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Literature News

स्वतंत्रता, समानता,धैर्य, कर्म, संतुलन का संदेश है - उन्मुक्त गगन उड़ती पतंग.........

मुख्य बिंदु
  • वैदेही गौतम, कोटा प्रकाशक : काव्यांजलि, कोटा डोरी, पतंग, चरखी सब लिए बैठा हूं, इंतजार है उस हवा का, जो तेरी छत की ओर चले।
  • एक ही समानता है पतंग और ज़िंदगी में, ऊंचाई में हो, तब तक ही वाह-वाह होती है।
  • उन्मुक्त गगन उड़ती पतंग शीर्षक के संदर्भ में उक्त दोहे प्रेम और समानता का संदेश देते हैं।
  • पतंग प्रतीक है प्रेम की भावनाओं का और उस समानता का कि उगते सूरज को सब प्रणाम करते हैं।
  • इसी विचारधारा के साथ उपलब्ध प्रमाणों से पता चलता है कि विश्व में पतंग उड़ाने का इतिहास लगभग 2500-2800 साल पुराना है, जिसकी शुरुआत चीन में हुई थी।
  • यह मूल रूप से सैन्य संकेतों, दूरी मापने और मौसम के अध्ययन के लिए प्रयोग की जाती थी।
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स्वतंत्रता, समानता,धैर्य, कर्म, संतुलन का संदेश है - उन्मुक्त गगन उड़ती पतंग.........

संपादन : डॉ. वैदेही गौतम, कोटा प्रकाशक : काव्यांजलि, कोटा डोरी, पतंग, चरखी सब लिए बैठा हूं, इंतजार है उस हवा का, जो तेरी छत की ओर चले।

एक ही समानता है पतंग और ज़िंदगी में, ऊंचाई में हो, तब तक ही वाह-वाह होती है।

उन्मुक्त गगन उड़ती पतंग शीर्षक के संदर्भ में उक्त दोहे प्रेम और समानता का संदेश देते हैं। पतंग प्रतीक है प्रेम की भावनाओं का और उस समानता का कि उगते सूरज को सब प्रणाम करते हैं।

इसी विचारधारा के साथ उपलब्ध प्रमाणों से पता चलता है कि विश्व में पतंग उड़ाने का इतिहास लगभग 2500-2800 साल पुराना है, जिसकी शुरुआत चीन में हुई थी।

यह मूल रूप से सैन्य संकेतों, दूरी मापने और मौसम के अध्ययन के लिए प्रयोग की जाती थी। सबसे पहले चीन में पतंग का आविष्कार ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी के चीनी दार्शनिक मोजी और लू बान ने किया था, जो लकड़ी की पतंगें उड़ाते थे।

हान राजवंश में कागज के आविष्कार के साथ, कागज से बनी पतंगें लोकप्रिय हो गईं । पतंग उड़ाने की प्रथा अंततः व्यापारियों द्वारा 13 वीं शताब्दी में चीन से कोरिया और एशिया भर में भारत तक फैली।

प्रत्येक क्षेत्र ने पतंग उड़ाने की एक विशिष्ट शैली और उन्हें उड़ाने का एक सांस्कृतिक उद्देश्य विकसित किया गया।

भारत के साथ -साथ चीन, जापान, थाईलैंड, अमेरिका, ब्राजील, कोलंबिया, चिली, मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और यूके देशों में पतंग एक लोकप्रिय खेल हैं।

भारत में मुख्य रूप से मकर संक्रांति पर और वसंत पंचमी तथा स्वतंत्रता दिवस जैसे त्योहारों पर पतंग उड़ाना खुशी और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक बन गई।

गुजरात के अहमदाबाद और राजस्थान के जयपुर में सबसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव दुनिया भर में लोकप्रिय हैं। इन महोत्सवों को पर्यटन से जोड़ देने से हजारों पर्यटक इनका आनंद लेते हैं।

