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Udaipur News

अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मकल्याण का मार्ग दिखाता है ज्ञानःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में नवपद आराधना का सातवां दिन, ज्ञान पद की महिमा बताकर श्रद्धालुओं को किया प्रेरितउदयपुर। ज्ञान वही है, जो मनुष्य के जीवन को निर्मल बनाए, विचारों को शुद्ध करे और उसे धर्म एवं आत्मकल्याण के मार्ग

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वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में नवपद आराधना का सातवां दिन, ज्ञान पद की महिमा बताकर श्रद्धालुओं को किया प्रेरितउदयपुर। ज्ञान वही है, जो मनुष्य के जीवन को निर्मल बनाए, विचारों को शुद्ध करे और उसे धर्म एवं आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाए।

केवल बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल करना ही ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन में सही-गलत की पहचान कर सदाचार अपनाना ही वास्तविक ज्ञान है। यह विचार शुक्रवार को वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने व्यक्त किए।

वे नवपद आराधना के सातवें दिन ज्ञान पद की महिमा का वर्णन कर रही थीं।साध्वीश्री ने कहा कि ज्ञान वह नहीं, जो केवल आंखों और हृदय को आकर्षित करे, बल्कि वह है जो जीवन को मांजकर शुद्ध, सात्विक और पवित्र बना दे।

जिस प्रकार मनुष्य धन का मूल्य समझता है, उसी प्रकार उसे संबंधों, धर्म और आत्मा के महत्व को भी समझना चाहिए।

ज्ञान ही मनुष्य को पुण्य-पाप तथा सुख-दुःख के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है।साध्वीश्री ने मैना सुंदरी और श्रीपाल की कथा सुनाते हुए कहा कि अहंकार मनुष्य को विवेकहीन बना देता है।

राजकुमारी मैना सुंदरी के पिता ने अपनी इच्छा के विरुद्ध विचार रखने पर उसे एक कुष्ठ रोगी से विवाह करने के लिए कहा। मैना सुंदरी ने परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए श्रीपाल से विवाह किया।

इस प्रसंग के माध्यम से साध्वीश्री ने समझाया कि जीवन में विपरीत परिस्थितियां आने पर भी धैर्य, विश्वास और दृढ़ता नहीं छोड़नी चाहिए।धर्मसभा में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।

उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने धर्मवाणी का श्रवण कर ज्ञान पद की महत्ता को समझा।