उदयपुर । मेवाड़ के गाड़िया लोहार समुदाय की पहचान देशभर में यायावर शिल्पियों के रूप में रही जिन्होंने जन - जन के लिए घरेलू और कृषि तथा अन्य धंधों में सहायक औजार बनाए। जरूरत हुई तो युद्ध के आयुध निर्माण और उनके अनुरक्षण में भी पीछे नहीं रहे। वे लोहे की विभिन्न प्रजातियों और उनके निर्माण तथा उपयोग से परिचित रहे हैं। वे लोक वैज्ञानिक हैं।
उक्त विचार भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण के क्षेत्रीय कार्यालय में " गाड़िया लोहार " पुस्तक पर चर्चा में उभरे। मेवाड़ के चित्तौड़गढ़, आहाड, जोजरो का खेड़ा आदि से जुड़े और उठे इस समुदाय पर डॉ. अनिता सोनी ने जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी के लिए सर्वेक्षण अध्ययन किया जिसको अकादमी सहित मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद्, भोपाल ने सचित्र प्रकाशित किया है।
मेवाड़ के इस शिल्पकार समुदाय पर गंभीर अध्ययन पर इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने कहा कि गाडिया लोहारों में गजब का जीवट है। गाड़ी, गण - हथौड़े और निहाई के भरोसे निश्चिंत रहकर उन्होंने देहात, हाट और गांव तथा खेत खलिहान को आबाद किया।
उल्का पिंडों से प्राप्त होने वाले बीजलसार लोहे से लेकर सामान्य कच्चे, पक्के, इस्पात तक के लोहे की उन्हें अनुभव से जो जानकारियां मिली, वे सहेजने योग्य हैं।
बौद्ध ग्रंथों में गांव - गांव गाड़ी लेकर जाने वाले जिन लोहारों का उल्लेख मिलता है, वह इसी समुदाय की पहचान है। आज भी उनके पास बैलगाड़ी है लेकिन अब घर में गाड़ी रहती है।
कार्यालय प्रमुख, उपनिदेशक डॉ. नीलांजन खटूआ ने कहा कि मेवाड़ के इस समुदाय ने लौह जैसी प्रौद्योगिकी को हज़ारों सालों से सुरक्षित रखा और विकसित भी किया। उनका अपनी भाषा, भूषा, लोकाचार और सांस्कृतिक इकाइयां हैं। उनकी लौह प्रौद्योगिकी, कला तथा लोकांचल में योगदान सचमुच अविस्मरणीय हैं।
मानव विज्ञानी डॉ. अहईनम प्रीतिबाला ने गाड़िया लोहारों के शिल्पों को संग्रहणीय कहा तो सहायक संग्रहालय पालक सुदीपा मंडल ने कहा कि इस समुदाय के बनाए कई शिल्प और गाड़ियां स्थानीय और देशभर के संग्रहालय, अजायबघरों। की निधि है। अनुसंधान सहयोगी डॉ. विशेष कुमार सिंह, नरेश कुमार मीणा आदि भी उपस्थित रहे।
