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व्यवसायी व समाजसेवी गजेंद्र सिंह राठौर के नेत्रदान सम्पन्न।

ज्योतिमत्रों के माध्यम से बढ़ रहा संभाग में नेत्रदान का कार्य ।

मुख्य बिंदु
  • दादाबाड़ी कोटा निवासी व्यवसायी गजेंद्र सिंह राठौर ( गुंदालिया ) के आकस्मिक निधन की सूचना जैसे ही संस्था शाइन इंडिया फाउंडेशन के सक्रिय ज्योतिमित्र नरेश कपूर को मिली उन्होंने शोकाकुल परिवार से नेत्रदान के विषय पर बात रखी, उसके पश्चात उनकी पत्नी श्रीमती कान्ती राठौर व दोनों बेटे विनय और रोहित ने अपने पिता के नेत्रदान के लिए सहमति दी।
  • सहमति मिलके के बाद नरेश कपूर ने संस्था शाइन इंडिया के डॉ कुलवंत गौड़ को नेत्रदान संपन्न करवाने के सम्बन्ध में सूचित किया, उसके बाद EBSR कोटा चैप्टर के तकनीशियन के माध्यम से राठौर निवास पर ही समस्त परिजनों के बीच नेत्रदान की प्रक्रिया संपन्न हुई।
  • दिवंगत गजेंद्र सिंह जी केवल एक सफल व्यवसायी ही नहीं, बल्कि अत्यंत व्यवहारकुशल, मिलनसार और प्रेरणादायी व्यक्तित्व के धनी थे।
  • उनकी वाणी में अपनापन था, उनके व्यवहार में विनम्रता थी और उनके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था कि जो भी उनसे मिलता, उनका प्रशंसक बन जाता।
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व्यवसायी व समाजसेवी गजेंद्र सिंह राठौर के नेत्रदान सम्पन्न।

दादाबाड़ी कोटा निवासी व्यवसायी गजेंद्र सिंह राठौर ( गुंदालिया ) के आकस्मिक निधन की सूचना जैसे ही संस्था शाइन इंडिया फाउंडेशन के सक्रिय ज्योतिमित्र नरेश कपूर को मिली उन्होंने शोकाकुल परिवार से नेत्रदान के विषय पर बात रखी, उसके पश्चात उनकी पत्नी श्रीमती कान्ती राठौर व दोनों बेटे विनय और रोहित ने अपने पिता के नेत्रदान के लिए सहमति दी।

सहमति मिलके के बाद नरेश कपूर ने संस्था शाइन इंडिया के डॉ कुलवंत गौड़ को नेत्रदान संपन्न करवाने के सम्बन्ध में सूचित किया, उसके बाद EBSR कोटा चैप्टर के तकनीशियन के माध्यम से राठौर निवास पर ही समस्त परिजनों के बीच नेत्रदान की प्रक्रिया संपन्न हुई।

दिवंगत गजेंद्र सिंह जी केवल एक सफल व्यवसायी ही नहीं, बल्कि अत्यंत व्यवहारकुशल, मिलनसार और प्रेरणादायी व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी वाणी में अपनापन था, उनके व्यवहार में विनम्रता थी और उनके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था कि जो भी उनसे मिलता, उनका प्रशंसक बन जाता। लोगों की सहायता करना, रिश्तों को निभाना और हर परिस्थिति में सकारात्मक बने रहना उनके स्वभाव की विशेष पहचान थी।

और अंत समय में भी इस संसार से विदा होने के पश्चात भी वह अपने दोनों नेत्रों का दान कर गए, जिससे किसी असहाय के जीवन में रौशनी लौटेगी।