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Paras Health News

लकवे से पहले बची 34 वर्षीय बढ़ई की जिंदगी, पारस हेल्थ उदयपुर में रीढ़ से निकाली गईं 200-250 हाइडैटिड सिस्ट

उदयपुर: 34 साल के एक बढ़ई को स्पाइनल हाइडैटिड बीमारी बार-बार होती थी। इस बीमारी के कारण उसे पैरालिसिस यानी लकवा होने का खतरा था। मामले की जटिलता को देखते हुए पारस हेल्थ उदयपुर में चार से पांच घंटे की जटिल सर्जरी हुई।

मुख्य बिंदु
  • उदयपुर: 34 साल के एक बढ़ई को स्पाइनल हाइडैटिड बीमारी बार-बार होती थी।
  • इस बीमारी के कारण उसे पैरालिसिस यानी लकवा होने का खतरा था।
  • मामले की जटिलता को देखते हुए पारस हेल्थ उदयपुर में चार से पांच घंटे की जटिल सर्जरी हुई।
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लकवे से पहले बची 34 वर्षीय बढ़ई की जिंदगी, पारस हेल्थ उदयपुर में रीढ़ से निकाली गईं 200-250 हाइडैटिड सिस्ट

उदयपुर: 34 साल के एक बढ़ई को स्पाइनल हाइडैटिड बीमारी बार-बार होती थी। इस बीमारी के कारण उसे पैरालिसिस यानी लकवा होने का खतरा था।

मामले की जटिलता को देखते हुए पारस हेल्थ उदयपुर में चार से पांच घंटे की जटिल सर्जरी हुई। डॉक्टरों ने मरीज़ की निचली रीढ़ और आस-पास की मांसपेशियों से लगभग 200-250 हाइडैटिड डॉटर सिस्ट निकाले।

सर्जरी को पारस हेल्थ उदयपुर के न्यूरोसर्जरी के डायरेक्टर और HOD डॉ. अजीत सिंह ने लीड किया, और एनेस्थीसिया के HOD डॉ. अबीजार और उनकी टीम ने इस प्रक्रिया में मदद की।

मरीज़ कुछ समय से पीठ में बहुत तेज दर्द से पीड़ित था। यह दर्द दिनों दिन बढ़ता जा रहा था और लगभग तीन महीने तक बाएं पैर में साइटिका जैसा दर्द रहा।

इस दर्द की वजह से आराम से बैठना, काम करना और रोज़ के काम करना मुश्किल हो गया। लगभग तीन साल पहले अहमदाबाद के एक दूसरे हॉस्पिटल में उनकी हाइडैटिड बीमारी की सर्जरी हुई थी।

बीमारी का दोबारा होना, सिस्ट का बहुत ज़्यादा होना और पिछली सर्जरी से बदली हुई एनाटॉमी ने मामले को खास तौर पर गंभीर बना दिया।

MRI स्कैन में रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में और उसके आस-पास करीब 200 से 250 सिस्ट नजर आए। सिस्ट आस-पास की मांसपेशियों में भी फैल गए थे और रीढ़ की नसों पर बहुत ज़्यादा दबाव डाल रहे थे।

डॉक्टरों ने कहा कि अगर दबाव ऐसे ही रहता, तो पैरों में कमज़ोरी या लकवा हो सकता था, साथ ही ब्लैडर और बाउल पर नियंत्रण भी कम हो सकता था। हाइडैटिड बीमारी इचिनोकोकस पैरासाइट की वजह से होती है और आमतौर पर लीवर और फेफड़ों पर असर डालती है।

हालांकि इस बीमारी का रीढ़ की हड्डी तक पहुंचना बहुत दुर्लभ बात होती है। मरीज की नसों के आसपास पिछली सर्जरी के कारण काफी ज्यादा निशान और चिपकाव भी हो गया था।

इससे सर्जरी के दौरान नसों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ गया था।

इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. अजीत सिंह ने कहा, “सबसे बड़ी समस्या पहले से इलाज की गई जगह पर ऑपरेशन करना था, क्योंकि यहां नसों के चारों ओर गहरे निशान और चिपकाव बन गए थे। रीढ़ की हड्डी और आसपास की मांसपेशियों में इतने बड़े सिस्ट के बोझ से न्यूरोलॉजिकल चोट होने का खतरा बहुत ज्यादा था। हमारी प्राथमिकता नसों को डीकंप्रेस करते हुए सिस्ट को सुरक्षित रूप से निकालना और उसे फटने या फैलने से रोकना था।”

माइक्रोस्कोप और लगातार नर्व मॉनिटरिंग का इस्तेमाल करके सर्जिकल टीम ने नसों को बचाते हुए सिस्ट को ध्यान से सावधानीपूर्वक अलग किया और निकाला। फिर सर्जिकल एरिया को सलाइन से अच्छी तरह धोया गया ताकि कोई भी छिपा हुआ या बचा हुआ सिस्ट मटीरियल निकल जाए।

डॉक्टरों ने सिस्ट को टूटने और उनके अंदर का सामान बाहर गिरने से रोकने के लिए खास ध्यान रखा, क्योंकि इससे एनाफिलेक्सिस नाम का एक गंभीर एलर्जिक रिएक्शन हो सकता है।

एनेस्थीसिया टीम सर्जरी के दौरान ऐसी किसी भी इमरजेंसी से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार थी।

मरीज़ के पैर का दर्द सर्जरी के तुरंत बाद ठीक हो गया। सर्जरी के अगले दिन वह चलने लगा और दो दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद उसे छुट्टी दे दी गई।

मरीज़ ने कहा, “दर्द की वजह से धीरे-धीरे मेरे लिए आराम से बैठना, काम करना और अपने रोजमर्रा की गतिविधियां करना मुश्किल हो गया था। इसी समस्या के लिए पहले मेरी सर्जरी हुई थी, इसलिए जब लक्षण वापस आए और बिगड़ गए तो मैं परेशान हो गया था। सर्जरी के बाद तुरंत आराम मिलने और अगले दिन चल पाने से मुझे बहुत राहत मिली है। मुझे अपने नॉर्मल रूटीन में लौटने की उम्मीद है।”

मरीज़ को लंबे समय तक फ़ॉलो-अप की ज़रूरत होगी, ऐसा इसलिए क्योंकि सर्जरी के बाद भी स्पाइनल हाइडैटिड बीमारी दोबारा हो सकती है। उसकी रिकवरी का अंदाज़ा लगाने और भविष्य में दोबारा बीमारी होने पर नज़र रखने के लिए लगातार मॉनिटरिंग ज़रूरी होगी।