उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में बुधवार को नियमित व्याख्यान में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है।
यदि व्यक्ति आत्मा, स्वाध्याय और ज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता तो वह जीवन की बड़ी उपलब्धि से वंचित रह जाता है।
कर्म बंधन और कर्म निर्जरा को समझना जीवन की सार्थकता के लिए आवश्यक है।उन्होंने कहा कि ग्रंथ पढ़े हों या नहीं, यदि व्यक्ति आत्मा का अनुभव करना सीख जाए तो जीवन सफल हो सकता है।
अनेक पुण्य कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य जन्म मिला है। अन्य जीव अपनी पीड़ा तक व्यक्त नहीं कर सकते, जबकि मनुष्य को अपने कर्म और आचरण बदलने की स्वतंत्रता प्राप्त है।साध्वीश्री ने कहा कि शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्म होते हैं।
महामानव बनने के लिए सद्गुणों को आत्मसात करना जरूरी है। केवल बाहरी आकर्षण नहीं, बल्कि भीतर की गुणवत्ता, संस्कार और चरित्र व्यक्ति की वास्तविक पहचान हैं।
सफलता के साथ गुणों को निखारना भी आवश्यक है। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना, नमनरुचि, योगरुचि एवं तन्मयरुचि श्रीजी ने गीत प्रस्तुत किया।