उदयपुर । माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (टीआरआई) द्वारा जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से जनजातीय विरासत, जनजातीय कलारूपों, मौखिक परंपराओं तथा विभिन्न जनजातीय भित्ति चित्र एवं माण्डना कला के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और संवर्धन के उद्देश्य से स्पोर्ट टू टीआरआई कार्यक्रम के तहत भील जनजाति के लिए ‘स्टेट लेवल ट्राइबल चित्रकला एवं कला कार्यशाला’ का शुभारंभ शुक्रवार, 9 अक्टूबर को सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र (सीसीआरटी) सभागार में किया गया।
कार्यशाला का शुभारंभ जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग की संयुक्त शासन सचिव मंजू मार्शल के मुख्य आतिथ्य एवं वरिष्ठ कला विशेषज्ञ तथा मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के फाइन आर्ट्स विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष शैल चोयल की अध्यक्षता में हुआ।संस्थान के निदेशक ओ.पी. जैन ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जनजातीय विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए किए जा रहे विभागीय प्रयासों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि संस्थान द्वारा कलाकारों की कलाकृतियों को उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से बनफूल डिजाइन स्टूडियो की स्थापना की गई है।
इसके साथ ही विभिन्न कलाओं के प्रशिक्षण तथा आपसी आदान-प्रदान के माध्यम से सीखने के लिए समय-समय पर विविध कार्यशालाओं का आयोजन भी किया जा रहा है।श्री जैन ने बताया कि इस कार्यशाला में राजस्थान के विभिन्न जिलों के कलाकार अपनी क्षेत्रीय कला शैलियों का प्रदर्शन करेंगे।
इसके माध्यम से कलाकारों को अपने-अपने क्षेत्र की जनजातीय कला, विचारों एवं रचनात्मकता का आदान-प्रदान करने का अवसर मिलेगा।
कार्यशाला का उद्देश्य जनजातीय कला की विविध शैलियों को प्रोत्साहित करने के साथ ही पारंपरिक कलात्मक विरासत को संरक्षित करना और कलाकारों के बीच आपसी संवाद एवं सीखने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना है।कार्यक्रम की मुख्य अतिथि मंजू मार्शल ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग द्वारा आदिवासी विरासत के संरक्षण के लिए पूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।
इसी उद्देश्य से विभाग द्वारा ‘सौंध माटी’ आदि धरोहर प्रलेखन योजना प्रारंभ की गई है।
इस प्रकार की पहल जनजातीय विरासत को संरक्षित करने तथा उसे दस्तावेजों के माध्यम से आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शैल चोयल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक कलाकार होता है।
आदिवासी चित्रकला में भित्ति चित्र और माण्डना जनजातीय समुदायों की प्राचीनतम कला अभिव्यक्तियों में शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि माण्डना कला, जिसे मुख्य रूप से देश की जनजातियों द्वारा घरों के आंगन और दीवारों पर बनाया जाता है, केवल सजावट का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शुभता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी है।
उन्होंने कलाकारों से अपनी कला का स्वाभाविक रूप से प्रदर्शन करने का आह्वान किया।कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित मीरा गर्ल्स कॉलेज के आचार्य राम सिंह भाटी ने कला की मौलिकता पर बल देते हुए सृजनात्मक कला की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि कलाकारों को गूगल आदि के शॉर्टकट का सहारा लेने के बजाय अपने आसपास के परिवेश को आधार बनाकर उसे अपनी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता के माध्यम से कलाकृति का रूप देना चाहिए।
उन्होंने विभिन्न कला प्रारूपों एवं मेवाड़ की चित्रकला पद्धतियों पर भी गहराई से प्रकाश डाला।कार्यशाला के माध्यम से भील जनजाति की पारंपरिक चित्रकला एवं अन्य जनजातीय कला रूपों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण, संवर्धन और कलाकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
