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Udaipur News

चातुर्मास की सच्ची सफलता स्वभाव परिवर्तन में है, केवल मौसम बदलने से नहींः साध्वी विद्युतप्रभा

मुख्य बिंदु
  • वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा आदि ठाणा 6 ने शुक्रवार को कहा कि चातुर्मास केवल ऋतु परिवर्तन का नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन का अवसर है।
  • यदि प्रकृति के साथ हमारे स्वभाव, विचार और आंतरिक भावों में परिवर्तन नहीं आता, तो चातुर्मास की वास्तविक साधना अधूरी रह जाती है।
  • स्वभाव में सकारात्मक बदलाव ही चातुर्मास की सच्ची सफलता है।
  • उन्होंने कहा कि प्रकृति का परिवर्तन हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन अपने जीवन और व्यवहार में परिवर्तन लाना पूरी तरह हमारे हाथ में है।
  • व्यापारी जिस प्रकार सदैव लाभ के बारे में सोचता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि चातुर्मास से वह अपने जीवन में कौन-सा आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।
  • साध्वीजी ने कहा कि आज का मनुष्य शरीर, परिवार और व्यापार की चिंता में इतना उलझ गया है कि देव, गुरु और धर्म के लिए समय ही नहीं निकाल पाता।
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उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा आदि ठाणा 6 ने शुक्रवार को कहा कि चातुर्मास केवल ऋतु परिवर्तन का नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन का अवसर है। यदि प्रकृति के साथ हमारे स्वभाव, विचार और आंतरिक भावों में परिवर्तन नहीं आता, तो चातुर्मास की वास्तविक साधना अधूरी रह जाती है। स्वभाव में सकारात्मक बदलाव ही चातुर्मास की सच्ची सफलता है।

उन्होंने कहा कि प्रकृति का परिवर्तन हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन अपने जीवन और व्यवहार में परिवर्तन लाना पूरी तरह हमारे हाथ में है। व्यापारी जिस प्रकार सदैव लाभ के बारे में सोचता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि चातुर्मास से वह अपने जीवन में कौन-सा आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।

साध्वीजी ने कहा कि आज का मनुष्य शरीर, परिवार और व्यापार की चिंता में इतना उलझ गया है कि देव, गुरु और धर्म के लिए समय ही नहीं निकाल पाता। यदि दुकान पर भोजन करते समय ग्राहक आ जाए तो भोजन छोड़कर पहले ग्राहक को महत्व दिया जाता है।

इसी प्रकार यदि तीर्थयात्रा की तैयारी के बीच व्यापार का अवसर मिल जाए तो अधिकांश लोग तीर्थ छोड़कर व्यापार को प्राथमिकता देते हैं।

यह दर्शाता है कि जीवन का सबसे बड़ा केंद्र पैसा बन गया है, जबकि वास्तविक चिंता नित्य और शाश्वत तत्वों की होनी चाहिए, न कि क्षणभंगुर वस्तुओं की।

उन्होंने कहा कि जिस दिन मन में तीन प्रश्न जागृत हो जाएंगे,मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और मुझे कहाँ जाना है,उसी दिन आत्मा के विकास की यात्रा प्रारंभ हो जाएगी। संसार से प्राप्त नाम, पद, धन और पहचान सब आरोपित हैं और एक दिन छिन जाने वाले हैं, लेकिन आत्मा का शाश्वत स्वरूप ही वास्तविक सत्य है। उसी की पहचान और अनुभूति जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए।

प्रवचन के दौरान आगम के आचारंाग सूत्र बोहराने की बोली का लाभ उषा चन्दरसिंह बोलिया ने तथा चातुर्मास में चरित्र सूत्र बेाहरोन की बोली का लाभ संपत कवंर एवं इनके पुत्र आजाद नाहर ने लिया। इस अवसर पर तेले तप करने वाले तपस्वियों का बहुमान भी किया गया।

कार्यक्रम का मंगलाचरण साध्वी प्रज्ञानजना, साध्वी नमनरुचि, साध्वी योगरुचि एवं साध्वी तन्मय रुचि ने किया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रवचन का लाभ उठाकर धर्म आराधना में सहभागिता निभाई।