जब गलत को सही मान लिया जाए अधर्म केवल पूजा-पाठ से विमुख होना या धार्मिक परंपराओं का पालन न करना नहीं है।
अधर्म वह मानसिकता है, जिसमें मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए सत्य का गला घोंटता है, अन्याय को सहमति देता है, दूसरों के अधिकारों का हनन करता है और अपनी शक्ति, संपत्ति अथवा पद के अहंकार में मानवीय मूल्यों को भुला देता है।
जब असत्य को चतुराई, भ्रष्टाचार को व्यवहारकुशलता, शोषण को अधिकार और अन्याय के सामने मौन रहने को समझदारी समझा जाने लगे, तब अधर्म केवल व्यक्ति का दोष नहीं रहता, बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए गंभीर संकट बन जाता है।
आज के युग में अधर्म की चुनौती इसलिए भी जटिल है कि वह सदैव बुराई का चेहरा लगाकर सामने नहीं आता। कई बार वह धर्म, न्याय, परंपरा, प्रतिष्ठा और जनहित का मुखौटा पहनकर समाज को भ्रमित करता है। ऐसे समय में यह विचार करना आवश्यक है कि अधर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है, उसके विस्तार के कारण क्या हैं और उससे मुक्ति का मार्ग कहाँ से आरंभ होता है।
धर्म और अधर्म का वास्तविक अर्थ भारतीय चिंतन परंपरा में धर्म का अर्थ केवल किसी संप्रदाय, पूजा-पद्धति अथवा धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। धर्म का व्यापक अर्थ है—कर्तव्य, सत्य, न्याय, करुणा, सदाचार, लोककल्याण और मानव गरिमा की रक्षा। जो आचरण मनुष्य को मनुष्यता के निकट ले जाए, जो समाज में न्याय और विश्वास स्थापित करे तथा जो दुर्बल को संरक्षण और पीड़ित को सम्मान दिलाए, वही धर्म का सार है।
इसके विपरीत, जो आचरण दूसरों के अधिकार छीनता है, विवेक को स्वार्थ के अधीन करता है और अन्याय को बढ़ावा देता है, वह अधर्म है। कोई व्यक्ति धार्मिक वेशभूषा धारण करके भी अधर्मी आचरण कर सकता है, जबकि कोई व्यक्ति बिना किसी धार्मिक प्रदर्शन के अपने सत्यनिष्ठ कर्म, ईमानदारी और परोपकार से धर्म का वास्तविक स्वरूप प्रस्तुत कर सकता है।
इसलिए धर्म की पहचान बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि आचरण की पवित्रता से होनी चाहिए।
महाभारत का संदेश : मौन भी बन सकता है अधर्म का सहयोगी भारतीय महाकाव्य महाभारत अधर्म के उदय और उसके परिणामों का गहन उदाहरण प्रस्तुत करता है।
द्रौपदी के अपमान का प्रसंग केवल एक स्त्री के अपमान की कथा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का दर्पण है जिसमें सत्ता, स्वार्थ और व्यक्तिगत निष्ठाएँ न्याय से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।
सभा में उपस्थित अनेक सामर्थ्यवान व्यक्तियों की निष्क्रियता यह प्रश्न उठाती है कि क्या अन्याय करने वाला ही अपराधी है, या अन्याय होते देखकर सामर्थ्य के बावजूद मौन रहने वाला भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बच सकता है?
