जयपुर/अजमेर । लोकतंत्र शासन की नहीं, जनता को साथ लेकर चलने की पद्धति है। इस सिद्धांत को अपने व्यवहार में भी चरितार्थ करते नजर आए हैं राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी।
अजमेर में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे स्पीकर देवनानी के लिए कार्यक्रम आयोजकों द्वारा मंच पर विशेष शाही कुर्सी रखी गई थी। कुर्सी पर नजर पड़ते ही उन्होंने आयोजकों से इसे हटाकर सामान्य कुर्सी लगाने को कहा।
विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी की सादगी और सहजता के इस छोटे -से प्रसंग, ने जनप्रतिनिधि और जनता के बीच समानता के भाव का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
लोकतंत्र की गरिमा पद की विशिष्टता में नहीं, जनप्रतिनिधि की सहजता और जनता के साथ उसके आत्मीय संबंधों में निहित होती है। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने अजमेर में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने सहज व्यवहार से इस लोकतांत्रिक भावना को प्रभावी अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे देवनानी के लिए मंच पर विशेष शाही कुर्सी की व्यवस्था की गई थी। जैसे ही उनकी दृष्टि उस कुर्सी पर पड़ी, उन्होंने आयोजकों से उसे हटाकर सामान्य कुर्सी लगाने को कहा। उनके इस सहज निर्देश ने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
देवनानी का यह व्यवहार सार्वजनिक जीवन में सादगी, सहजता और समानता के महत्व को रेखांकित करने वाला रहा। संवैधानिक पदों की अपनी गरिमा और मर्यादा होती है, किंतु उस गरिमा की वास्तविक सार्थकता जनसेवा के भाव और आमजन के प्रति आत्मीयता में निहित है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास का प्रतिनिधि होता है और उसका आचरण ही उन मूल्यों की पहचान बनता है, जिन पर लोकतंत्र की नींव टिकी है।
मंच पर विशेष शाही कुर्सी के स्थान पर सामान्य कुर्सी को प्राथमिकता देने का श्री देवनानी का निर्णय इसी भावना का सहज उदाहरण बना। इस प्रसंग में कोई औपचारिक प्रदर्शन नहीं, अपितु व्यवहार में दिखाई देने वाली सादगी और समानता का संदेश प्रमुख रहा। एक सामान्य-सी पहल के माध्यम से श्री देवनानी ने यह भाव व्यक्त किया कि लोकतंत्र में पद की प्रतिष्ठा अपने स्थान पर है, पर जनप्रतिनिधि की पहचान जनता से उसकी निकटता, विनम्रता और लोकसेवा के प्रति प्रतिबद्धता से होती है।
