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तुम कमज़ोर नहीं हो

डॉ. सुशील कुसुमाकर

मुख्य बिंदु
  • तुम कमज़ोर नहीं हो तुम सीधी-सादी हो, ख़ूबसूरत, सहज-सरल हो अकेली हो दुनिया में मगर तुम कमज़ोर नहीं हो।
  • तुम घिरी हो परेशानियों से अकेलेपन से, तुम सहती हो अपनों की बेरुख़ी, सुनती हो ताने ज़माने भर के मगर तुम विचलित नहीं हो।
  • तुम हर पल कोशिश करती हो बिना थके, बिना रुके निरन्तर आगे बढ़ने की मंज़िल की ओर...।
  • मैं ख़ामोश रहता हूं मैं जानता हूं हक़ीक़त तुम्हारी मगर मैं ख़ामोश रहता हूं।
  • मैं जानता हूं ज़हनियत, फ़ितरत नीयत तुम्हारी मगर मैं ख़ामोश रहता हूं।
  • मैं जानता हूं दुखती रग़, कमज़ोरियां चालाकियां तुम्हारी मगर मैं ख़ामोश रहता हूं।
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तुम कमज़ोर नहीं हो

तुम कमज़ोर नहीं हो तुम सीधी-सादी हो, ख़ूबसूरत, सहज-सरल हो अकेली हो दुनिया में मगर तुम कमज़ोर नहीं हो।

तुम घिरी हो परेशानियों से अकेलेपन से, तुम सहती हो अपनों की बेरुख़ी, सुनती हो ताने ज़माने भर के मगर तुम विचलित नहीं हो।

तुम हर पल कोशिश करती हो बिना थके, बिना रुके निरन्तर आगे बढ़ने की मंज़िल की ओर...।

मैं ख़ामोश रहता हूं मैं जानता हूं हक़ीक़त तुम्हारी मगर मैं ख़ामोश रहता हूं।

मैं जानता हूं ज़हनियत, फ़ितरत नीयत तुम्हारी मगर मैं ख़ामोश रहता हूं।

मैं जानता हूं दुखती रग़, कमज़ोरियां चालाकियां तुम्हारी मगर मैं ख़ामोश रहता हूं।

मैं जानता हूं तुम बेचैन हो, परेशान हो उलझन में हो मेरी ख़ामोशियों से इसीलिये मैं ख़ामोश रहता हूं।