मनुष्य को मनुष्य इस लिये कहा जाता है कि वह अपने सभी काम मनन करके करता है। जो मनुष्य बिना मनन के कोई काम करता है तो उसे मूर्ख कहा जाता है।
मनन करने के लिये यह आवश्यक होता है कि हम भाषा सीखें एवं ज्ञान अर्जित करें। भाषा से अनभिज्ञ एवं सद्ज्ञान से रहित व्यक्ति मनन नहीं कर सकता।
वर्तमान समय में हम देश के लगभग आधे व इससे कुछ अधिक लोगों को अशिक्षित पाते हैं। अधिकांश लोग भाषा को भी ठीक से बोल भी नहीं पाते।
उन्होंने परम्परा से जो सीखा है उसी का व्यवहार वह करते हैं। ऐसे लोग अशुभ कर्म करने के अधिक दोषी नहीं होते अपितु उनके कार्यों में जो त्रुटि वा न्यूनता होती है उसका कारण उनका अज्ञान हुआ करता है।
हमारे देश सहित विश्व के अनेक देशों में मनुष्य को सद्ज्ञान पर आधारित शिक्षा की व्यवस्था नहीं है।
हमारे देश में जो लोग शिक्षित कहे जाते हैं वह भी हिन्दी, अंग्रेजी या क्षेत्रीय भाषा का कुछ कामचलाऊ अध्ययन कर सामाजिक ज्ञान, विज्ञान, कला आदि अनेक विषयों का अध्ययन करते हैं।
इन विषयों का अध्ययन करके कोई मनुष्य पूर्ण ज्ञानी नहीं बन सकता। ज्ञान के लिये हमें स्वयं को जानना होता है।
मैं कौन हूं? मैं जन्म से पूर्व कहां था? मेरा जन्म क्यों हुआ?
मेरे जन्म का उद्देश्य क्या है? मेरे माता पिता का जो ऋण मुझ पर है, उसे कैसे चुकाया जा सकता है?
जन्म देने वाली शक्ति कौन है और उसका मुझे व अन्यों को जन्म देने में क्या प्रयोजन है? हमारे जन्म का उद्देश्य व हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?
हमें जीवन कैसे व्यतीत करना चाहिये जिससे हम जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य से जुड़े रहे, उसकी प्राप्ति में अग्रसर हों, उद्देश्य व लक्ष्य से भटक न जायें?
हमारा यह संसार कब व कैसे बना? इसे बनाने वाला कौन है?
सृष्टि का उपादान कारण अथवा वह सामग्री कौन सी होती है, जिससे यह समस्त संसार बना है? सृष्टि को बनाने व चलाने वाली सत्ता का स्वरूप व उसके गुण, कर्म व स्वभाव क्या व कैसे हैं?
हमारी मृत्यु के बाद हमारी आत्मा का पुनर्जन्म होगा या नहीं? होगा तो किस कारण से होगा और यदि नहीं होगा तो क्यों नहीं होगा?
हमें जीवन में सुख व दुःखों की प्राप्ति होती है। दुःखों की निवृत्ति के क्या उपाय हैं?
जन्म या पुनर्जन्म में हमें जो दुःख होता है, उससे कैसे बचा जा सकता है? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो ज्ञान के अन्तर्गत आते हैं परन्तु इनके सही उत्तर हमें स्कूलों व पाठशालाओं में बताये नहीं जाते।
इन प्रश्नों के सही उत्तर हमारे अनेक मत-मतान्तरों के पास भी नहीं हैं। अतः उन मतों के उद्गम देशों में यदि ईश्वर व जीवात्मा विषयक ज्ञान की उपर्युक्त शिक्षा नहीं दी जाती तो यह समझ में आता है परन्तु भारत में तो इनकी शिक्षा दी जा सकती है।
इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमारे वेदों, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन करने पर मिल जाते हैं।
सेकुलरिज्म या धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इन प्रश्नों के अध्ययन-अध्यापन पर रोक से तो यही लगता है कि सेकुलरिज्म सत्य ज्ञान की प्राप्ति व अध्ययन-अध्यापन में बाधक है।
देश के लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते? इनका विरोध किया जाना चाहिये और ज्ञान के अन्तर्गत आने वाले हर विषय का अध्ययन स्कूल, कालेजों में अवश्य ही कराया जाना चाहिये जिससे देश के सभी लोग उन्हें जान सकें और अपने सभी कार्य चिन्तन-मनन व विवेकपूर्वक कर सकें।
ऐसा होने पर ही देश व समाज की उन्नति व देश में शिष्टाचार आदि में वृद्धि हो सकती है।
मनुष्य का जब जन्म होता है तो उसका ज्ञान व मन अविकसित होता है। मन भौतिक दृष्टि से तो भोजन आदि से स्वस्थ एवं उपयोगी बनाया जा सकता है परन्तु आत्मा व बुद्धि में सद्ज्ञान की अनुपस्थिति में मनुष्य अपने कर्तव्य एवं अकर्तव्यों को नहीं जान सकता।
