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जनगणना के बाद परिसीमन: बनेगा भारतीय राजनीति का नया समीकरण

मुख्य बिंदु
  • गोपेन्द्र नाथ भट्ट भारत में जनगणना केवल जनसंख्या की गिनती नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन, नीति-निर्माण और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की आधारशिला है।
  • आगामी जनगणना के साथ ही देश में लंबे समय से प्रतीक्षित परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
  • यह प्रक्रिया आने वाले वर्षों में भारत की चुनावी संरचना और सत्ता संतुलन को गहराई से प्रभावित कर सकती है।
  • भारत में जनगणना का कार्य भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के अधीन होता है।
  • हर दस वर्ष में होने वाली यह प्रक्रिया देश की सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर प्रस्तुत करती है।
  • हालांकि 2021 की जनगणना कोविड-19 के कारण स्थगित हो गई थी, अब इसके शीघ्र संपन्न होने की उम्मीद है।
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गोपेन्द्र नाथ भट्ट भारत में जनगणना केवल जनसंख्या की गिनती नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन, नीति-निर्माण और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की आधारशिला है। आगामी जनगणना के साथ ही देश में लंबे समय से प्रतीक्षित परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। यह प्रक्रिया आने वाले वर्षों में भारत की चुनावी संरचना और सत्ता संतुलन को गहराई से प्रभावित कर सकती है।

भारत में जनगणना का कार्य भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के अधीन होता है। हर दस वर्ष में होने वाली यह प्रक्रिया देश की सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर प्रस्तुत करती है।

हालांकि 2021 की जनगणना कोविड-19 के कारण स्थगित हो गई थी, अब इसके शीघ्र संपन्न होने की उम्मीद है। इसके पूरा होते ही परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त होगा।

परिसीमन का अर्थ है लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण, ताकि प्रत्येक क्षेत्र में जनसंख्या के अनुसार समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।

भारत में परिसीमन का कार्य परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है, जिसकी सिफारिशें बाध्यकारी होती हैं।

वर्तमान में देश में परिसीमन 1971 की जनगणना के आधार पर तय सीमाओं पर काफी हद तक टिका हुआ है, क्योंकि 1976 में जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के लिए परिसीमन पर रोक लगा दी गई थी, जिसे बाद में 2026 तक बढ़ा दिया गया।

अब जब यह समय सीमा समाप्ति की ओर है, तो 50 वर्षों के बाद नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन अनिवार्य हो जाएगा। इसका सीधा प्रभाव संसद और विधानसभाओं में सीटों के पुनर्वितरण पर पड़ेगा।

विशेष रूप से उन राज्यों में जहां जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि प्रदेशों में। इन राज्यों की विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना है।

वहीं दक्षिण भारत के कई राज्यों, जहां जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित रही है, वहां सीटों के अनुपात में कमी का खतरा भी जताया जा रहा है। यही कारण है कि परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के बावजूद उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो सकती है, जबकि उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है।

इससे केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन में बदलाव आ सकता है।

दूसरी ओर, परिसीमन के समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में *एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य* का सिद्धांत सर्वोपरि होना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र की जनसंख्या अधिक है, तो वहां प्रतिनिधित्व भी उसी अनुपात में होना चाहिए। इस दृष्टिकोण से परिसीमन लोकतांत्रिक न्याय की दिशा में एक आवश्यक कदम है।

जनगणना के आंकड़े केवल चुनावी सीमाओं के निर्धारण तक सीमित नहीं होते। ये आंकड़े सरकारी योजनाओं, बजट आवंटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार नीतियों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सटीक और पारदर्शी जनगणना देश के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है।

आधुनिक तकनीक के उपयोग से इस बार की जनगणना को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने की योजना है। डिजिटल डेटा संग्रह, मोबाइल ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से आंकड़ों की शुद्धता और गति में सुधार की उम्मीद की जा रही है।

कुल मिलाकर, आगामी जनगणना और उसके बाद होने वाला परिसीमन भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में एक बड़ा परिवर्तन लेकर आ सकता है। यह न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व को पुनर्परिभाषित करेगा, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन, विकास की प्राथमिकताओं और संघीय ढांचे पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।

ऐसे में आवश्यक है कि इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शिता, सहमति और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाया जाए, ताकि लोकतंत्र की मूल भावना अक्षुण्ण बनी रहे।