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भक्तामर की साधना से आत्म-कल्याण संभवःडॉ. सुरेन्द्र मुनि

उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में देवेंद्र धाम स्थित महावीर समवशरण में धर्मसभा आयोजित हुई। पूज्य डॉ. सुरेन्द्र मुनि जी म.

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उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में देवेंद्र धाम स्थित महावीर समवशरण में धर्मसभा आयोजित हुई।

पूज्य डॉ. सुरेन्द्र मुनि जी म.सा. ने भक्तामर स्तोत्र के तीसरे श्लोक की भावपूर्ण व्याख्या करते हुए कहा कि भक्तामर की साधना एवं प्रभु की स्तुति आत्मा को निर्मल बनाने का मार्ग है।उन्होंने कहा कि आचार्य मानतुंग ने अपनी विनयशीलता प्रकट करते हुए स्वयं की तुलना उस बालक से की, जो जल में दिखाई देने वाले चंद्रमा के प्रतिबिंब को पकड़ने का प्रयास करता है।

चंद्रमा हाथ नहीं आता, लेकिन पानी का स्पर्श अवश्य हो जाता है।

उसी प्रकार प्रभु की महिमा असीम होने पर भी उनकी स्तुति का प्रयास आत्मा को पवित्र करता है।प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि जी म.सा. ने विनय धर्म की महत्ता बताते हुए कहा कि विनयशीलता आत्मा के उत्थान और कल्याण का आधार है।

अहंकार पतन का कारण बनता है, जबकि विनय व्यक्ति को सद्गुणों से जोड़ता है।श्रीसंघ अध्यक्ष एडवोकेट रोशनलाल जैन एवं महामंत्री हिम्मत बड़ाला ने बताया कि इस अवसर पर 8 उपवास के तपस्वी अनिल बया , नवकार तपस्या के तपस्वी विजेंद्र कोठारी तथा 15 उपवास की तपस्वी चंचल देवी बडाला का बहुमान किया गया।

हैदराबाद से आए समाजसेवियों का भी सम्मान हुआ। नासिक रोड महिला मंडल ने गीतिका प्रस्तुत की।

बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।