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राजस्थान में ग्रामीण लोकतंत्र की परीक्षा

एन जी भट्ट

मुख्य बिंदु
  • राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव के पहले चरण के साथ ही प्रदेश में ग्रामीण लोकतंत्र की बड़ी परीक्षा शुरू हो गई है।
  • गुरुवार, 22 अक्टूबर को प्रदेश के 16 जिलों की जिला परिषदों और 104 पंचायत समितियों के सदस्यों के चुनाव के लिए सुबह सात बजे से मतदान शुरू हुआ।
  • इस चरण में 85,07,306 मतदाता थे।
  • राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के पहले चरण में कुल 6,926 प्रत्याशियों का राजनीतिक भविष्य मतपेटियों के बजाय ईवीएम में दर्ज हो गया है।
  • यह चुनाव केवल जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों को चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की स्वीकार्यता, स्थानीय नेतृत्व की पकड़ और विकास के दावों की वास्तविकता परखने का अवसर भी है।
  • गांवों की सड़कें, पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, रोजगार, कृषि और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे मुद्दे मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं।
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राजस्थान में ग्रामीण लोकतंत्र की परीक्षा

राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव के पहले चरण के साथ ही प्रदेश में ग्रामीण लोकतंत्र की बड़ी परीक्षा शुरू हो गई है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर को प्रदेश के 16 जिलों की जिला परिषदों और 104 पंचायत समितियों के सदस्यों के चुनाव के लिए सुबह सात बजे से मतदान शुरू हुआ। इस चरण में 85,07,306 मतदाता थे।

राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के पहले चरण में कुल 6,926 प्रत्याशियों का राजनीतिक भविष्य मतपेटियों के बजाय ईवीएम में दर्ज हो गया है।

यह चुनाव केवल जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों को चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की स्वीकार्यता, स्थानीय नेतृत्व की पकड़ और विकास के दावों की वास्तविकता परखने का अवसर भी है। गांवों की सड़कें, पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, रोजगार, कृषि और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे मुद्दे मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं।

पहले चरण में अजमेर, अलवर, बाड़मेर, भीलवाड़ा, बीकानेर, डूंगरपुर, जयपुर, झालावाड़, जोधपुर, कोटा, नागौर, पाली, फलोदी, राजसमंद, सिरोही और उदयपुर जिले शामिल हैं।

इन जिलों में जिला परिषद की 293 सीटों के लिए 1,693 और पंचायत समिति की 1,788 सीटों के लिए 5,233 प्रत्याशी मैदान में हैं। दोनों स्तरों के लिए मतदाताओं को अलग-अलग मतदान किया है।

मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। हालांकि, आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भारत आदिवासी पार्टी (बाप) तथा कुछ इलाकों में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकते हैं।

सत्तारूढ़ दल के लिए यह चुनाव सरकार की नीतियों और ग्रामीण क्षेत्रों में उसके प्रभाव का आकलन करने का सुनहरा अवसर है, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल कथित स्थानीय समस्याओं के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहेंगे।

फिर भी पंचायत चुनावों के परिणामों को सीधे विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल कहा जा रहा है लेकिन कई जानकार इनके चुनाव परिणामों को 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए कोई संकेत मानना उचित नहीं मानते, क्योंकि स्थानीय समीकरण और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

फिर इन चुनावों में सत्ताधारी दल को ही अधिक फायदा मिलता आया है।

प्रदेश में पंचायतीराज संस्थाओं के आम चुनाव विभिन्न चरणों में कराए जा रहे हैं। दूसरे चरण में जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए 28 अक्टूबर तथा तीसरे चरण में 3 नवंबर को मतदान निर्धारित है।

पंच और सरपंच पदों के लिए पहले चरण का मतदान 24 अक्टूबर को होगा। शेष चरणों में भी इसी क्रम से ग्रामीण मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनेंगे।इन चुनावों की सफलता का वास्तविक पैमाना केवल मतदान प्रतिशत या किसी दल की जीत नहीं होना चाहिए।

निष्पक्ष मतदान, शांतिपूर्ण वातावरण, धनबल और बाहुबल पर नियंत्रण तथा प्रत्येक मतदाता की स्वतंत्र भागीदारी लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं। निर्वाचित प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी भी चुनाव जीतने के बाद शुरू होती है।

उन्हें दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर गांवों की समस्याओं का समाधान करना होगा और पंचायतों को जवाबदेह बनाना होगा।

अंततः ग्रामीण लोकतंत्र की मजबूती तभी सुनिश्चित होगी, जब मतदाता निर्भीक होकर अपने विवेक से प्रतिनिधि चुनें और चुने गए प्रतिनिधि जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरें।

राजस्थान के गांवों का यह चुनाव इसी कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती है।