उदयपुर। “आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यक्ति भौतिक सफलता और आर्थिक उपलब्धियों की दौड़ में मानसिक शांति एवं आंतरिक संतुष्टि से दूर होता जा रहा है।
आंतरिक जागरूकता, मानसिक शांति और भौतिक-आध्यात्मिक संतुलन ही सुखी एवं समग्र जीवन का आधार है।“उपरोक्त विचार डाॅ. एच.सी. जैन ने यूसीसीआई में व्यक्त किये।उदयपुर चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री द्वारा यूसीसीआई भवन के पायरोटेक-टेम्पसन्स सभागार में “समग्र जीवन के लिए भौतिकता एवं आध्यात्म में सन्तुलन“ विषय पर आध्यात्मिक कार्यशाला आयोजित की गई।
आध्यात्मिक मार्गदर्शक डॉ. एच.सी. जैन मुख्य वक्ता थे। कार्यक्रम में बडी संख्या में प्रतिभागियों ने भाग लिया।कार्यक्रम के प्रारम्भ में अध्यक्ष श्री सन्दीप बापना ने डॉ. एच.सी. जैन एवं सभी प्रतिभागियों का यूसीसीआई में स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि आज के प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में सफलता के साथ मानसिक एवं भावनात्मक संतुलन भी आवश्यक है।
उन्होंने कार्यक्रम के आयोजन में समन्वय के लिए श्री अनिल गोधा का आभार व्यक्त किया।मानद महासचिव श्री आशीष छाबड़ा ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि यूसीसीआई द्वारा कार्यशाला के आयोजन का उद्देश्य जीवन के भौतिक एवं आध्यात्मिक पक्षों के बीच संतुलन स्थापित करना तथा व्यक्ति को स्वयं से जोड़ने के लिए प्रेरित करना है।डॉ. जैन ने ज्ञान एवं चेतना के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार करने तथा स्वयं को जानने के प्रति जागरुक होने जैसे विषयों को सरल उदाहरणों से समझाते हुए कहा कि “यदि व्यक्ति अपने भीतर को समझ ले, तो उसका जीवन बहुत बेहतर हो सकता है।” उन्होंने बताया कि चिंता, तनाव एवं दुःख का एक प्रमुख कारण लोगों, वस्तुओं और परिस्थितियों के प्रति अत्यधिक आसक्ति है।
आत्म-जागरूकता व्यक्ति को इन परिस्थितियों को संतुलित दृष्टि से देखने की क्षमता देती है।उन्होंने कहा कि ध्यान अनावश्यक विचारों एवं ओवर थिंकिंग (ज्यादा सोचने की आदत) से मुक्ति का प्रभावी माध्यम है।
उन्होंने प्रतिभागियों को सुबह को कुछ समय मोबाइल से दूर रहकर स्वयं से जुड़ने तथा प्रत्येक कार्य को पूर्ण जागरूकता के साथ करने की सलाह दी।
उन्होंने निष्काम कर्म एवं सेवा-भाव पर जोर देते हुए कहा कि परिणाम की अत्यधिक अपेक्षा हमारी ऊर्जा को कम करती है।कमल का उदाहरण देते हुए डॉ. जैन ने कहा कि जिस प्रकार कमल कीचड़ में रहकर भी उससे अछूता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य को संसार में रहते हुए भी अनावश्यक आसक्ति से मुक्त रहना चाहिए।
उन्होंने कृतज्ञता, प्रेम, सद्गुण और मानसिक शांति को समग्र जीवन के लिए महत्वपूर्ण बताया।कार्यशाला के दौरान ध्यान सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों को अपनी भावनाओं एवं विचारों को समझने और अंतर्मन से जुड़ने का अभ्यास कराया गया।प्रश्नोत्तर सत्र में कृत्रिम बौद्धिकता (ए.आई.) पर चर्चा करते हुए डॉ. जैन ने कहा कि ए.आई. भविष्य में मानव की बौद्धिक क्षमता के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है, इसलिए आत्म-जागरूकता एवं स्वयं की सोचने-समझने की क्षमता को विकसित करना आवश्यक है।कार्यक्रम के अंत में उपाध्यक्ष श्री कपिल सुराणा ने कार्यक्रम का सार प्रस्तुत करते हुए डॉ. जैन एवं सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