कई देशों के पतंगबाज इनमें शामिल हो कर पतंग उड़ाने का हुनर दिखाते हैं। बरेली, दिल्ली, अमृतसर, प्रयागराज, हैदराबाद, कोटा में भी भव्य पतंगबाजी के आयोजन किए जाते हैं।

आसमान रंग-बिरंगी पतंगों और 'वो काटा, ये काटा' के शोर से गूंज उठता है। पतंग को ज्यादा से ज्यादा ऊंचाई तक उड़ाने और पतंग काटने की होड लगी रहती हैं।

इस दिन बच्चे तो खुशी से बल्लियों उछलते ही है बड़ों को भी अपना बचपना याद आ जाता है और वे भी बच्चों से कहां पीछे रहते हैं। सारा आसमान सतरंगी पतंगों से इंद्रधनुषी हो जाता है।

पतंग की इस भूमिका के साथ इस पुस्तक की उड़ती पतंग बाल कविताओं में छुपे संदेशों और भावनाओं को देखना बड़ा ही रोचक प्रतीत होता है।

बालिका अविका ने इन पंक्तियों में कितनी गहरी बात कही है कि हम सब तो ईश्वर की बनाई कठपुतली हैं डोर तो ईश्वर के हाथ में हैं।

उड़ रही पतंगे आसमान में है, डोर किसी के हाथ में है ।

सब को लक्ष्य पाने के लिए बाधाओं से डरे बिना हौसलो के साथ आगे बढ़ना है। हसन प्रीत का यही संदेश देती हैं ये पंक्तियां...... अपना लक्ष्य पाने को हवा को चीरकर हौसलो के साथ उडो लाख बाधारे आएं पर तुम न रुको चीर दो आसमान का सीना छूलो उचाईयों को सुमनलता शर्मा अपनी कविता में जीवन में हर समय धीरज और ध्यान रखने का सटीक संदेश देती हैं...... धीरज और ध्यान रखो तो, आँख मिलाती सूरज के संग।

ढील समय पर मिल जाए तो, कभी नहीं कटती है पतंग।

बालिका निधि वर्मा कविता में कहती हैं हर कम को पूरे जोश से करना चाहिए ,जिस प्रकार पतंग उड़ाने पर चाहे पापा की डांट हो या माझे से उंगली कटे पर पर जोश कम नहीं होता..... डाँटे पापा उड़ाएं पतंग मंजे से हाथ में चोट लगती फिर भी अंगुली नहीं थकती बडी डोर से रेस लगाएं निरल खंडेलवाल हमेशा ऊंचे सपने रखने और ऊंचाइयां छूने का लक्ष्य रखने का संदेश देते हुए कहती है..... पतंग सीखाती हमें यह बात हमेशा भरना ऊँची उड़ान इसी भावना को कृति गुप्ता यूं अभिव्यक्त करती है.... डोर थामी नन्हें हाथों में आँखो मे सपनो की उडान डॉ. सुशीला जोशी कविता से जीवन का उतार चढ़ाव और कर्म का महत्व बताते हुए कहती हैं.... इतने में दादा आकर बोले यूं ," पतंग से सीखो जीवन का उतार चढ़ाव तुम।

-- देखो ,हाथ हमारे कर्म कर रहे, पतंग हमारी उड़ रही।

सव्यसाची का संदेश है असफलता और सफलता जीवन का हिस्सा है जैसे पतंग गिर कर फिर उठती है, ऐसे ही जीवन में हार से ज घबराना कैसा, कोशिश जारी रहनी चाहिए..... . ​कभी गिरूँ, फिर उठ जाऊँ, यही पतंग सिखाए, हार नहीं होती जीवन में, कोशिश जीत दिलाए।

लोग पतंग से पेंच काटने के लिए कांच के हानिकारक मांझे को काम में लेते हैं, इससे सावधान रहने को डॉ. युगल सिंह लिखती हैं..... लिखा पतंग पर एक संदेशा, सादे मांझे से ही पतंग उड़ाना ।

