नवोदित लेखकों के लिए मार्गदर्शक हैं प्रीति की प्रीत मय कविताएं .... थोड़ी ज़मीं - थोड़ा आसमानरहने दो, मेरी पंखों में थोड़ी परवाज रहने दो ।
इस दुनिया में है हस्ती मेरी भी शामिल, मेरे नाम का एक मकान रहने दो।
डॉ. प्रीति शर्मा के काव्य संग्रह "थोड़ा जमी थोड़ा आसमान" की यह शीर्षक कविता एक नारी के मन की भावनाओं का दर्पण है, जिसमें उसके अस्तित्व और पहचान की आकांक्षा के भावों को शब्दों की मणिमाला में खूबसूरती के साथ गूंथा गया है।
नारी को उसकी पहचान मिले ,बस और क्या चाहिए..पृष्ठ 31 पर कविता को आगे बढ़ाते हुए लिखती हैं....... ज़िन्दगी की भीड़ में कुछ पल मेरे लिए / सपनों के चेहरों में कुछ रंग मेरे लिए / हर मोड़ पर क्यों कसौटी से गुजरना हो/मेरे दिल में थोड़ा विश्वास रहने दो।
नहीं माँगा तुमसे कोई ताज-ओ-तख्त/ माना दिल की धड़कन का सुकून भर वक्त / गुम न जाऊँ कहीं जहाँ के मेले में / मेरी पहचान का एक निशान रहने दो।
झालावाड़ की लेखिका डॉ. प्रीति शर्मा के काव्य संग्रह में ऐसी बेहतरीन समस्त 61 कविताएं उद्देश्यपूर्ण, भावपूर्ण, प्रभावी और समाज को जागरूक करने वाली हैं।
लगता है कविताओं के संदर्भ और प्रसंग हमारे परिवार, समाज और राष्ट्र के बीच के ही हैं।
इनमें माँ की ममता है, बेटियों से खुशहाली हैं, गुरुजनों का सम्मान है, नारी विमर्श है, राष्ट्रभक्ति है, संस्कारों की जड़े हैं, युवाओं का जोश है, ईश्वर आराधना है, राम के आदर्श हैं, देश का बहुरंगी रूप है, राजस्थान के वीरों की गाथा है, गांव की चौपाल है, शहरों की चकाचौंध है, असत्य पर सत्य की जीत है, प्रकृति का सौंदर्य है, जीवन का फलसफा है , धर्म, अध्यात्म और विश्वबन्धुत्व की भावनाएं हैं।
जीवन में गहराता अकेलापन, साथ रह कर दूर हो रहे है लोग, इस टूटन को कविता में उभरा है। कल्याणी, टूटती लड़की , स्त्रियां स्वयं एसी ही कविताएं है।
कविताओं का वैविध्य लेखिका के भावों, चिंतन और सृजन की गहरी बानगी हैं। भाषा सहज प्रवाहमान है।
उपमा और अलंकार स्वस्फूर्त हैं। संवेदनाओं को सशक्त रूप से अभिव्यक्ति दी गई है।
ऐसी कविताएं बहुत कम देखने में आती हैं। नवोदित रचनाकारों के लिए ये कविताएं किसी मार्गदर्शक से कम नहीं हैं।
कविता "गौरैया" में इस चिड़िया की तुलना से बेहद प्रभावी अंदाज में एक बेटी से की गई है। गौरैया के आने से जैसे आंगन चहक उठता है वैसे ही जब बेटी पीहर आती है तो धर - आंगन खुशियों के रंग से फूलों सा खिल उठता है।
यहां गौरैया की उपमा बेटी से करते हुए लेखिका लिखती हैं..पृष्ठ 39....... आँगन में चहचहाती गौरैया / बिल्कुल बेटी सी लगती है / मानों नन्हें पंखों में उजास भर हर सुबह / घर की देहरी पर मुस्कान बिखेर जाती हों/ चहचहाता रहता है उनकी चिहुंक से/ घर आँगन/ उनकी चहचहाट कभी चूड़ी की खनक / तो कभी पायल की झनक सी लगती है/ कभी लगता है कोई नन्हीं कली अपने/ कोमल स्वर से हवा में रंग घोल रही हो/ ये गौरैया जो बेटियों सी लगती हैं./ वे बेटियाँ जिनकी झलक भर से, भर उठता है मन प्रसन्नता से / जिनके कदम पड़ते ही सूना आँगन / फूलों की महक से भर उठता था/ लौट-लौट कर आँगन में आतीं/ कभी पेड़ की डाल पर चढ़ती तो कभी झूले की पींगें बढ़ाती/वे गौरैया-सी बेटियाँ / उनके आने से घर के कोने-कोने में ।