अधर्म को शक्ति केवल उसके समर्थकों से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी मिलती है जो सत्य जानते हुए भी भय, लालच, संबंधों या स्वार्थ के कारण उसका प्रतिरोध नहीं करते। जब विवेक मौन हो जाता है और अंतरात्मा सुविधा के सामने झुक जाती है, तब अन्याय को फलने-फूलने के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाता है।
इसीलिए अधर्म के विरुद्ध संघर्ष केवल अपराधियों को दंडित करने का प्रश्न नहीं है; यह समाज में नैतिक साहस विकसित करने का भी प्रश्न है।
आधुनिक समाज में अधर्म के बदलते रूप आज अधर्म अनेक रूपों में हमारे सामने उपस्थित है। भ्रष्टाचार सार्वजनिक संसाधनों को निजी लाभ का साधन बना देता है। आर्थिक शोषण मेहनतकश व्यक्ति की गरिमा को चोट पहुँचाता है। महिलाओं के प्रति हिंसा, जातिगत भेदभाव, कमजोर वर्गों के अधिकारों की उपेक्षा और बच्चों के साथ अन्याय हमारी सामाजिक संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में जब ज्ञान और चरित्र निर्माण की अपेक्षा केवल अंक, प्रदर्शन तथा लाभ को प्राथमिकता मिलने लगे, तब शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है। राजनीति में जब जनसेवा के स्थान पर व्यक्तिगत स्वार्थ हावी हो जाए, व्यापार में लाभ के लिए उपभोक्ता के विश्वास से खिलवाड़ किया जाए और सार्वजनिक जीवन में पद का उपयोग जनकल्याण के बजाय निजी हितों के लिए होने लगे, तब अधर्म संस्थागत रूप धारण करने लगता है।
डिजिटल युग ने भी इस चुनौती को नया आयाम दिया है। झूठी खबरें, भ्रामक प्रचार, चरित्रहनन, घृणा फैलाने वाली सामग्री और बिना सत्यापन के सूचनाओं का प्रसार समाज में अविश्वास पैदा करते हैं। तकनीक स्वयं न धर्म है, न अधर्म; उसका नैतिक मूल्य इस बात से निर्धारित होता है कि मनुष्य उसका उपयोग ज्ञान और कल्याण के लिए करता है अथवा भ्रम, हिंसा और स्वार्थ के लिए।
अधर्म के विस्तार के मूल कारण अधर्म का विस्तार अचानक नहीं होता। उसके पीछे अनेक व्यक्तिगत, सामाजिक और संस्थागत कारण होते हैं। अनियंत्रित लालच मनुष्य को उचित-अनुचित का अंतर भुला देता है। अहंकार उसे अपनी भूल स्वीकार करने से रोकता है। भय उसे अन्याय के विरुद्ध बोलने से वंचित करता है। सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक लाभ की अंधी दौड़ नैतिक मूल्यों को पीछे धकेल देती है।
जब परिवार में बच्चों को ईमानदारी का उपदेश तो दिया जाता है, लेकिन व्यवहार में अनुचित लाभ उठाने को प्रोत्साहित किया जाता है, तब कथनी और करनी का अंतर उनके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। जब संस्थाएँ नियमों के बजाय प्रभावशाली व्यक्तियों की इच्छा से संचालित होती हैं, तब न्याय के प्रति विश्वास कमजोर होता है।
अधर्म की जड़ें तभी मजबूत होती हैं, जब समाज में यह धारणा विकसित हो जाती है कि ईमानदारी से सफलता संभव नहीं और गलत रास्तों से लाभ उठाने वालों को अंततः कोई नुकसान नहीं होता। इस धारणा को बदलना अधर्म के विरुद्ध संघर्ष की अनिवार्य शर्त है।
अधर्म के विरुद्ध संघर्ष : केवल उपदेश नहीं, आचरण आवश्यक अधर्म का उन्मूलन केवल भाषणों, नारों, धार्मिक आयोजनों अथवा दूसरों को दोष देने से संभव नहीं है। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, नैतिक शिक्षा, निष्पक्ष न्याय और सामाजिक उत्तरदायित्व का समन्वय आवश्यक है।
पहला दायित्व व्यक्ति का है। प्रत्येक मनुष्य को अपने व्यवहार की समीक्षा करनी चाहिए। क्या हम लाभ के लिए असत्य बोलते हैं? क्या हम अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हुए दूसरों के अधिकारों की उपेक्षा करते हैं? क्या हम अपने स्वार्थ के कारण किसी कमजोर व्यक्ति के साथ अन्याय होने देते हैं? इन प्रश्नों का ईमानदार उत्तर आत्मसुधार की शुरुआत बन सकता है।
दूसरा दायित्व परिवार और शिक्षा संस्थानों का है। बच्चों को केवल नैतिकता की परिभाषाएँ पढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सत्य बोलने, विविध विचारों का सम्मान करने, दूसरों की पीड़ा समझने और अन्याय के विरुद्ध विवेकपूर्ण ढंग से आवाज उठाने का अभ्यास कराना चाहिए। शिक्षक का निष्पक्ष व्यवहार और अभिभावकों का आदर्श आचरण पुस्तकीय उपदेशों से अधिक प्रभावशाली होता है।
