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ठेका नौकरी: रोजगार या असुरक्षा का नया दौर?

सत्य भूषण शर्मा, प्रवक्ता, पत्रकार, लेखक, कवि एवं यूट्यूबर, उदयपुर [राजस्थान ]

मुख्य बिंदु
  • आज रोजगार केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा, आत्मनिर्भरता और भविष्य की सुरक्षा का आधार भी है।
  • ऐसे समय में ‘ठेका नौकरी’ रोजगार के एक ऐसे स्वरूप के रूप में सामने आई है, जिसने लाखों लोगों को काम तो दिया है, लेकिन उनके सामने स्थायित्व और भविष्य की अनिश्चितता भी खड़ी कर दी है।
  • ठेका व्यवस्था का मूल उद्देश्य संस्थानों और उद्योगों को आवश्यकता के अनुरूप मानव संसाधन उपलब्ध कराना था।
  • निश्चित अवधि के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति से संस्थानों को आर्थिक एवं प्रशासनिक लचीलापन मिलता है।
  • दूसरी ओर, कर्मचारी को रोजगार का अवसर प्राप्त होता है।
  • समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यही व्यवस्था लंबे समय तक काम लेने के बावजूद कर्मचारी को स्थायी कर्मचारी जैसी सुरक्षा और सम्मान से वंचित रखने का माध्यम बन जाती है।
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ठेका नौकरी: रोजगार या असुरक्षा का नया दौर?

आज रोजगार केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा, आत्मनिर्भरता और भविष्य की सुरक्षा का आधार भी है। ऐसे समय में ‘ठेका नौकरी’ रोजगार के एक ऐसे स्वरूप के रूप में सामने आई है, जिसने लाखों लोगों को काम तो दिया है, लेकिन उनके सामने स्थायित्व और भविष्य की अनिश्चितता भी खड़ी कर दी है।

ठेका व्यवस्था का मूल उद्देश्य संस्थानों और उद्योगों को आवश्यकता के अनुरूप मानव संसाधन उपलब्ध कराना था। निश्चित अवधि के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति से संस्थानों को आर्थिक एवं प्रशासनिक लचीलापन मिलता है। दूसरी ओर, कर्मचारी को रोजगार का अवसर प्राप्त होता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यही व्यवस्था लंबे समय तक काम लेने के बावजूद कर्मचारी को स्थायी कर्मचारी जैसी सुरक्षा और सम्मान से वंचित रखने का माध्यम बन जाती है।

एक ठेका कर्मचारी सुबह उसी समय कार्यस्थल पर पहुंचता है, समान जिम्मेदारियां निभाता है, समान लक्ष्य पूरे करता है और कभी-कभी स्थायी कर्मचारी से अधिक मेहनत भी करता है। फिर भी उसके मन में यह प्रश्न लगातार बना रहता है—“कल मेरी नौकरी रहेगी या नहीं?” यही अनिश्चितता उसके आत्मविश्वास और मानसिक शांति को प्रभावित करती है।

विशेषकर युवा वर्ग के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद जब वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं और स्थायी रोजगार की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, तब ठेका नौकरी उन्हें तत्काल आय का सहारा देती है। लेकिन कम वेतन, सीमित सुविधाएं, नौकरी की अस्थिरता और भविष्य की सामाजिक सुरक्षा का अभाव उनके सपनों को लगातार कमजोर करता रहता है।

ठेका नौकरी का एक दूसरा पक्ष भी है। निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था संस्थानों के लिए लागत को नियंत्रित करने तथा आवश्यकता के अनुसार कर्मचारियों की संख्या निर्धारित करने में उपयोगी हो सकती है। इसलिए ठेका व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करना व्यावहारिक समाधान नहीं कहा जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि ठेका व्यवस्था को शोषण की व्यवस्था न बनने दिया जाए।

समान कार्य के लिए उचित पारिश्रमिक, समय पर वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल, सामाजिक सुरक्षा, अवकाश, बीमा तथा पारदर्शी सेवा-शर्तें प्रत्येक कर्मचारी का सम्मानजनक अधिकार होना चाहिए। लंबे समय तक लगातार सेवा देने वाले कर्मचारियों के लिए निश्चित अवधि के बाद उनके अनुभव और कार्यक्षमता के आधार पर स्थायित्व अथवा प्राथमिकता की स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोजगार को केवल ‘काम’ की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की दृष्टि से देखा जाए। किसी कर्मचारी की नियुक्ति स्थायी है या अस्थायी, इससे उसकी मेहनत का मूल्य कम नहीं हो जाता। संस्था का विकास उन्हीं हाथों से होता है जो प्रतिदिन उसके लिए अपना श्रम, समय और प्रतिभा समर्पित करते हैं।

आज आवश्यकता ऐसी रोजगार नीति की है जिसमें उद्योगों को आवश्यक लचीलापन मिले और कर्मचारियों को आवश्यक सुरक्षा। लचीला रोजगार और मानवीय सुरक्षा—दोनों का संतुलन ही आधुनिक श्रम व्यवस्था की पहचान होना चाहिए।

ठेका नौकरी यदि अवसर का द्वार बने तो स्वागतयोग्य है, लेकिन यदि वह जीवनभर की असुरक्षा बन जाए तो उस व्यवस्था पर पुनर्विचार आवश्यक है। देश की आर्थिक प्रगति का वास्तविक अर्थ तभी होगा, जब विकास के आंकड़ों के साथ काम करने वाले व्यक्ति के चेहरे पर भी भविष्य का विश्वास दिखाई दे।

अंततः रोजगार का उद्देश्य केवल व्यक्ति को व्यस्त रखना नहीं, बल्कि उसे सम्मानपूर्वक जीने का अवसर देना है। इसलिए समय की मांग है कि ठेका नौकरी को ‘मजबूरी का रोजगार’ नहीं, बल्कि सुरक्षित, सम्मानजनक और न्यायपूर्ण रोजगार बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।