगभग 9 करोड़ 87 लाख रुपये के अवार्ड पारित किए गए।तीन साल से लंबित सास-बहू के विवाद का समझौते से निस्तारणलोक अदालत में पारिवारिक विवादों के निस्तारण के दौरान मानवीय संवेदनाओं से जुड़े कई मामलों में भी सहमति बनी।
पारिवारिक न्यायालय क्रम संख्या एक की न्यायाधीश रेखा चौधरी की अदालत में तीन साल से लंबित सास-बहू के बीच बच्चों की कस्टडी का विवाद आपसी समझाइश से सुलझाया गया।
मामले में दादी के बेटे और बहू के पति की दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद दोनों बच्चे अपनी मां के पास रह रहे थे।
दादी ने बच्चों की कस्टडी के लिए गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट के तहत दावा प्रस्तुत किया था। प्री-काउंसलिंग के दौरान दोनों पक्षों को समझाया गया, जिसके बाद आपसी सहमति से विवाद का निस्तारण हुआ।
समझौते के तहत दादी को बच्चों से हर महीने दो बार तथा प्रमुख त्योहारों पर मिलने का अधिकार दिया गया। यह भी सहमति बनी कि बच्चों की मां भी उनके साथ जा सकेगी।
इस बेंच में सदस्य एवं काउंसलर नीता जैन भी शामिल रहीं।11 साल बाद फिर साथ रहने को तैयार हुए पति-पत्नीलोक अदालत में एक अन्य मामले में करीब 11 साल बाद पति-पत्नी के बीच समझौता हुआ और परिवार फिर से एक साथ रहने को तैयार हो गया।
मामले में पारिवारिक न्यायालय ने पति को पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण के लिए प्रतिमाह 13 हजार रुपये देने का आदेश दिया था, लेकिन पति ने राशि का भुगतान नहीं किया।
इस पर न्यायालय की ओर से कई बार वारंट जारी किए गए। स्थायी वारंट के जरिए पुलिस पति को न्यायालय में पेश कर लाई।लोक अदालत में न्यायाधीश रेखा चौधरी ने दोनों पक्षों को समझाइश दी।
इसके बाद पति-पत्नी साथ रहने के लिए राजी हो गए। पति ने पत्नी और बच्चे को साथ रखने तथा प्रतिमाह 5 हजार रुपये अतिरिक्त देने पर सहमति जताई।
वर्ष 2014 के बाद दोनों ने फिर से साथ रहने का निर्णय लिया।
इस समझौते से बच्चे को माता-पिता दोनों का स्नेह मिलने का रास्ता खुला।सड़क दुर्घटना के मामले में 85 लाख रुपये का समझौतामोटर दुर्घटना दावा अधिकरण क्रम संख्या एक में सड़क दुर्घटना से जुड़े एक मामले में 85 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति पर समझौता हुआ।
मामला 20 अप्रैल 2025 को हुई दुर्घटना से संबंधित था, जिसमें रेतड़ा निवासी प्रवीण कुमार की मोटरसाइकिल को महिंद्रा बोलेरो ने टक्कर मार दी थी। दुर्घटना में प्रवीण कुमार की मृत्यु हो गई थी।
इसके बाद उनकी पत्नी सुनीता ने न्यायालय में क्षतिपूर्ति का दावा प्रस्तुत किया। एमएसीटी न्यायालय क्रम संख्या एक के न्यायाधीश गणपत लाल विश्नोई ने दोनों पक्षों के बीच समझाइश कराई।
इसके बाद एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी ने लोक अदालत की भावना के अनुरूप 85 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति पर राजीनामा किया। मामले में प्रार्थी पक्ष की ओर से अधिवक्ता सुनील जैन तथा बीमा कंपनी की ओर से अधिवक्ता सुरेश चंद्र टीलावत ने पैरवी की।
कंपनी के रीजनल हेड राजीव चंडोक, एरिया क्लेम अधिकारी जगदीश प्रसाद और उप विधि प्रबंधक तरुण आहूजा ने भी समझौते में सहयोग किया।सचिव राहुल चौधरी ने बताया कि राष्ट्रीय लोक अदालत में प्रकरण का निस्तारण होने पर विवाद का अंतिम रूप से समाधान हो जाता है और लोक अदालत के निर्णय के विरुद्ध अपील का प्रावधान नहीं होता।
सिविल मामलों में पक्षकारों द्वारा जमा कराई गई कोर्ट फीस भी वापस कर दी जाती है।
आपसी सहमति से विवाद सुलझने के कारण पक्षकारों के बीच भाईचारे और सौहार्द की भावना बनी रहती है तथा उन्हें लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया से राहत मिलती है।राष्ट्रीय लोक अदालत के सफल आयोजन के लिए उदयपुर मुख्यालय एवं तहसीलों के न्यायालयों में कुल 17 बेंचों का गठन किया गया था।
आयोजन के दौरान अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड, बैंक ऑफ बड़ौदा, आईडीएफसी, एसबीआई कार्ड्स, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, केनरा बैंक, इंडियन बैंक, फिनोवा कैपिटल, आरजीबी, बजाज फाइनेंस, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, बीएसएस सोनाटा, आईसीआईसीआई बैंक, भारत संचार निगम लिमिटेड, एसएफएल, आईआईएफएल समस्ता फाइनेंस लिमिटेड तथा टीवीएस फाइनेंस लिमिटेड सहित विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