इसके लिये वेदज्ञान तथा ऋषियों के वेदों पर लिखे गये दर्शन एवं उपनिषद एवं मानव धर्म शास्त्र ‘मनुस्मृति’ आदि ग्रन्थों के अध्ययन की आवश्यकता होती है।
इन ग्रन्थों का अध्ययन कर लेने पर मनुष्य जीवन संबंधी किसी विषय का सत्यासत्य का विवेचन कर निर्णय ले सकता है। किन्हीं गम्भीर विषयों में, जहां उसे शंका व भ्रम होता है, वह वैदिक विद्वानों की सहायता ले सकता है।
इस व्यवस्था में मत व मतान्तर मनुष्य के लिये उपयोगी नहीं रहते। मनुष्य को मत-मतान्तरों की सभी अच्छी बातों का लाभ वेदाध्ययन करने से मिल जाता है।
यह भी कह सकते हैं कि जो मत-मतान्तरों में ज्ञान है उससे कहीं अधिक ज्ञान वेदाध्ययन अथवा वेदविषयक ऋषियों के ग्रन्थों के अध्ययन व विद्वानों के प्रवचनों को सुनकर प्राप्त किया जा सकता है।
इसके साथ ही वेद का अध्ययन करने से मनुष्य सभी प्रकार के अन्धविश्वासों, अनुचित परम्पराओं तथा मिथ्या उपासनाओं से भी बच जाता है। उसे ज्ञात हो जाता है कि ईश्वर सर्वव्यापक होने से सभी मनुष्यों की आत्मा के बाहर व भीतर सर्वत्र विद्यमान है।
अतः वह वेद मन्त्रों के अध्ययन व उनके सत्य अर्थों का पाठ कर एवं उन पर विचार कर ईश्वर की उपासना को कर सकता है। महर्षि पतंजलि ने उपासना के लिये योगदर्शन ग्रन्थ हमें दिया है।
ऋषि दयानन्द ने भी योगदर्शन के आधार पर ईश्वर की उपासना के लिये प्रातः-सायं एवं सायं-रात्रि की सन्धि वेलाओं में ‘सन्ध्या’ नामक पुस्तक सभी मनुष्यों को प्रदान की है।
यह पुस्तक सन्ध्या करने के महत्व एवं उसकी विधि बताने वाली अत्युत्तम पुस्तक है।
एक बार काशी के एक प्रसिद्ध विद्वान को उनके एक आर्यसमाजी शिष्य पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने ऋषि दयानन्द रचित सन्ध्या की पुस्तक दी थी। पुस्तक पर ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज का उल्लेख छिपा व हटा दिया गया था।
वह पुस्तक उसके दी गई सन्ध्या की विधि एवं तद्विषयक सामग्री पर उनकी सम्मति के लिये दी गई थी। कुछ समय बाद उन पण्डित जी के पुत्र ने बताया था कि काशी के शीर्ष पण्डित जी अपनी पुरानी पौराणिक सन्ध्या-उपासना को छोड़कर ऋषि दयानन्द रचित सन्ध्या को करने लगे हैं।
ऐसे अनेक लोग मिलते हैं जो प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने वेद एवं मत-मतान्तरों के साहित्य का अध्ययन किया और वैदिक सिद्धान्तों, नियमों, मान्यताओं एवं वेदों में ईश्वर व जीवात्मा का जिस विस्तार से सत्य-सत्य प्रामाणिक वर्णन है, उससे प्रभावित होकर अपने पूर्व मत को छोड़कर वैदिक धर्म की शरण में आये।
अतः मनुष्य को अपने मन को सत्य व असत्य का विवेक करने में समर्थ बनाने के लिये वेद व उपनिषदों सहित दर्शन एवं मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश आदि का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिये।
ऐसा करने से जिज्ञासु मनुष्यों को अवश्य लाभ होगा। उन्हें कोई विधर्मी अपने मत की मिथ्या विशेषतायें बता कर भ्रमित नहीं कर सकेगा जैसा बातों को तोड़ मरोड़ कर प्रचार करते हुए हम लोगों को देखते हैं।
संसार में सभी मनुष्य मत-मतान्तरों द्वारा तैयार की गई विचारधारा एवं परम्पराओं में बन्धे हुए हैं। उन्हें अपने मत के अतिरिक्त अन्य मतों को जानने व समझने का अवसर प्राप्त नहीं होता।
आज के युग में हमें इस सीमित सोच का त्याग कर सभी मतों के ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। इस स्थिति में वैदिक धर्मियों को अपने मत का प्रचार प्रसार कुछ ऐसी रीति से करना चाहिये जिससे वैदिक मत के सिद्धान्तों का सन्देश संसार के सभी मनुष्यों तक पहुंच जायें।
ऐसा करने के बाद सभी अपने-अपने विवेक से सत्य व असत्य का ग्रहण कर सकते हैं। इस विषय में ऋषि दयानन्द के विचारों को प्रस्तुत करना उचित होगा जो उन्होंने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास की अनुभूमिका में लिखे हैं।
वह लिखते हैं ‘यह सिद्ध बात है कि पांच सहस्र वर्षों के पूर्व वेदमत से भिन्न दूसरा कोई भी मत न था क्योंकि वेदोक्त सब बातें विद्या से अविरुद्ध हैं।