तीसरा दायित्व शासन और संस्थाओं का है। कानून का निष्पक्ष पालन, पारदर्शिता, जवाबदेही, भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई और पीड़ितों को समय पर न्याय अधर्म के विस्तार को रोकने के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। न्याय तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति की हैसियत, आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रभाव से स्वतंत्र होकर उपलब्ध हो।
चौथा दायित्व समाज और मीडिया का है। पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सनसनी उत्पन्न करना नहीं, बल्कि सत्य को जिम्मेदारी के साथ सामने लाना भी है। नागरिकों को किसी सूचना पर विश्वास करने से पहले उसकी सत्यता जाँचनी चाहिए। असहमति को शत्रुता में बदलने के बजाय संवाद, तर्क और संवैधानिक मूल्यों के माध्यम से समस्याओं का समाधान खोजा जाना चाहिए।
धर्म की रक्षा का अर्थ मानवता की रक्षा धर्म और अधर्म का संघर्ष केवल प्राचीन कथाओं या ऐतिहासिक घटनाओं तक सीमित नहीं है। यह संघर्ष प्रत्येक युग में मनुष्य के भीतर और समाज की व्यवस्था में चलता रहता है। जब हम सत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, किसी पीड़ित की सहायता करते हैं, अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं और निजी लाभ से ऊपर सार्वजनिक हित को रखते हैं, तब धर्म हमारे आचरण में जीवित होता है।
धर्म की रक्षा का अर्थ किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति घृणा फैलाना नहीं, बल्कि अन्याय, हिंसा, शोषण और अमानवीयता का विरोध करना है। अधर्म का प्रतिकार भी विवेक, न्याय और मानवीय मर्यादा के भीतर रहकर होना चाहिए। अन्याय को समाप्त करने के नाम पर स्वयं अन्याय करना समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
श्रीराम का जीवन मर्यादा और कर्तव्य की प्रेरणा देता है, जबकि श्रीकृष्ण का संदेश परिस्थितियों के बीच विवेकपूर्ण निर्णय और धर्मसम्मत कर्म की आवश्यकता समझाता है। इन आदर्शों का वास्तविक अनुसरण तभी होगा, जब हम उन्हें अपने व्यवहार, सार्वजनिक जीवन और सामाजिक उत्तरदायित्व में उतारेंगे।
अधर्म के विरुद्ध पहला कदम स्वयं से अधर्म का सबसे खतरनाक रूप वह है, जिसे समाज सामान्य मानने लगता है। जब झूठ को सामान्य व्यवहार, भ्रष्टाचार को विवशता, अन्याय को व्यवस्था और संवेदनहीनता को व्यावहारिकता कहकर स्वीकार कर लिया जाता है, तब नैतिक पतन की प्रक्रिया तेज हो जाती है। ऐसी स्थिति में परिवर्तन का आरंभ आत्मजागरण से होना चाहिए।
हमें यह समझना होगा कि अधर्म का अंत केवल किसी बाहरी शक्ति की प्रतीक्षा से नहीं होगा। इसके लिए सत्यनिष्ठ नागरिक, संवेदनशील परिवार, मूल्यपरक शिक्षा, निष्पक्ष संस्थाएँ और उत्तरदायी शासन आवश्यक हैं।
समाज की वास्तविक उन्नति का मापदंड केवल आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति या भौतिक संपन्नता नहीं, बल्कि यह भी है कि वहाँ कमजोर कितना सुरक्षित है, स्त्री कितनी सम्मानित है, श्रमिक को कितना न्याय मिलता है और सत्य बोलने वाले को कितनी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
अधर्म का अंधकार तभी मिटेगा, जब हम दूसरों के भीतर दोष खोजने से पहले अपने अंतर्मन में विवेक का दीप प्रज्वलित करेंगे। धर्म किसी मंच पर दिया गया उपदेश मात्र नहीं, बल्कि जीवन में निभाया गया उत्तरदायित्व है। जिस दिन सत्य हमारे निर्णयों में, न्याय हमारी व्यवस्था में, करुणा हमारे व्यवहार में और ईमानदारी हमारे चरित्र में स्थान पा लेगी, उसी दिन अधर्म की शक्तियाँ कमजोर पड़ने लगेंगी।
राष्ट्रीय विचार गोष्ठी के इस संदर्भ में हमारा संकल्प होना चाहिए—हम अधर्म को केवल पहचानेंगे नहीं, उसका विवेकपूर्ण प्रतिरोध भी करेंगे; अन्याय के सामने मौन नहीं रहेंगे और अपने आचरण से ऐसी सामाजिक संस्कृति का निर्माण करेंगे, जिसमें सत्य को साहस, न्याय को संरक्षण और मानवता को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हो।
