कोटा । साहित्यकार रीता गुप्ता के प्रथम उपन्यास जिंदगी की धूप छांव का रविवार को कोटा के एक होटल में समारोहपूर्वक लोकार्पण किया गया। अतिथियों में माँ सास्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
मुख्य अतिथि विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक, सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि कहा कि वर्तमान में जिस तेजी से साहित्य जगत में गुणवत्तापूर्ण महिला लेखन सामने आ रहा है उस से बड़ी आशाएं बांधती हैं।
लेखिका का यह उपन्यास मध्यमवर्गीय परिवार की महिला की पीड़ा को बड़ी खूबी से यथार्थ और कल्पना कौशल से उभरने में सफल रही है।
इस कृति में कई विख्यात लेखिकाओं के रचनाधर्म की झलक दिखाई देने से लगता है हाड़ोती की महिला रचनाकारों में से ही कोई बड़ी लेखिका निकल कर आयेगी।
उन्होंने पौराणिक पात्रों के उदाहरण से बताया कि कोई भी अवतारी ऐसे नही हुआ जिसके जीवन में धूप छांव का संघर्ष नहीं रहा हो। अंचल कोई भी हो पर भारतीय नारी सदियों से अपना संघर्ष खुद झेल रही है, कह रही है।
उन्होंने कहा यह कृति लेखिका की श्रम साधना का प्रतिफल है। उपन्यास के प्रथम पैरे के अंश पढ़ते हुए जिंदगी कभी सीधी सपाट नहीं चलती। टेढ़े मेढ़े रास्तों से गुजरते हुए कभी दिल खुशियों से सराबोर हो जाता है तो कभी ग़म की बदलियों से रूबरू होता है। इसका प्रथम और अंतिम पैरा ही उपन्यास के उद्देश्य को बताता है।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के सचिव डॉ.बसंत सिंह सोलंकी ने कहा कि धूप छांव हर पुरुष और महिला के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।
कृति के सभी पात्र समाज को उनकी अपनी जिंदगी के संघर्ष से जोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि नारी विमर्श पर यह उपन्यास एक महिला के संघर्ष की कथा पर आधारित है जो परिस्थितियों से उत्पन्न विषम स्थितियों से जूझती है और उसके जीवन के संघर्ष को उजागर करती है।
यह महिला पात्र श्रुति अपनी संघर्षमय जिंदगी जीती है और अन्ततः साक्षी की गोद ली हुई बेटी अंशिका, जो वास्तव में श्रुति और कार्तिक की ही बेटी है, से संवाद कर जिंदगी की सच्चाइयों को खुलकर सामने लाती है।
मुख्य वक्ता के रूप में कथाकार एवम् समीक्षक विजय जोशी ने कहा कि यह उपन्यास इस बात का भी साक्षी है कि लेखक ने सामाजिक परिवर्तन पर दृष्टि रखते हुए उत्पन्न विसंगतियों एवं विडम्बनाओं की निर्मिति को परखा है।
इस निर्मिति को रोकने में श्रुति जैसी नायिका और विपिन जैसा नायक पहल करके एक दिशा प्रदान करते हैं। इस दिशा में साक्षी जैसी सहयात्री इस पहल को संरक्षित करते हुए गति प्रदान करती है जिसमें डॉ. मंदिरा का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहता है।
मुख्य वक्ता ने कहा मुख्य कथा एवं अन्तर्कथाओं के साथ पूर्वदिप्ति शैली की प्रधानता लिए इस उपन्यास में सामाजिक परिवेश की उन सच्चाइयों का विवरण है जहाँ जिंदगी के पात्र अपने - अपने वैचारिक धरातल पर खड़े होकर जीवन जीने के तरीकों का विश्लेषण करते हैं और अपने स्वभावानुरूप आगे बढ़ते रहते हैं।
आधुनिक भावभूमि पर रचित उपन्यास का परिवेश चित्रण और पात्रानुकूल भाषा प्रभावी है। वहीं मूल कथा के साथ सहायक कथा उसके प्रभाव को उजागर कर कथा में निहित उद्देश्य को सामने लाकर परिणामों को विश्लेषित करती है।
विशिष्ठ अतिथि साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही ने कहा कि समाज में कार्तिक जैसेअवसरवादी पात्रों की यत्र-तत्र उपस्थिति से सचेत तो करता ही है साथ ही उनमें आए चारित्रिक परिवर्तन को भी उजागर करता है। उन्होंने कहा आज हाड़ोती अंचल में महिला लेखन विविधता के साथ तेजी से आगे आ रहा है। विशिष्ठ अतिथि उदयपुर की डॉ. सरिता जैन एवं स्नेहलता शर्मा ने भी विचार व्यक्त किए।
उपन्यासकार रीता गुप्ता ने सभी का स्वागत करते हुए कहा कि यह उपन्यास वर्तमान जीवन शैली और उसके प्रभावों को सामने लाकर स्त्री चेतना के मुखर स्वरों को अनुनादित करता हुआ समाज परिवर्तन की दिशा में उसके सकारात्मक प्रयास और दृढ़ संकल्पों को उद्घाटित करता है।
उन्होंने प्रकाशन सहयोग के लिए राजस्थान साहित्य अकादमी का आभार व्यक्त किया। कवि महेश पंचोली ने मंच संचालन करते हुए अतिथियों का परिचय दिया।
भूमिका ने सभी का आभार व्यक्त किया। समरोह में अतिथियों का स्वागत सम्मान किया गया।
कोटा की विभिन्न साकित्यिक संस्थाओं और साहित्यकारों ने लेखिका का अभिनंदन किया।