संग्रह के अंतिम कविता "जीवन सफर" बहुत ही मार्मिक, स्वाभाविक और भावपूर्ण है। जिसमें बचपन से लेकर शुरू हुए सफर का सुंदर शब्दचित्र खींचा गया है।
पृष्ठ 121...... एक सफर का प्रारम्भ/ जहाँ से जीवन ने पहली बार/ अपनी धड़कनों की राहों पर क़दम रखे थे / जहाँ बचपन की मिट्टी ने पहली बार पाँव चूमे थे / फिर न जाने कितनी ही गलियों से, गुजरता गया यह सफर../ कुछ चौड़े होते रास्ते तो कुछ अनजाने से मोड़/ कुछ बेगाने हुए अपने/ तो कुछ अपने हुए गैर / हर जगह मन ने बुन लिया था जाला जुड़ावों का / उन गलियों, रास्तों को पार करता/ मन भले निकल आया दूर पर मन तो अब भी भटकता है / उन ही गलियों में / उस आँगन में / उस छत पर/ उस नीम की डालियों पर / जहाँ कभी चढ़ते थे ख्वाब और फलती थी उम्मीदें....।
कविता "वृद्ध होता घर" आज के सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था का जीवंत चित्रण करती है। एक समय होता है जब सारे सदस्यों से घर हराभरा, चकता, महकता रहता है।
समय के साथ साथ - साथ घर के सदस्य अलग - थलग हो जाते हैं, घर में केवल और केवल वृद्ध रह जाते हैं और जब वह भी चले जाते हैं तो घर भी वृद्ध लगने लगता है।
इस संदर्भ और परिवेश का कड़वा सच्च ही कविता के शब्दों में बोलता दिखाई देता हैं..पृष्ठ 50... असमय मुखिया का जाना/ छीन ले गया उसकी खुशियाँ / भरा-पूरा वह/ घर बिखर गया/ अब, न अब शोर था वहाँ न उसकी परवाह / निकल चुके थे सब अपनी मंजिलों की तलाश में परदेश / उन परदेशियों की बाट जोहता वह वृद्ध होता घर.../ उदास था अपने मुखिया के जाने पर/ जर्जर हो चला था उसका अस्तित्व / जहाँ कभी रौनकें हुआ करती थी / आज पसरी है सिर्फ खामोशी, / पूनम के चाँद-सा चमकता वह घर / जी रहा अमावस की काली रातें /और गिन रहा है अपनी अंतिम साँसें/ अब वृद्ध होता वह घर........।
परिवार, समाज और राष्ट्र है तो देशभक्ति का जज्बा भी होना स्वाभाविक है । " वीरों की गाथाएं " रचना में कई वीरों और देशभक्तों के त्याग और बलिदान की गाथाओं को सुनाते हुए कितने संवेदनशील रूप से देश भक्ति का यह संदेश दिया है पृष्ठ 31.......... वीरों की गाथाएँ कह यहाँ माताएँ दूध पिलाती हैं / अपने नन्हें लालों के लहू में देश प्रेम जगाती है / रण बांकुरा बन जाता है बच्चा-बच्चा देश का / शीश कटा जाता है अपना जब भी देश पुकारता ।
राम नामक कविता में राम के आदर्शों को सुंदरता से शब्दों में सजाया है , पृष्ठ 30..... पुत्र, पति और भाई की, परिभाषा लिख दी राम ने / त्याग, तपस्या, प्रेम की अभिलाषा दे दी राम ने / राम नही हैं राजमहल में, है शबरी के बेरों में / राम रहे है सबके मन में, नहीं हैं वे पाषाणों में/ राम सिया और लक्ष्मण संग, जीने का अभिमान है /राम सकल भारत भूमि का, करते रहे उत्थान है।
भारत देश का गुणगान करती कविता सारे जग से निराला अच्छी बन पड़ी है पृष्ठ 38....….. दसों दिशाएँ भारत माँ के, सदा गुणगान सुनाती हैं / रामायण से जिस देश की, सदा चलती परिपाटी है / सत्य-अहिंसा से संस्कृति, नित नित शोभा पाती है / राम-कृष्ण की धरती की, देखो छटा बड़ी निराली है ।
/ हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, प्राणतत्व इस देश के / उत्तर और दक्षिण वाले हैं पहचान हमारे देश के /सभ्यता और संस्कृति यहाँ की भारी है यह स्वर्ग पे, देवों के मुख भी गाते हैं, गुणगान सदा मेरे देश के ।
सरस्वती सभा राज. साहित्य अकादमी, उदयपुर के पूर्व सदस्य डॉ. गोपीनाथ चर्चित अपने अभिमत में लिखते हैं इस काव्य यात्रा में रचनाकार ने वन्दना के पश्चात 'माँ-बापूजी' का स्मरण करते हुए उन्हें फूली-फूली रोटी सी माँ / मीठा दही है बापूजी' बताते हुए उनसे हृदय के मधुर सम्बन्धों को व्यक्त किया है।
समाज जीवन में पड़ रही' 'दीवार' रचनाकार को उद्वेलित कर संस्कारों की विदाई और नई संस्कृति के नाम पर फल रही बोनसाई संस्कृति झकझोर देती है और वह कह उठती है कि 'नेह भरे आँगन में जब भी दौलत की दीवार बनती है / बिखर गए सब रिश्ते नाते मन में गाँठ पड़ती है' और उसी की विद्रूपता दिखाई देती है ।
कुल मिलाकर कहें तो इस संग्रह की कविताओं को डॉ. प्रीति ने बड़े प्रीत से संजोया है तभी तो बन पड़ी हैं ये प्रीति पूर्ण कविताएँ। " दिल्ली एन.सी.आर.की लेखिका और उपन्यासकार विनय पंवार अपने अभिमत में लिखती हैं," लगता है कि प्रीति ने कविता नहीं लिखी।
सामने एक आईना रख दिया है। नानी का दुलार है, बेटी की विदाई है, 'बेचारी' की सिसकन है और 'बेहया' का गरजन।
प्रत्येक स्त्री इस संग्रह में आए भावों से कभी न कभी रूबरू होती है। अब तो मैं भी यही कहूँगी कि स्त्री स्वयं एक सम्पूर्ण कविता होती है और प्रीति ने उस कविता को अपने शब्द भी दिए और आवाज़ भी दी है।
यह संग्रह कवयित्री के जागृत चेतना होने का प्रमाण है। समाज में स्त्री के प्रति हर भाव पर पकड़ उनकी संजीदगी दर्शाने को काफी है।"
अंधेरी पश्चिम , मुंबई की लेखिका, निर्माता, निर्देशिका लोखंडवाला सीमा कपूर अपने अभिमत में लिखती हैं", प्रीति ने अपनी कविताओं में तुम्हारे शहर को अलविदा कहें तो..., यातना शहर, धरती, अपनी बेटी और न जाने कितने विषयों को शब्दों में ढाला है।
अपनी कविताओं में विस्तृत और विराट ज्ञान, जानकारी और उनके प्रति गहरा जुड़ाव यह दर्शाता है कि कवियत्री ने केवल लेखनी और शब्दों के मायाजाल में ही पाठकों को नहीं उलझाया, बल्कि एक सुंदर मानवीय हृदय भी पाया है, जो हर किसी के लिए धड़कता है।
उनके दुःख को, दर्द को समझता है। प्रीति की कविताएँ जहाँ हमें ज़मीन और प्रकृति से रूबरू कराती हैं, वहीं मन में प्रश्न भी खड़े करती हैं- नारी के प्रति समाज के नज़रिए को लेकर।
यानी कुल मिलाकर इन कविताओं में सुगंध है, हँसी है, गुदगुदाहट है. भोर का नरम-मुलायम स्पर्श है, तो कहीं तीखी धूप की तरह कुल्हाड़ी-सा प्रहार भी है।"