शैलजा विजयवर्गीय जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश देती हैं, कहते हैं वीणा के तारों को इतना ढीला मत छोड़ो कि वे बज न सकें और इतना भी मत कसो कि वे टूट जाए.... ना ढील ना कसाव अनुशासन रख पतंग तुम उड़ाओ राजेंद्र कुमार जैन अपनी कविता में उड़ती पतंग से धैर्य, मन को बस में रखने, मेहनत करने, हिम्मत रखने का संदेश देते हैं.......... डोर सिखाए धैर्य रखना, मन को रखना थाम, मेहनत से ही मिलती ऊँचाई, यह इसका पैग़ाम।

उड़ती पतंग मुस्काकर कहती, सुन लो मेरी बात, हिम्मत, आशा, संतुलन से, बनता सुंदर साथ।

वसुश्रवा द्विवेदी उनको ललकारती हैं जो मोबाइल और लैपटॉप से चिपके रहते हैं........ मोबाइल छोडो़ मेरे भाई खुली हवा में सांस है आई कमरे में क्यूँ बंद हुए हो लेपटॉप के संग जुड़े हो आसमान को देखो भाई रंग बिरंगी पतंग है छाई एक नन्हे बच्चे गौरांग देवपुरा कितनी सुंदर भावना संजोई कि बिना पंख के जैसे चिड़िया उड़ती जाए....... चिड़िया जैसे उडे पतंग।

फर फर फर फर हवा के संग।

बिना पंख के उड़ती जाए।

हिल हिल करके नाच दिखाए। राम नाम की दिव्य पतंग में अंजीव अंजुम ने धर्म और अध्यात्म के रंगों से रंग कर, सांसों की डोर, दृढ़ निश्चय, इच्छाओं के तंग बांधने, कर्म और खुशी के कई संदेशों को कविता में पिरोया है । कुछ पंक्तियां दृष्टव्य हैं....... दृढ़ निश्चय की ठुमकी देकर , पुलकित है मेरा हर अंग।

मम्मी आज उड़ाई मैंने, राम नाम की दिव्य पतंग।।

ढील खींच के कर्म साध कर , मन में छाई भाव तरंग ।

मम्मी आज उड़ायी मैंने, राम नाम की दिव्य पतंग।।

संपादकीय में डॉ. वैदेही लिखती हैं समस्त रचनाकारों की कविताएं कोई न कोई संदेश दे कर प्रेरित करती हैं।

बाल कविताओं का यह संग्रह राजस्थान राज्य स्तरीय प्रतियोगिता का परिणाम है जिसे समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत, गांधीनगर की राजस्थान प्रभारी होने के नाते डॉ. वैदेही गौतम की पहल पर मकर संक्रांति 26 पर्व पर आयोजित किया गया।

उन्होंने संस्कृति,साहित्य,मीडिया फोरम कोटा को भी सहभागी बनाया। मुख्य तथ्य रहा 120 प्रतियोगियों में 60 बच्चों का भाग लेना।

यह संभव हुआ हाड़ोती में दो वर्षों से संचालित " मिशन बाल मन तक..." से, जिसमें बच्चों को कविता, कहानी ,निबंध आदि लिखने से जोड़ने का व्यापक अभियान चलाया गया।

इसका असर पूरे राजस्थान में हुआ और साहित्य की ओर बच्चों का रुझान बढ़ा है।

उड़ती पतंग बाल कविताओं के माध्यम से जीवन में विश्वास, स्वतंत्रता, समानता,धैर्य, कर्म, संतुलन,ऊंची उड़ान का लक्ष्य रखने के संदेश देती 51 बाल कविताओं का यह निकुंज संग्रह निसंदेह डॉ. वैदेही गौतम के खेल और संस्कृति के प्रति उनके रुझान के साथ - साथ उनके सकारात्मक चिंतन और दृष्टिकोण का एक अनुपम प्रयास है।

आशा करता हूं रचनाएं पाठकों को पसंद आएंगी और बेहतर सृजन के लिए प्रेरित करेंगी। अपनी ओर से संपादक के प्रयास को नमन कर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं।