उदयपुर। देवेन्द्र धाम स्थित महावीर समवशरण में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन देते हुए डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने मस्तिष्क (दिमाग) को शरीर का सर्वाेत्तम अंग बताया।
उन्होंने कहा कि हमारी समस्त गतिविधियों का संचालक मस्तिष्क ही है। जीवन यात्रा के लिए यद्यपि हृदय की आवश्यकता है, पर इसे संचालित रखने में मस्तिष्क सबसे बड़ा सहायक सिद्ध होता है।
मस्तिष्क में ब्रेन हेमरेज होते ही पूरा शरीर काम करना बंद कर देता है। डॉ. सुरेंद्र मुनि ने कहा कि दिव्य ज्ञान के बल पर ही महापुरुषों ने हमें धर्म तत्व समझाया है तथा वैज्ञानिकों ने नए-नए आविष्कार किए हैं।
उद्योगपति, न्यायाधीश, वकील, प्रोफेसर, ज्ञानी गुरु और साहित्यकारकृये सभी इस असाधारण दिमाग की ही देन हैं। उन्होंने आह्वान किया कि इस मस्तिष्क का महत्व समझकर इसे विकसित बनाएं और इसका सदुपयोग करें।
सारे अनुभव और ज्ञान अभ्यास द्वारा दिमाग को विकसित करके ही प्राप्त होते हैं, जिसके लिए बच्चों को बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई से जोड़ा जाता है।
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान की स्तुति स्वरूप कलयुग के कल्पवृक्ष श्रीमद् भक्तामर स्तोत्र की 41वीं गाथा के अनुष्ठान के पश्चात प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने मस्तिष्क को तनाव से दूर रखने का संदेश दिया।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अष्टावक्र के शरीर के अंग व्याधि के कारण टेढ़े-मेढ़े थे, किंतु अपने प्रखर दिमाग के बल पर वे परम ज्ञानी और गुरु कहलाए।
श्रवण, आचरण और कथन जैसी महत्वपूर्ण क्रियाएं इसी से संपन्न होती हैं। कुदरत का यह अनुपम उपहार ही हमें अन्य जीव-जंतुओं से ऊपर उठाता है; बाकी खान-पान और जीवन यापन की सामान्य क्रियाएं तो पशु जगत में भी होती हैं।
उन्होंने कहा कि आलस्य और बुरी आदतें हमारी ज्ञान शक्ति को समाप्त कर देती हैं। वर्तमान दौर में बच्चों और युवाओं को लड़ाई-झगड़े, राग-द्वेष और व्यसनों से दूर रहकर निरंतर अभ्यास करना चाहिए।
मस्तिष्क के समुचित विकास के लिए खान-पान की शुद्धि, बड़ों का आशीर्वाद और मर्यादित जीवनशैली अपनाना आवश्यक है। सभा में उपाध्याय रमेश मुनि एवं दीपेश मुनि द्वारा मंगल भावनाएं व्यक्त की गईं।
इस अवसर पर समाज द्वारा आगामी 1 नवंबर को आचार्य देवेन्द्र जयंती गुणानुवाद सभा तथा 6 नवंबर को धनतेरस के उपलक्ष्य में सामूहिक जाप के आयोजन की जानकारी दी गई।
