भारत के लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय 12वां ब्रिक्स संसदीय मंच, मंगलवार को एक संयुक्त घोषणा-पत्र को अंगीकृत करने के बाद संपन्न हो गया। अपने दायित्व को सफलता पूर्वक पूरा करने के बाद लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अब चीन को अगले ब्रिक्स संसदीय मंच की अध्यक्षता सौंपी है।
नई दिल्ली में आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का संयुक्त घोषणा-पत्र केवल एक मात्र औपचारिक दस्तावेज़ नहीं है , बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में लोकतांत्रिक देशों की सामूहिक आकांक्षाओं का उद्घोष है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में संपन्न इस सम्मेलन ने विश्व समुदाय को यह स्पष्ट संदेश दिया कि 21वीं सदी की चुनौतियों का समाधान केवल मात्र सरकारों के स्तर पर नहीं, बल्कि सशक्त और जन-केंद्रित संसदों के माध्यम से भी संभव है।
“जन-केंद्रित विकास के लिए संसदों को सशक्त बनाना” विषय पर आधारित यह दिल्ली घोषणा-पत्र विश्व राजनीति को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बनकर उभरा है।आज जब विश्व युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी असंतुलन जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब ब्रिक्स देशों ने लोकतांत्रिक संवाद को वैश्विक समाधान का आधार बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
इस घोषणा-पत्र का सबसे प्रभावशाली पक्ष आतंकवाद के प्रति अपनाया गया शून्य सहिष्णुता का स्पष्ट संदेश है।
इसमें सीमापार आतंकवाद, आतंकियों के वित्तपोषण और उन्हें सुरक्षित पनाह देने जैसी प्रवृत्तियों की कड़ी निंदा करते हुए सभी देशों से दोहरे मानदंड छोड़कर एकजुट कार्रवाई का आह्वान किया गया है।
घोषणा-पत्र का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग है। ब्रिक्स देशों ने स्वीकार किया कि वर्तमान वैश्विक संस्थाएं द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों में बनी थीं, जबकि आज की दुनिया कहीं अधिक बहुध्रुवीय और जटिल हो चुकी है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों और वैश्विक दक्षिण की अधिक प्रभावी भागीदारी समय की आवश्यकता है।
तकनीकी युग की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए घोषणा-पत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और साइबर सहयोग को भी विशेष स्थान दिया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया कि तकनीक मानव-केंद्रित होनी चाहिए और उसका उपयोग पारदर्शिता, जवाबदेही तथा लोकतांत्रिक भागीदारी को सुदृढ़ करने के लिए किया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण भविष्य की डिजिटल संसदों की दिशा तय करता है।
जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, महिला सशक्तीकरण, युवा सहभागिता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे विषय इस घोषणा-पत्र को केवल राजनीतिक दस्तावेज़ नहीं रहने देते, बल्कि उसे मानव विकास के व्यापक एजेंडे से जोड़ते हैं। विशेष रूप से संसदों के बीच अनुभव साझा करने और विधायी सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
भारत की मेजबानी में तैयार हुआ यह संयुक्त घोषणा-पत्र वैश्विक मंच पर देश की बढ़ती संसदीय कूटनीति का भी सशक्त प्रमाण है। यह संदेश देता है कि संवाद, सहयोग और साझा उत्तरदायित्व ही स्थायी शांति और समावेशी विकास का आधार बन सकते हैं।
12वें ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन का यह दिल्ली घोषणा-पत्र वस्तुतः उस नए विश्व की रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जिसमें संसद केवल कानून बनाने वाली संस्थाएं नहीं, बल्कि मानवता के साझा भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाली लोकतांत्रिक शक्ति बनकर उभरती हैं। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि और स्थायी प्रासंगिकता है।
