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बाजरे की रोटी से शाही पुलाव तक... सीपीएस में सजी भूले-बिसरे स्वादों की विरासत

कभी शाही शादियों की पहचान रहे पारंपरिक व्यंजनों ने फिर बिखेरी खुशबू, नई पीढ़ी ने जाना दादी-नानी की रसोई का स्वाद

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बाजरे की रोटी से शाही पुलाव तक... सीपीएस में सजी भूले-बिसरे स्वादों की विरासत
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उदयपुर। बदलते दौर में जहां आधुनिक व्यंजनों ने हमारी थाली में अपनी जगह बना ली है, वहीं कभी राजस्थान और मेवाड़ की रसोई की पहचान रहे कई पारंपरिक पकवान धीरे-धीरे हमारी स्मृतियों तक सीमित होते जा रहे हैं।

बाजरे की रोटी, काचरे की चटनी, राबड़ी, सरसों का साग और शाही पुलाव जैसे व्यंजन कभी शादियों और खास आयोजनों की शान हुआ करते थे।

इन्हीं भूले-बिसरे स्वादों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की अनूठी पहल सेंट्रल पब्लिक स्कूल में आयोजित खाद्य उत्सव में देखने को मिली।आयोजक शेफ विमल धर ने बताया कि सेंट्रल पब्लिक स्कूल, रॉयल राजस्थान शेफ्स सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस उत्सव की थीम ‘शेफ्स कॉन्ट्रैक्टःकहीं खो न जाए’ रही।

यह आयोजन श्रृंखला का नौवां संस्करण था। उत्सव का उद्देश्य केवल पारंपरिक व्यंजनों को प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी पाक-कला, संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी रहा।एक ही छत के नीचे राजस्थान, मेवाड़ और पंजाब के स्वादउत्सव में राजस्थान, मेवाड़ और पंजाब की पारंपरिक रसोई के विविध रंग देखने को मिले।

मक्की, ज्वार और बाजरे की रोटियों से लेकर राबड़ी, काचरे की चटनी, मिर्ची रकोटा, सत्तू टिकड़, शाही गोल पापड़ी, ढोकले, सिंधी कुट्टी, ताहिरी, चावल की रोटी, शाही पुलाव, पंजाबी छोले, सरसों का साग और चावल का जोल सहित अनेक पारंपरिक व्यंजन आकर्षण का केंद्र रहे।शेफ संगीता धर ने बताया कि खास बात यह रही कि बच्चों को इन व्यंजनों का स्वाद चखाने के साथ इन्हें तैयार करने की पारंपरिक विधि की जानकारी भी दी गई।

उन्हें बताया गया कि किस व्यंजन में कौन-सी सामग्री और मसाले कितनी मात्रा में डाले जाते हैं तथा पारंपरिक तरीके से पकाने की प्रक्रिया क्या होती है।60-70 साल पुराने स्वादों को फिर मिला मंचसीपीएस स्कूल की निदेशक अलका शर्मा ने कहा कि कभी पारंपरिक व्यंजन शादियों, विशेषकर शाही शादियों की पहचान हुआ करते थे।

इनके स्वाद के साथ इन्हें बनाने और परोसने की परंपरा भी बेहद समृद्ध थी।

समय के साथ खान-पान की पसंद बदली और नए व्यंजनों ने पुराने पकवानों की जगह ले ली।उन्होंने कहा कि आज बड़े होटल और रेस्टोरेंट में भोजन के अनेक विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन 60-70 वर्ष पुराने पारंपरिक व्यंजनों का वास्तविक स्वाद और उन्हें तैयार करने की विधि अब आसानी से देखने को नहीं मिलती।

ऐसे में इन स्वादों को सहेजना और बच्चों को इनसे परिचित कराना जरूरी है।पकवानों में दिखी दादी-नानी की रसोई की झलकखाद्य उत्सव बच्चों के लिए स्वाद के साथ यादों का भी सफर साबित हुआ।

कई बच्चों ने बताया कि उनके घरों में अब ये पारंपरिक व्यंजन नियमित रूप से नहीं बनते, लेकिन परिवार के बुजुर्ग दादी-नानी के समय बनाए जाने वाले इन पकवानों की बातें जरूर सुनाते हैं।उत्सव ने यह संदेश दिया कि समय के साथ भोजन के स्वाद बदल सकते हैं और नई डिशें थाली में शामिल होती रहेंगी, लेकिन अपनी मिट्टी की खुशबू, पारंपरिक पाक-कला और विरासत के स्वादों को सहेजना भी जरूरी है।

क्योंकि कुछ स्वाद केवल भोजन नहीं होते, वे पीढ़ियों की यादों और हमारी संस्कृति की पहचान होते हैं।