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कषाय भाव छोड़ क्षमाभाव अपनाएं, तभी जीवन में आएगा सच्चा सुख

उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, उदयपुर के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान संतश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन में सुख की तलाश करता है, लेकिन वास्तविक सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि मन की शांत

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कषाय भाव छोड़ क्षमाभाव अपनाएं, तभी जीवन में आएगा सच्चा सुख

उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, उदयपुर के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान संतश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन में सुख की तलाश करता है, लेकिन वास्तविक सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि मन की शांति और आत्मिक संतोष में निहित है।

कषाय भावों का त्याग कर क्षमा, संयम और सद्भाव को जीवन में अपनाने से ही सच्चे सुख की अनुभूति संभव है।उन्होंने कहा कि सुख के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख चलता रहता है।

मनुष्य सुख प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करता है, लेकिन पांच इंद्रियों और मन के पीछे भागते हुए वह वास्तविक आनंद से दूर होता जाता है।

संसार की भौतिक वस्तुएं क्षणिक सुख देती हैं, जबकि आत्मिक सुख स्थायी होता है।प्रवचन में कहा गया कि सांसारिक शरीर और भौतिक वस्तुओं को पाकर मनुष्य उन्हें अपना समझने लगता है, जबकि वस्तुओं का स्वभाव परिवर्तनशील है।

आज जो वस्तु हमारे पास है, वह कल हमारे पास रहे, यह आवश्यक नहीं। इसलिए मनुष्य को बाहरी पदार्थों के मोह के बजाय आत्मकल्याण की ओर ध्यान देना चाहिए।संतश्री ने बताया कि वास्तविक सुख वह है जिसमें किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या या वैर का भाव न हो।

क्षमा, संयम, सत्य और ध्यान जैसे गुणों को जीवन में उतारने से मन निर्मल होता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर झांककर यह विचार करना चाहिए कि वह किन कषायों के कारण अशांत है और उनसे मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिए।उन्होंने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं से आह्वान किया कि जीवन में क्षमा, संयम और आत्मचिंतन को स्थान दें तथा क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों का त्याग करें।

यही आत्मिक उन्नति और स्थायी सुख की दिशा में पहला कदम है। इस अवसर पर श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।