वेदों की अप्रवृत्ति होने का कारण महाभारत युद्ध हुआ। इन (वेदों) की अप्रवृत्ति से अविद्यान्धकार के भूगोल में विस्तृत होने से मनुष्यों की बुद्धि भ्रमयुक्त होकर जिस के मन में जैसा आया वैसा मत चलाया।
उन सब मतों में 4 मत अर्थात् जो वेद-विरुद्ध पुराणी, जैनी, किरानी और कुरानी सब मतों के मूल हैं वे क्रम से एक के पीछे दूसरा, तीसरा, चैथा चला है।
अब इन चारों की शाखा एक सहस्र से कम नहीं हैं। इन सब मतवादियों, इन के चेलों और अन्य सब को परस्पर सत्यासत्य के विचार करने में अधिक परिश्रम न हो इसलिये यह (सत्यार्थप्रकाश) ग्रन्थ बनाया है।
जो-जो इस (सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ) में सत्य मत का मण्डन और असत्य मत का खण्डन लिखा है वह सब को जनाना ही प्रयोजन समझा गया है।
इस में जैसी मेरी बुद्धि, जितनी विद्या और जितना इन चारों मतों के मूल ग्रन्थ देखने से बोध हुआ है उस को सब के आगे निवेदित कर देना मैंने उत्तम समझा है क्योंकि विज्ञान गुप्त हुए (लुप्त ज्ञान विज्ञान) का पुनर्मिलना सहज नहीं है।
पक्षपात छोड़कर इस (सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ) को देखने से सत्यासत्य मत सब को विदित हो जायेगा। पश्चात् सब को अपनी-अपनी समझ के अनुसार सत्यमत का ग्रहण करना और असत्य मत को छोड़ना सहज होगा।
..... ...... ..... इस मेरे कर्म से यदि उपकार न मानें तो विरोध भी न करें क्योंकि मेरा तात्पर्य किसी की हानि वा विरोध करने में नहीं किन्तु सत्यासत्य का निर्णय करने कराने का है।
इसी प्रकार सब मनुष्यों को न्यायदृष्टि से वर्तना अति उचित है। मनुष्य-जन्म का होना सत्यासत्य का निर्णय करने कराने के लिये है न कि वाद विवाद विरोध करने कराने के लिये।
इसी मतमतान्तर के विवाद से जगत् में जो-जो अनिष्ट फल हुए, होते हैं और आगे होंगे उन को पक्षपातरहित विद्वज्जन जान सकते हैं।
जब तक इस मनुष्य जाति में परस्पर मिथ्या मतमतान्तर का विरुद्ध वाद न छूटेगा तब तक अन्योन्य को आनन्द न होगा।
यदि हम सब मनुष्य और विशेष विद्वज्जन ईष्र्या द्वेष छोड़ सत्यासत्य का निर्णय करके सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना कराना चाहें तो हमारे लिये यह बात असाध्य नहीं है।
यह निश्चय है कि इन विद्वानों के विरोध ही ने सब को विरोध-जाल में फंसा रखा है। यदि ये लोग अपने प्रयोजन में न फंस कर सब के प्रयोजन को सिद्ध करना चाहैं तो अभी ऐक्यमत हो जायें।
इस के होने की युक्ति इस (सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ) की पूर्ति में लिखेंगे। (ऋषि दयानन्द जी ने यह युक्ति स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश नाम से लिखी है)।
सर्वशक्तिमान् परमात्मा एक मत में प्रवृत्त होने का उत्साह सब मनुष्यों की आत्माओं में प्रकाशित करे।’
ऋषि दयानन्द जी ने जो कहा है उसका एक एक शब्द हमें अपने मन व मस्तिष्क में सुरक्षित रखना चाहिये और उसका आचरण करना चाहिये। संसार के सभी मनुष्यों को सत्य व असत्य का ज्ञान होना चाहिये और उन्हें अपनी प्रत्येक क्रिया व कर्म को सत्य से युक्त करके ही करने चाहियें।
सत्याचरण ही मनुष्य का धर्म है। इसी से मनुष्य की आत्मा की उन्नति होती है।
धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सिद्ध होते हैं। जो मनुष्य धर्म विरुद्ध असत्य का कोई भी कर्म करता है, आत्मा में साक्षीरूप में विद्यमान परमात्मा मनुष्य के सभी कर्मों का उसे यथोचित फल देता है।
हम कभी कोई अनुचित व वेदविरुद्ध असत्य का आचरण न करें अन्यथा इसका प्रभाव हमारे इस जन्म सहित भविष्य के अनन्त जन्मों पर भी पड़ेगा। जीवात्मा वा मनुष्य को अपने सभी कर्मों का फल भोगना होता है।
अतः हमें अशुभ, पाप कर्म कदापि नहीं करना चाहिये। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं।
ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य पताः 196 चुक्खूवाला-2 देहरादून-248001 फोनः 9412985121