कोटा के साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही अपने अभिमत में लिखते हैं, " डॉ. प्रीति शर्मा का समकालीन चिंतन पक्ष प्रबल है। जब भी कोई कवयित्री अपने चिंतन पक्ष को सामने लाती है तो बहुत सुखद महसूस होता है। संकलन में काव्य विविधता को देखा जा सकता है।
लेखिका मेरी अनुभूतियों की यात्रा में लिखती है, " मेरे लिए कविता कभी प्रदर्शन का माध्यम नहीं रही। यह मेरे मन का संवाद है, स्वयं से भी और समाज से भी।
इस संग्रह की रचनाएँ अलग-अलग समय पर लिखी गईं किंतु उन्हें जोड़ने वाला सूत्र एक ही है और वह है संवेदना।
कभी किसी घटना ने मन को विचलित किया, कभी किसी स्मृति ने भीतर तक भिगो दिया, कभी समाज की विसंगतियों ने प्रश्न खड़े किए और कभी छोटे से भाव-दृश्य ने कविता का रूप ले लिया।
लेखन मेरे लिए साधना की तरह रहा है। धीरे-धीरे भीतर को समझने और अभी व्यक्त करने की प्रक्रिया।
किसी भी रचना की वास्तविक पूर्णता तब होती है जब वह पाठकों के मन तक पहुँचती है। यदि मेरी कविताओं में पाठकों को अपने जीवन की झलक दिखाई दे तो मैं अपने लेखन को सार्थक समझूंगी।" आवरण पृष्ठ अच्छा बना है। पुस्तक माता - पिता को समर्पित की है। यह पुस्तक राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुई है।
पुस्तक : थोड़ी ज़मीं - थोड़ा आसमान विधा : कविता रचनाकार : डॉ. प्रीति शर्मा, झालावाड़ प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर मूल्य : 250 रुपए उपलब्ध अमेजन.इन / फ्लिपकार्ट. कॉम ISBN : 978- 93- 5947: 054 - 2 रचनाकार परिचय : ----------------------- झालावाड़ निवासी डॉ. प्रीति शर्मा मूल रूप से ब्रजभूमि के राजस्थान स्थित डीग जिले के कामवन की रहनेवाली है ।
आरंभ से ही इतिहास, संस्कृति और साहित्य की विधाओं को समर्पित रही है। इतिहास विषय में स्नातकोत्तर , बी.एड. एम.फिल. इतिहास में विश्वविद्यालय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त कर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है।
आपके अब तक दो दर्जन से अधिक शोध लेख, आलेख एवं साहित्यिक रचनाएँ राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आकाशवाणी के झालावाड़ केंद्र से अनेक वार्ताएँ प्रसारित हो चुकी हैं।
आपकी प्रकाशित पुस्तकें 'सप्तम पीठ प्रभु श्री मदन मोहन जी (इतिहास एवं संस्कृति) एवं रोशनी के दीप (कविता संग्रह)' तथा 'जैन मंदिरों का सांस्कृतिक महत्व एवं पर्यटन विकास' हैं।
इन्हें साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा जी द्वारा 'हिंदी साहित्य मनीषी' की मानक उपाधि से विभूषित किया गया है। सामर्थ्य सेवा संस्थान द्वारा 'ग्लोबल एक्सीलेंस अवॉर्ड' से सम्मानित है।
वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स लंदन एवं गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स स्थापना प्रमाण-पत्र से सम्मानित हो चुकी हैं।
'हाड़ौती गौरव सम्मान', बृजवाणी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान कामवन द्वारा 'कामवन को स्वर्णिम सिक्का' की उपाधि तथा जिला प्रशासन झालावाड़ द्वारा स्वतंत्रता दिवस 2024 के अवसर पर सम्मानित किया जा चुका है।
संपर्क : 82792 58635
